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दुखद: Assam के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का कोरोना के चलते हुआ निधन, CAA के खिलाफ पहुंचे थे सुप्रीम कोर्ट

Former Assam Chief Minister Tarun Gogoi Passed Away Due To Corona Supreme Court Against Caa

By आराधना शर्मा 
Updated Date

नई दिल्ली: असम के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तरुण गोगोई  का सोमवार को कोरोना के चलते निधन हो गया। इस बात की जानकारी, असम के स्वास्थ्य मंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने दी 86 साल के गोगोई पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। डॉक्टरों ने सोमवार सुबह जानकारी दी थी कि गोगोई की हालत बेहद बेहद नाजुक है।

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गोगोई की बिगड़ती हालत को देखते हुए कुछ देर पहले ही असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल अपना डिब्रूगढ़ दौरा रद्द कर बीच रास्ते से ही गुवाहटी लौट गए थे। तरुण गोगोई तीन बार असम के मुख्यमंत्री रह चुके थे। उग्रवाद की समस्या से जूझते असम को अवसरों की धरती में बदलने का जब भी जिक्र होगा, तो पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का नाम सबसे आगे होगा।

दरअसल, वह गोगोई ही थे, जिनके कार्यकाल में कॉरपोरेट ने असम की धरती पर कदम रखा। लगातार पंद्रह साल तक मुख्यमंत्री रहे, प्रदेश को पहचान दिलाई। पर अपनी सरकार के नंबर दो के नंबर एक बनने की राह में बाधा बनना उन्हें भारी पड़ा और हेमंत बिस्वा सरमा को गंवाने की कीमत उन्हें अपनी सरकार गंवाकर चुकानी पड़ी।

तरुण गोगोई  का कार्यकाल 

छह बार सांसद और दो बार केंद्रीय मंत्री रहे तरुण गोगोई ने 2001 में प्रदेश की राजनीति में कदम रखा। उन्होंने लगातार तीन बार 2001, 2006 और 2011 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की। इस दौरान हेमंत बिस्वा सरमा नंबर दो की हैसीयत में रहे। हर बाप की तरह तरुण गोगोई भी अपनी राजनीतिक विरासत अपने बेटे और लोकसभा सांसद गौरव गोगोई को सौंपना चाहते थे। इसलिए, हेमंत बिस्वा सरमा कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए।

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मुख्यमंत्री के तौर पर तरुण गोगोई ने सभी को साथ लेकर चलने की कोशिश की। मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होंने मौलाना बदुरुद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ पार्टी को कभी तरजीह नहीं दी। वर्ष 2016 में पार्टी के अंदर एक बड़ा तबका एआईयूडीएफ के साथ गठबंधन की वकालत कर रहा था, पर तरुण गोगोई तैयार नहीं हुए। उनकी दलील थी कि इससे प्रदेश र्में हिंदू-मुस्लिम विभाजन बढ़ जाएगा। हालांकि इस बार कांग्रेस-यूडीएफ हाथ मिला सकते हैं।

वह कार्यकर्ताओं से सीधा संपर्क रखने के साथ लोगों से भी जुड़े रहते थे। हर मुद्दे पर उनकी स्पष्ट राय होती थी। यही वजह है कि जब सीएए का मुद्दा आया तो उन्होंने 36 साल बाद वकील के तौर पर वापसी करने में देर नहीं की। वह वकील के लिबास में सुप्रीम पहुंचे और नागरिकता कानून के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सरकार के खिलाफ पक्ष रखा।

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