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काशी में दशकों बाद गंगा साफ दिखी गंगा, पानी की गुणवत्ता में भी हुआ सुधार

Ganga Clearly Visible In Kashi After Decades Water Quality Also Improved

By बलराम सिंह 
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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देव नदी गंगा को स्वच्छ एवं निर्मल बनाने के लिए नमामि गंगे योजना शुरू की थी। मोदी सरकार के साढ़े पांच साल बीतने और 8 हजार करोड़ से ज्यादा खर्च के बाद भी गंगा साफ न हो पाई। हालांकि अब लॉकडाउन के 28 दिन बाद यहां स्थिति बदल गई है। सोशल मीडिया पर यहां के घाटों से साफ बहती गंगा की तस्वीरें नजर आ रही हैं। सेंट्रल और स्टेट पॉल्यूशन बोर्ड और एनजीओ का डेटा भी कुछ यही कहानी बयां कर रहा है।

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संकट मोचन फाउंडेशन की स्वच्छ गंगा रिसर्च लेबोरेटरी में भी गंगा के पानी के स्तर में सुधार देखा गया है। इसके प्रेसिडेंट और बीएचयू प्रोफेसर विशंभर नाथ मिश्र बताते हैं कि काशी के 2 घाटों पर हमने 6 मार्च और 4 अप्रैल को सैम्पल लिए थे। ताजी रिपोर्ट में नतीजे अच्छे आए हैं।

गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण विशेषज्ञ बीएचयू प्रोफेसर बीडी त्रिपाठी बताते हैं कि शहर में हमेशा करीब 1 लाख तक तीर्थयात्री रहते हैं। इन दिनों ये भीड़ यहां से गायब है। काशी में शवों के जलने में 40 प्रतिशत से ज्यादा कमी आई है। इसके अलावा काशी अब एक इंडस्ट्रियल हब भी बन चुका है। यहां सिल्क फैब्रिक, आइवरी वर्क्स, परफ्यूम बनाने समेत कई इंडस्ट्रियां हैं। अब ये भी सभी बंद पड़ी हुई हैं। इनसे निकलने वाला कैमिकल भी गंगा में नहीं मिल रहा है। इन कारणों के चलते पानी का स्तर सुधर रहा है।

प्रोफेसर बीडी त्रिपाठी कहते हैं कि काशी में जहां-जहां नाले गिरते हैं, उन्हें छोड़कर बाकी जगह पर गंगा 30 प्रतिशत से ज्यादा स्वच्छ हुई होगी। 35 से ऊपर नालों से हर दिन 350 मीलियन लीटर गंदा पानी नालों द्वारा जाता है । 4 मई को जब फिर से इन घाटों का सैम्पल लिया जाएगा तो गंगा का पानी और ज्यादा साफ मिलेगा।

यूपी पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने 9 अप्रैल को नदी के प्रवाह के साथ बहते पानी और उथले पानी का सैम्पल अलग-अलग जगह से इकट्ठा किया था। संगम में मिलने से ठीक पहले गंगा में बायो कैमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) 2.4 मिली ग्राम/ लीटर पाया गया। पहले यह 2.8 था। नदी के पानी का बीओडी जितना कम होता है, पानी उतना बेहतर होता है। ठीक इसी तरह नदी का फीकल कॉलीफार्म (पशू मल की मात्रा) भी घटा है। 13 मार्च को संगम के ठीक पहले गंगा का फीकल कॉलिफार्म 1300 एमपीएन/100 एमएल था, वो 9 अप्रैल तक घटकर 820 एमपीएन पर आ गया।

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उत्तराखंड से निकलकर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल होते हुए गंगा का पानी बंगाल की खाड़ी में गिरता है। इन पांचों राज्यों से सोशल मीडिया पर गंगा के साफ-स्वच्छ पानी की तस्वीरों की बाढ़ सी आ गई है। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) के डेटा में भी यही बात सामने आई है। सीपीसीबी के रियल टाइम वाटर मॉनिटरिंग डेटा के मुताबिक, गंगा नदी में अलग-अलग जगह पर स्थित 36 मॉनिटरिंग यूनिट्स में से 27 जगह पर पानी नहाने और मछली और बाकी जलीय जीवों के लिए अनुकूल पाया गया है। पहले उत्तराखंड की 3-4 जगहों को छोड़ दें तो उत्तरप्रदेश में प्रवेश के बाद से बंगाल की खाड़ी में गिरने तक नदी का पानी नहाने योग्य नहीं था।

भारत सरकार ने जून 2014 में नमामि गंगे योजना शुरू की थी। कोशिश यही थी कि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में ही गंगा को पूरी तरह साफ-स्वच्छ कर दिया जाए। 29 फरवरी 2019 तक पिछले साढ़े पांच सालों में गंगा की साफ-सफाई पर 8,342 करोड़ रुपए खर्च हुए। कुल 310 प्रोजेक्ट की नींव रखी गई,116 पूरे भी हो गए। 152 सीवरेज इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट भी थे, इनमें से भी 46 कम्पलीट हो चुके। लेकिन आज से एक महीने पहले तक गंगा के पानी में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं देखा गया था। हालांकि अब स्थिति बदल गई है।

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