मुलायम के चुनावों की बैठी बधिया और माया पर लगा आर्थिक आपातकाल

Effect Of Note Ban On Up Election 2017

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों पर देश भर की नजरें टिकी हुईं हैं। देश की सियासत का रूख तय करने वाले यूपी में चुनावों से ठीक पहले केन्द्र सरकार द्वारा 500 और 1000 के नोटों को बैन होने से तमाम सियासी दलों में खलबली मची हुई है। एक ओर ​दलित और दौलत की बेटी कहलाने वाली यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सु्प्रीमो मायावती ने केन्द्र सरकार के इस फैसले को आर्थिक आपातकाल करार दिया है तो उनके विरोधी सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव को अभी से समझ आ गया है कि पुराने नोटों पर बैन लगने से यूपी के विधानसभा चुनावों में सबकी बधिया बैठ जाएगी।




पुराने सियासी पहलवान कहलाने वाले मुलायम सिंह यादव कोई भी सियासी बयान बहुत गहरे मायने रखते हैं, इस बार तो वह चुनावों से ठीक पहले अपनी धुर विरोधी मायावती के सुर में सुर मिलाते नजर आ रहे हैं। मुलायम और मायावती के सुर किस वजह से मिल रहे हैं और दोनों की बेचैनी की असल वजह क्या है, यह शायद किसी से छुपी नहीं है।

सर्वविदित है कि भारत में होने वाले हर चुनाव में कालेधन का प्रयोग होता है। इस समय देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। जिनमें सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश है। इसी राज्य के सबसे बड़े सियासी दिग्गजों में मुलायम सिंह यादव और मायावती आते हैं। मायावती की ताजा बौखलाहट के लिए कहा जाने लगा है कि टिकट के नाम पर 1000 और 500 के नोटों में करोड़ों रूपए की उगाही से जमा हुआ हजारों करोड़ का कालाधन उनकी मुसीबत बना हुआ है इसलिए उन्हें केन्द्र सरकार का फैसला आर्थिक आपातकाल नजर आ रहा है।




वहीं दूसरी ओर मुलायम सिंह यादव की चिन्ता को भी राजनीतिक चिन्तक जायज ठहरा रहे है। जानकारों की माने तो यूपी की सत्ता पर आसीन उनकी पार्टी चुनावी तैयारियों को कई स्तर पर पूरा कर चुकी है। विधानसभा की 403 सीटों पर हर पार्टी से करीब करीब 3 दावेदार आर्थिक रूप से तैयार होकर बैठे हैं। जिसमें प्रत्याशियों की सबसे बड़ी भीड़ है मुलायम सिंह यादव के दल में है। भाई और बेटे की लड़ाई ने पुराने दावेदारों के बीच दांवबाज भी खड़े कर दिए हैं जो अपनी किस्मत चुनावी दंगल में आजमाने को तैयार हैं। ऐसे में केन्द्र सरकार के एक बड़े फैसले ने उन तैयारियों पर पानी फेर दिया है जिनके आधार पर दशकों से यूपी में चुनाव जीतने के नए फार्मूले तैयार होते आ रहे हैं। जहां कहीं शराब बांटी जाती है, कहीं साड़ियां तो कहीं पीले और लाल रंग के नोटों की गड्डियां आज यही फार्मूले बनने से पहले ही फेल होते नजर आ रहे हैं।




राजनीतिक विश्लेषकों का एक धड़ा ये भी मानता है कि यूपी समेंत अन्य राज्यों में चुनाव ​के लिए कालेधन को कोने—कोने तक पहुंचाया जा चुका था या पहुंचाने की तैयार लगभग पूरी थी। क्योंकि निर्वाचन आयोग किसी भी समय आदर्श चुनाव आचार संहिता की घोषणा कर सकता है इसलिए इस स्तर पर तैयारियां काफी पहले से शुरू हो चुकीं थीं। इस बीच एकाएक केन्द्र सरकार ने चुनाव में प्रयोग किए जाने के लिए तैयार रखे उन 500 और 1000 के नोटों को अवैध घोषित जिससे सारी तैयारियों पर पानी फिर गया। ऐसे में विरोधियों की खिसियाहट और बौखलाहट लाजमी हैं। केन्द्र सरकार का यह फैसला पांच राज्यों के चुनावों में बीजेपी के विरोध में जाए या पक्ष में लेकिन इतना विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में उतने बड़े स्तर पर कालाधन प्रयोग नहीं होगा, जितना पूर्व के चुनावों में होता आया है। यह कहा जा सकता है कि इन चुनावों के बाद से देश में होने वाली चुनावी राजनीति में सुधार की उम्मीद जागती दिखाई दे रही है।

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों पर देश भर की नजरें टिकी हुईं हैं। देश की सियासत का रूख तय करने वाले यूपी में चुनावों से ठीक पहले केन्द्र सरकार द्वारा 500 और 1000 के नोटों को बैन होने से तमाम सियासी दलों में खलबली मची हुई है। एक ओर ​दलित और दौलत की बेटी कहलाने वाली यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सु्प्रीमो मायावती ने केन्द्र सरकार के इस फैसले को आर्थिक आपातकाल करार दिया…