रखमाबाई राउत के 153वें जन्मदिन पर गूगल ने डूडल बनाकर किया याद

रखमाबाई राउत के 153वें जन्मदिन पर गूगल ने डूडल बनाकर किया याद

गगूल ने बुधवार को अपने डूडल के माध्यम से डॉ0 रखमाबाई राउत को उनके 153वें जन्मदिन पर याद कर दुनिया का ध्यान इस समाजसेविका की ओर आ​कर्षित करने का काम किया है। डूडल में रखमाबाई को एक डाक्टर की भूमिका में दिखाया गया है, जिसके आस पास कुछ नर्सें मरीजों की देखभाल करतीं नजर आ रहीं हैं। इससे स्पष्ट है कि रखमाबाई एक डॉक्टर थीं, लेकिन बेहद कम लोग ही उनके द्वारा महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए किए गए प्रयासों के बारे में जानते है। चलिए हम रखमाबाई के बारे में कुछ अहम जानकारियों से अवगत करवाते हैं।

रखमाबाई राउत का जिक्र ब्रिटिश शासन काल में डॉक्टर बनी पहली महिला चिकित्सक के रूप में होता है। 22 नवंबर 1964 को मुंबई में जन्मी रखमाबाई राउत के जन्म के दो साल बाद ही उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। उस समय रखमाबाई की मां की उम्र 17 वर्ष की थी। पिता की मृत्यु के बाद रखमाबाई राउत की मां ने उन्हें बड़ी परेशानियों से पाला और पढ़ाया। एक विधवा का जीवन जीते हुए उनकी मां ने रखमाबाई को पढ़ने के लिए स्कूल तो भेजा लेकिन परिजनों के दबाव में आकर उन्होंने 11 साल की उम्र 19 साल के दादा भिकाजी के साथ अपनी बेटी का विवाह कर दिया।

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अपनी पढ़ाई को लेकर बेहद गंभीर रखमाबाई ने शादी के बाद अपने मां के साथ रहते हुए डॉक्टरी की पढ़ाई करने की ठान ली। इस दौरान उनके पति उन पर अपने साथ रहने का दबाव बनाते रहे। अपने इरादों की पक्की रखमाबाई ने उस समय पूरी दृढ़ता के साथ अपने पति का विरोध किया और डाक्टरी की पढ़ाई पूरी कर ली।

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डॉक्टर बनने के बाद रखमाबाई ने दादा भिकाजी के साथ हुए अपने बाल विवाह को स्वीकार करने से मना कर दिया। जिसे दादा भिकाजी ने अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर अदालत में अपील दाखिल कर दी। अदालत ने भी भिकाजी की अपील के आधार पर रखमाबाई के सामने दो विकल्प रखे पहला कि वह दादा भिकाजी के साथ पत्नी के रूप में रहें, दूसरा इस रिश्ते को न निभाने के लिए जेल जाएं।

अदालत के इस फैसले के खिलाफ रखमाबाई ने अपना जबाव देते हुए कहा कि जिस समय उनका विवाह हुआ उनकी उम्र महज 11 वर्ष थी। उस उम्र में न तो उनकी कोई राय थी और न ही वह विवाह जैसी संस्था के विषय में कुछ जानतीं थीं। उस विवाह के लिए उनकी रजामंदी के विषय में ध्यान नहीं रखा गया था।

रखमाबाई ने 1880 के दौर में इस मामले को मीडिया के माध्यम से उठाया और उस दौर के कई समाजसेवी उनके पक्ष में खड़े हो गए। रखमाबाई के इस कदम ने बालविवाह के खिलाफ एक माहौल तैयार कर दिया। अदालत में जो रखमाबाई विवाह तोड़ने के आरोपों का सामना कर रही थी उसे एक समाज सुधारक के रूप में देखा जाने लगा। रखमाबाई को मिले इस समर्थन को देखते हुए दादा भिकाजी ने पीछे हटना पड़ा और उन्होंने विवाह तोड़ने के बदले आर्थिक हर्जाना लेकर मामले में समझौता कर लिया।

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जिसके बाद से रखमाबाई एक डॉक्टर के साथ ही एक समाज सुधारक और महिला स​शक्तिकरण की झंडावरदार बन गईं। बतौर डॉक्टर रखमाबाई राउत ने तीन दशकों से ज्यादा चिकित्सा के क्षेत्र में अपना योगदान दिया। इस दौरान वह महिलाओं से जुड़े सामाजिक मुद्दोें को उठातीं रहीं। 25​ सितंबर 1955 में रख्माबाई की मृत्यु हो गई।

रखमाबाई को महिलाओं की सामाजिक दशा को सुधारने के लिए जो योगदान दिया उसे आज भी याद किया जाता है। लेकिन रखमाबाई की पहचान महाराष्ट्र तक ही सीमित है। हमारी नई पीढ़ी को चाहिए कि हम ऐसे समाज सुधारकों के बारे में भी जाने जिन्होंने अपने जीवन में बेहद कठिन समय ​को जिया और उस पर जीत हासिल की। हमारे इतिहास के ऐसे चरित्र निश्चित ही प्रेरणा के श्रोत हैं।

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