नई दिल्ली। पूर्वोत्तर भारत के त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम लगभग सामने आ चुके हैं। तीनों ही राज्यों में भाजपा अपने गठबंधन दलों के साथ मिलकर सरकार बनाने के दावे कर रही है वहीं दूसरी कांग्रेस के लिए त्रिपुरा और नागालैंड में एक अदद जीत तक हासिल नहीं कर पाई है। इस बीच कांग्रेस के लिए एक मात्र अच्छी खबर मेघालय से आई है, जहां पहले से सत्ता सुख भोग रही कांग्रेस को 60 में 20 सीटों पर जीत मिलती दिख रही है, जिसे सरकार बनाने के लिए नकाफी माना जा रहा है।

अगर इन तीनों राज्यों के परिणामों की बात की जाए तो, त्रिपुरा में भाजपा अपने गठबंनधन दल के साथ 41 सीटों पर जीत के साथ सरकार बनाती नजर आ रही है, जबकि 60 सीटों वाली त्रिपुरा विधानसभा में 25 सालों से सत्तारूढ़ सीपीएम को 18 सीटें मिलती दिख रहीं हैं। अब तक त्रिपुरा की सियासत में अपनी मौजूदगी तक दर्ज तक करवाने के लिए जूझती दिखने वाली भाजपा अपने गठबंधन दल के साथ दो तिहाई से अधिक बहुमत प्राप्त करने में कामयाब हो रही है। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस जिसके पास 2013 के चुनावों में 8 सीटें थी, का कोई भी उम्मीदवार विधायक बनने में सफल नहीं हुआ है।

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नागालैंड की बात की जाए तो यहां भाजपा गठबंधन 60 में से 30 सीटों पर बढ़त बनाकर सरकार बनाने की ओर अग्रसर, जब कि एनपीएफ 29 सीटों पर आगे चल रही है।भाजपा नेतृत्व को उम्मीद है कि अंतिम परिणाम आने के बाद भाजपा अपने गठबंधन दलों की मदद से नागालैंड में पहली बार सरकार बनाने में कामयाब रहेगी। यहां भी कांग्रेस अपने कब्जे वाली सभी 10 सीटें गवां बैठी है।

मेघालय में सामने आ रही तस्वीर को कांग्रेस पार्टी अपने लिए एक मात्र उप​लब्धी के रूप में देख रही है, जोकि आंकड़ों के हिसाब से अधूरी है। मेघालय विधानसभा की सत्तारूढ़ कांग्रेस अभी बहुमत के आंकड़े से दूर है। भाजपा की बात करें तो यहां उसने 2 सीटों के साथ अपने गठबंधन दलों के भरोसे सरकार बनाने का दावा कर रही है। कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई है लेकिन मेघालय में सत्ता तक पहुंचने की ताकत यहां के 18 उन विधायकों के हाथ में नजर आ रही है, जो ​छोटे—छोटे स्थानीय राजनीतिक दलों से आते हैं या फिर निर्दलीय है। मेघालय में सत्ता बचाने के लिए कांग्रेस सक्रिय हो गई है।यहां कांग्रेस को सबसे बड़ी टक्कर एनपीपी से मिल रही है जिसने 19 सीटों पर अपनी पकड़ बनाई हुई है।

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पूर्वोत्तर में मोदी लहर —

जिस भाजपा को पूर्वोत्तर में दशकों से अनदेखा किया जा रहा था, वह अब पूर्वोत्तर के आठ में से छह राज्यों की विधानसभा में अपनी सरकार बनाती दिख रही है। एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में पूर्वोत्तर भारत के ये राज्य भाजपा के लिए कमजोरी का कारण रहे हैं। प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से पूर्वोत्तर में अपनी मौजूदगी को जिस तरह से पेश किया है, वह अब अपना रंग दिखाने लगा है।

भाजपा ने जिस तरह से इन राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियों का लाभ उठाकर बनाकर न सिर्फ अपनी मौजूदगी का अहसास करवाया है ​बल्कि अपनी सरकारें बनाकर अपनी राजनीतिक रणनीति का उदाहरण भी पेश किया है। जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूर्वोत्तर राज्यों की आम जनता के लिए एक के बाद एक योजनाएं शुरू की हैं, उन्हें भी पार्टी अपनी सफलता का आधार मान रही है।

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केन्द्रीय मंत्री किरण रिजूजू का कहना है कि एक जमाने में पूर्वोत्तर को केवल भारत का हिस्सा माना जाता रहा, लेकिन इन राज्यों की जनता की भलाई की ओर केन्द्र सरकारों ने कोई ध्यान नहीं दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से इन राज्यों की ओर पूरे देश का ध्यान खींचा है, जिस तरह की योजनाएं पूर्वोत्तर के लिए लाई गईं हैं, उससे भाजपा के प्रति लोगों की सोच बदली है। अब तक ईसाइयों को भाजपा विरोधी वोटबैंक के रूप में देखा जाता रहा, लेकिन ऐसा नहीं है जो सरकार काम करती है उसे सभी वोट देते हैं।