जानिए रंगों का त्योहार कहे जाने वाला होली के बारे में कुछ खास

लखनऊ। होली को भारत का मुख्य त्योहार माना जाता है। होली सामाजिक और धार्मिक त्योहार होने के साथ-साथ रंगों का भी त्योहार है। वैसे तो सभी त्योहारों का अपना एक अलग मज़ा होता है लेकिन लाल, पीले, हरे, नीले और गुलाबी जैसे रंगों वाला त्योहार होली का अपना अलग ही मज़ा है। आपको बता दें कि इस साल यानि 2017 में होली (सोमवार)13 मार्च मनाई जाएगी। वैसे रंगों का त्योहार होली दो दिनों तक चलता है होली के एक दिन पहले होलिका दहन होता है। होलिका दहन के अगले दिन होली खेली जाती है लोग एक-दूसरे को रंग, गुलाल लगाते हैं। होली के दिन सभी एक-दूसरे के घर जा कर गुलाल लगाते हैं और गले मिलकर होली की शुभकामनाएं देते हैं।




क्यों मनाई जाती है होली? क्या है इसका इतिहास





फाल्गुन के महीने में रगों का त्योहार होली मनाया जाता है। इस दिन सभी अपनी धुन में मस्त रहते हैं तेज संगीतों और ढ़ोल के बीच एक-दूसरे को रंग लगाते हैं एक-दूसरे पर पानी फेकते हैं। होली को बुराई पर अच्छाई की जीत वाला त्योहार माना जाता है।

हिरण्यकश्यप से जुड़ी है होली की कहानी: हिरण्यकश्यप जो कि प्राचीन भारत के असुर राज थे। हिरण्यकश्यप अपने भाई की म्र्त्यु का बदला लेना चाहते थे जिन्हे भगवान विष्णु ने मारा था भाई की म्रत्यु का बदला लेने के लिए उसे विशाल शक्तियों की जरूरत थी। जिसके लिए उसने भगवान से सालों तक प्रार्थना की और कठिन तप की वजह से उसे वरदान मिल गया और वो खुद को भगवान समझने लगा। वरदान मिलने की वजह से वो खुद को बहुत शक्तिशाली समझने लगा और लोगो से खुद की पूजा करने के लिए कहने लगा। लेकिन उस दुष्ट राजा का बेटा प्रह्लाद जोकि भगवान विष्णु का परम भक्त था।




प्रह्लाद ने अपने दुष्ट पिता का कहना कभी नहीं माना और भगवान विष्णु की आराधना करता रहा और अपने पिता के लाख समझाने पर भी उसकी पूजा कभी नहीं किया। हिरण्यकश्यप ने बेटे द्वारा अपना विरोध देख उसे मारने का निर्णय ले किया। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान मिला था कि वो आग में जल नहीं सकती इसलिए हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन को आदेश दिया कि वो प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर होलिका दहन में बैठ जाये। उनकी योजना प्रहलाद को जलाने की थी क्योंकि होलिका तो आग में जल नहीं सकती थी।

हालांकि उनकी यह योजना सफल नहीं हो सकी जिसके पीछे भगवान विष्णु की कृपा थी। जिसमे प्रह्लाद तो बच गए लेकिन होलिका जलकर खाक हो गयी। इसके बाद भगवान विष्णु ने हिरण्यकश्यप का वध कर दिया। इसके चलते भारत के कुछ राज्यों में होली से एक दिन पहले बुराई के अंत के प्रतीक के तौर पर होलिका दहन की जाती है।

होली में रंगों की शुरुआत कैसे हुई

भगवान विष्णु का अवतार श्री कृष्ण भगवान रंगों से होली मनाते थे जिसकी वजह से यह तरीका प्रचलन में आ गया। कहा जाता है कि कृष्ण जी गोकुल और व्रन्दावन में आपे साथियों के साथ होली मानते थे। आज भी व्रन्दावन जैसी होली कहीं नहीं मनाई जाती है व्रन्दावन की होली पूरे देश में मशहूर है।
होली को वसंत का त्योहार माने जाने की वजह से होली के त्योहार को ‘वसंत महोत्सव’ या ‘काम महोत्सव’ भी कहा जाता है। किसानों के लिए कहा जाता है कि वो अच्छी फसल पैदा होने की वजह से होली मानते हैं।




आधुनिक होली के नकारात्मक पहलू

होली एक पावन और पारंपरिक त्योहार है लेकिन आधुनिक समय में कुछ लोग इस त्योहार की मर्यादा और गरिमा के साथ खिलवाड़ करते नजर आते हैं। होली के दिन कुछ लोग भांग और शराब के नशे में धुत होकर अश्लीलता और हुड़दंग मचाते हैं। इससे और दूसरे लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसके साथ-साथ दुकानदार मिलावटी खाद्य पदार्थ बेचकर भी इस उत्सव का स्वाद बिगाड़ने से बाज नहीं आते अपने ज़रा से मुनाफे के लिए लोगों को हानी होती है। रंगों में भी अत्यधिक कैमिकल्स का प्रयोग होली के रंग में भंग डालने का काम करता है।

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