राम मंदिर निर्माण के लिए फिर शुरू होगा आंदोलन, 5 अक्टूबर को हो सकता है एलान

राम मंदिर निर्माण के लिए फिर शुरू होगा आंदोलन, 5 अक्टूबर को हो सकता है एलान
राम मंदिर निर्माण के लिए फिर शुरू होगा आंदोलन, 5 अक्टूबर को हो सकता है एलान

नई दिल्ली। 2019 लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की राजनीतिक बिसात पर क्या अयोध्या का राम मंदिर भी रखा जाएगा, इस बात को लेकर मंथन शुरू हो चुका है। इसी कड़ी में 5 अक्टूबर को राम जन्मभूमि न्यास अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास के नेतृत्व में दिल्ली में बैठक होगी। संतो की बैठक के लिए विश्व हिंदू परिषद ने सभी संतों को पत्र जारी किया है और राम मंदिर निर्माण के लिए निर्णय लेने के लिए बैठक का न्योता भेजा है।

Faizabad Vhp Called Hindu Saint Meeting To Discuss On Ram Mandir Issue :

बताया जा रहा है कि इस बैठक में विश्व हिंदू परिषद संत समाज ये निर्णय लेगा कि राम मंदिर मामले में आगे क्या होना चाहिए। राम मंदिर के मुद्दे पर वीएचपी के सुरेंद्र जैन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का कब तक इंतजार किया जा सकता है। जब इस विषय पर इतना विलंब हो चुका है, तो हमने इस आंदोलन के लिए हमारी आगे की क्या नीति हो इसके लिए संतों की बैठक 5 अक्टूबर को बुलाई है। जब सुप्रीम कोर्ट की तरफ से इस फैसले को लेकर इतनी देरी की जा चुकी है, तो हमने इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाने का फैसला किया है।

अयोध्या विवाद का मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले एक बार फिर मंदिर निर्माण का मुद्दा चर्चा में है। अभी कुछ दिन पहले ही आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने राम मंदिर के निर्माण में कानूनी अड़चन के कारण हो रही देरी को एक तरफ रखते हुए कहा था कि सामान्य जनता इसके लिए धैर्य नहीं रख सकेगी, इसलिए अयोध्या में जल्द से जल्द मंदिर का निर्माण होना चाहिए।

उन्होंने कहा था कि अगर समाज के सभी लोग सत्य को समझना चाहें और उसे स्वीकार करने के लिए तैयार हों तो किसी भी मुद्दे पर हिंसा का त्याग करते हुए एक शांतिपूर्ण हल प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन, राम मंदिर जैसे गंभीर विषय पर इस तरह के तर्क देना कि राम यहां पैदा ही नहीं हुए, आपसी सामंजस्य को तोड़ता है और इससे टकराव का रास्ता तैयार हो जाता है। इससे बचना चाहिए।

क्या है राम मंदिर विवाद?

साल 1989 में राम जन्म भूमि और बाबरी मस्जिद जमीन विवाद का ये मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा था। 30 सितंबर 2010 को जस्टिस सुधीर अग्रवाल, जस्टिस एस यू खान और जस्टिस डी वी शर्मा की बेंच ने अयोध्या विवाद पर अपना फैसला सुनाया। फैसला हुआ कि 2.77 एकड़ विवादित भूमि के तीन बराबर हिस्से किए जाएं। राम मूर्ति वाला पहला हिस्सा रामलला विराजमान को दिया गया। राम चबूतरा और सीता रसोई वाला दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़ा को दिया गया और बाकी बचा हुआ तीसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले को हिन्दू महासभा और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी। 9 मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने पुरानी स्थिति बरकरार रखने का आदेश दे दिया, तब से मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

नई दिल्ली। 2019 लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की राजनीतिक बिसात पर क्या अयोध्या का राम मंदिर भी रखा जाएगा, इस बात को लेकर मंथन शुरू हो चुका है। इसी कड़ी में 5 अक्टूबर को राम जन्मभूमि न्यास अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास के नेतृत्व में दिल्ली में बैठक होगी। संतो की बैठक के लिए विश्व हिंदू परिषद ने सभी संतों को पत्र जारी किया है और राम मंदिर निर्माण के लिए निर्णय लेने के लिए बैठक का न्योता भेजा है। बताया जा रहा है कि इस बैठक में विश्व हिंदू परिषद संत समाज ये निर्णय लेगा कि राम मंदिर मामले में आगे क्या होना चाहिए। राम मंदिर के मुद्दे पर वीएचपी के सुरेंद्र जैन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का कब तक इंतजार किया जा सकता है। जब इस विषय पर इतना विलंब हो चुका है, तो हमने इस आंदोलन के लिए हमारी आगे की क्या नीति हो इसके लिए संतों की बैठक 5 अक्टूबर को बुलाई है। जब सुप्रीम कोर्ट की तरफ से इस फैसले को लेकर इतनी देरी की जा चुकी है, तो हमने इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाने का फैसला किया है। अयोध्या विवाद का मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले एक बार फिर मंदिर निर्माण का मुद्दा चर्चा में है। अभी कुछ दिन पहले ही आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने राम मंदिर के निर्माण में कानूनी अड़चन के कारण हो रही देरी को एक तरफ रखते हुए कहा था कि सामान्य जनता इसके लिए धैर्य नहीं रख सकेगी, इसलिए अयोध्या में जल्द से जल्द मंदिर का निर्माण होना चाहिए। उन्होंने कहा था कि अगर समाज के सभी लोग सत्य को समझना चाहें और उसे स्वीकार करने के लिए तैयार हों तो किसी भी मुद्दे पर हिंसा का त्याग करते हुए एक शांतिपूर्ण हल प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन, राम मंदिर जैसे गंभीर विषय पर इस तरह के तर्क देना कि राम यहां पैदा ही नहीं हुए, आपसी सामंजस्य को तोड़ता है और इससे टकराव का रास्ता तैयार हो जाता है। इससे बचना चाहिए।

क्या है राम मंदिर विवाद?

साल 1989 में राम जन्म भूमि और बाबरी मस्जिद जमीन विवाद का ये मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा था। 30 सितंबर 2010 को जस्टिस सुधीर अग्रवाल, जस्टिस एस यू खान और जस्टिस डी वी शर्मा की बेंच ने अयोध्या विवाद पर अपना फैसला सुनाया। फैसला हुआ कि 2.77 एकड़ विवादित भूमि के तीन बराबर हिस्से किए जाएं। राम मूर्ति वाला पहला हिस्सा रामलला विराजमान को दिया गया। राम चबूतरा और सीता रसोई वाला दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़ा को दिया गया और बाकी बचा हुआ तीसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले को हिन्दू महासभा और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी। 9 मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने पुरानी स्थिति बरकरार रखने का आदेश दे दिया, तब से मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।