उप्र में भ्रूणहत्या रोकने को आवंटित धन आधा भी खर्च नहीं

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश सरकार ने कन्या भ्रूणहत्या रोकने के लिए आवंटित धन में से आधे का इस्तेमाल भी नहीं किया। भारत के नयंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है और इसमें कहा गया है कि इससे वैश्विक लिंग सूचकांक में देश की स्थिति प्रभावित हुई है।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सांख्यिकी रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश भारत का सर्वाधिक आबादी वाला राज्य है, जिसकी प्रजनन दर बिहार के बाद देश में सबसे ज्यादा है, जहां के ग्रामीण क्षेत्र की औसत महिला कम से कम तीन बच्चे जनती है। इस राज्य में बच्चे के लिंगानुपात में तेजी से गिरावट आ रही है। यहां 0 से 6 साल की उम्र के प्रत्येक 1000 लड़के के अनुपात में लड़कियों की संख्या घटकर 902 रह गई है (2011 की जनगणना के मुताबिक), जबकि 2001 में 916 थी, 1991 में 927 और 1981 में 935 थी।



इसी दौरान पूरे देश का लिंगानुपात 0 से 6 साल की उम्र के प्रत्येक 1000 लड़के के अनुपात में लड़कियों की संख्या 914 रही है। (2011 की जनगणना के मुताबिक) नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि यूपी में 2015 में लिंगानुपात गिरकर 883 रह गया है, जोकि स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली की डेटा के आधार पर कैग रिपोर्ट में कही गई है। प्रकृति भी लड़कियों की तुलना में अधिक लड़के पैदा करती है, क्योंकि लड़कों में लड़कियों की तुलना में नवजात अवस्था में अधिक बीमारियां होती हैं। इसलिए इसे देखते हुए आदर्श लिंगानुपात 1000 लड़कों पर 943 से 954 लड़कियों के बीच होनी चाहिए।

वर्ष 2001 से ही भारत में लिंगानुपात खासतौर से यूपी में इसके नीचे गिरता जा रहा है। इससे पता चलता है कि कन्या भ्रूणहत्या बेरोकटोक जारी है। सीएजी की रिपोर्ट में लिंग चयनात्मक गर्भपात रोकने के लिए पीसी-पीएनडीटी एक्ट को लागू करने में राज्य सरकार की विफलता और अनिच्छा की खिंचाई की गई है। इस कानून का लक्ष्य अल्ट्रासाउंड क्लिनिकों की निगरानी करना है, ताकि लिंग की जांच कर होनेवाली कन्या भ्रूणहत्या को रोका जा सके।

राज्य में अगले पांच महीने बाद विधानसभा चुनाव होने वाला है, ऐसे में कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि सीएजी की यह रिपोर्ट राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनेगी। कन्या भ्रूणहत्या के खिलाफ अभियान चलाने वाले राष्ट्रीय निरीक्षण और निगरानी समिति (जिसकी स्थापना पीसी-पीएनडीटी एक्ट के तहत की गई है) के सदस्य साबू जार्ज का कहना है, “यह नेताओं के लिए अजन्मी लड़कियों के खिलाफ अभियान चलाने का वक्त है। अतीत में यूपी में चुनावों के दौरान देखा गया है कि लोग बुनियादी मानव विकास के मुद्दों की बजाय जाति और संप्रदाय को महत्व देते हैं।”

साल 2010 से 2015 के बीच यूपी जो सबसे कम लिंगानुपात वाले 10 राज्यों में से एक है, ने दावा किया कि उसे लिंगचयनात्मक गर्भपात रोकने के लिए 20.26 करोड़ (30 लाख डॉलर से अधिक) रुपये की जरूरत है। इसके बाद केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत राज्य को 35 फीसदी (7.09 करोड़ रुपये) की राशि जारी की। लेकिन इस धन में से राज्य पांच सालों में केवल 54 फीसदी (3.86 करोड़ रुपये) रकम ही खर्च कर पाई, जोकि उसके अपने अनुमान का महज 20 फीसदी है।

सीएजी की रिपोर्ट में बताया गया है कि राज्य ने नैदानिक केंद्रों से नवीनीकरण शुल्क और पंजीकरण शुल्क के रूप में अतिरिक्त 1.9 करोड़ रुपये हासिल किए, जिसके खर्च नहीं किया और वे सेविंग्स बैंक एकाउंट में पड़े हैं।सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट ‘गुमशुदा बेटियां’ में कहा गया है कि ज्यादातर महिलाओं की सशक्तीकरण योजनाओं में, उत्तर प्रदेश 46 से 100 फीसदी तक धन खर्च ही नहीं करता है, जोकि गलत तरीके से क्रियान्वयन के कारण होता है। इसमें कहा गया, “इनमें से ज्यादातर योजनाएं लिंग असमानता को कम करने के अपने लक्ष्य को लागू करनेवाली एजेंसियों के अक्षम निष्पादन, शासन द्वारा अप्रभावी निगरानी और योजना की कमी के कारण प्राप्त नहीं कर पाती है।”

लेखा परीक्षा में पाया गया कि नैदानिक केंद्रों में गर्भवती महिलाओं के अल्ट्रासोनोग्राफी के दौरान ली गई तस्वीरों का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता है जो कि पीसी-पीएनडीटी एक्ट के तहत जरूरी है। राज्य 71 जिलों में से 20 जिलों में नैदानिक केंद्रों को निरीक्षण किया गया कि क्या अनिवार्य नियमों का पालन किया जा रहा है और इसकी निगरानी की जा रही है या नहीं। इसमें पाया गया कि 68 फीसदी मामलों में महिलाओं के पास अल्ट्रासाउंड जांच के जरूरी डॉक्टर का रेफरल स्लिप तक नहीं था। इस लापरवाही के बावजूद, ऑडिट में पाया गया कि ‘सर्वेक्षण वाले जिलों में 1,652 पंजीकृत नैदानिक केंद्रों में 936 दोषी केंद्रों को लापरवाही को लेकर जिलाधिकारी द्वारा कारण बताओ नोटिस जारी किया, लेकिन इनमें से किसी पर न तो कोई कार्रवाई की गई और न ही किसी प्रकार का जुर्माना लगाया गया।’

उत्तर प्रदेश के आकार और जनसंख्या के कारण लिंग असमानता से निपटने के लिए राज्य की अयोग्यता से वैश्विक मानव विकास सूचकांक में भारत के प्रदर्शन में सुधार की क्षमता पर काफी प्रभाव पड़ता है। हाल ही में विश्व आर्थिक मंच की जेंडर गैप इंडेक्स में भारत 145 देशों में से 108 वें स्थान पर था, जबकि हमारे पड़ोसी श्रीलंका (84) और चीन (91) हमसे बेहतर थे। जार्ज ने कहा, “देश की हर चौथी लड़की यूपी में पैदा होती है। इसलिए राज्य के लिंगानुपात में गिरावट से देश का समग्र बाल लिंग अनुपात कम हो जाता है। हम 2021 में रैंकिंग में किसी सुधार की संभावना नहीं देखते जब तक देश के सबसे बड़े राज्य में इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया जाता है।”



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