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19 टन आलू बेचने पर किसान को मिले मात्र 490 रुपये, PM को किया मनीआर्डर

Farmer Got Only 490 Rupees After Selling 19 Thousand Kilograms Of Potato

By रवि तिवारी 
Updated Date

यूपी। किसान किन हालातों से गुजर रहे हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 19 हजार किलो आलू के दाम किसान को महज 490 रुपये मिले हैं। यदि इसका हिसाब बनाया जाए तो किसान को प्रति 50 किलो के पैकेट पर 1.33 रुपये ही मिले। उसकी लागत 500 रुपये के आसपास आई थी। किसान ने इस लेन-देन के बाद हाथ में आए 490 रुपये का मनीऑर्डर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को भेजा है। उनके समक्ष आलू किसानों की बर्बादी को रखा है। मामला उत्तर प्रदेश के आगरा की है।

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बरौली अहीर के नगला नाथू निवासी प्रदीप शर्मा ने बीते साल लगभग 10 एकड़ जमीन में आलू की बुवाई की। इसमें करीब 1150 पैकेट (50 किग्रो प्रति पैकेट) आलू की पैदावार हुई। प्रदीप ने 24 दिसंबर को 368 पैकेट (18828 किग्रा) आलू महाराष्ट्र की अकोला मंडी में बेचा। ये आलू 94677 रुपये में बिका। इसमें से 42030 रुपये मोटर भाड़ा, 993.60 रुपये उतराई, 828 रुपये कांटा कटाई, 3790 दलाली, 100 रुपये ड्राफ्ट कमीशन, 400 रुपये छटाई में खर्च हो गए। 1500 रुपये नकद ले लिए। कुल खर्च 48187 रुपये निकालकर 46490 रुपये मिले।

महाराष्ट्र में बेचा था आलू

प्रदीप शर्मा ने बताया कि उन्होंने महाराष्ट्र की मंडी में आलू बेचा था। उन्होंने एक हैक्टेयर खेत में करीब 19 हजार किलो आलू पैदा किया था। ये पूरा आलू उन्होंने महाराष्ट्र में अच्छी कीमत मिलने की उम्मीद में बेचा था। आलू बेचने के बाद उन्होंने मंडी तक उसकी ढुलाई और कोल्ड स्टोरेज का किराया दिया। इसके बाद उनके पास केवल 490 रुपये बचे। इसके बाद प्रदीप शर्मा ने मंगलवार को ये रकम प्रधानमंत्री कार्यालय को ड्रॉफ्ट बनवाकर भेज दी। प्रदीप शर्मा के अनुसार सरकारें किसानों को उत्पादन का उचित मूल्य दिलाने की बात तो करती हैं, लेकिन ऐसा होता नहीं है। इसलिए किसानों की स्थिति दयनीय बनी हुई है।

कई मामले सामने आए

हाल में खंदौली के एक किसान के साथ भी ऐसा ही मामला हुआ था। उजरई गांव के रहने वाले दरयाब सिंह ने पुणे मंडी में आलू बेचा था। सारे खर्च के बाद उनके हाथ 604 रुपये लगे। किसान नेताओं का कहना है कि ऐसे हालात इन दो किसानों के ही नहीं हैं। कई अन्य को ऐसे अनुभव हो चुके हैं। लागत निकलना तो दूर की बात है। किसानों के हिस्से इतनी रकम भी नहीं आ रही कि वे अगली खेती के बारे में सोच सकें। अपने घर का खर्चा चला सकें।

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