गूगल ने मोहम्मद रफी को समर्पित किया डूडल

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गूगल ने गायक मोहम्मद रफी के 93वें जन्मदिन को ध्यान में रखते हुए रविवार को अपना डूडल तैयार किया है। जिसमें पद्मश्री मोहम्मद रफी को गाने की रिकार्डिंग करते हुए और उस गाने को फिल्म के लिए शूट होते दिखाया है। रफी का जन्म 24 दिसंबर 1924 में पंजाब के अमृतसर जिले के मजीठा इलाके के गांव कोटला सुल्तान सिंह में हुआ था।

साल 1941 में अपना पहला फिल्मी गाना रिकार्ड करने वाले रफी ने 1980 के दशक तक बॉलीवुड में बतौर गायक राज किया। रफी ने अपने दौर में लगभग हर अभिनेता के लिए बतौर गायक अपनी आवाज दी। उस दौर में फिल्म निर्माण का गढ़ रहे लाहौर से अपने करियर की शुरूआत करने वाले रफी साहब ने अपना पहला गाना गायिका जीनत बेगम के साथ रिकार्ड किया था। जो कि एक ​पंजाबी फिल्म का हिस्सा था।

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1944 में मुंबई पहुंचे रफी ने फिल्म गांव की गोरी के लिए बॉलीवुड में अपना पहला गाना गाया था। उन्हें बतौर गायक असली पहचान मिली 1960 में आई गुरुदत्त के फिल्म चौदवीं का चांद के टाइटल सॉग से। जिसके लिए उन्हें फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला। इसके बाद रफी ने बॉलीवुड पर दशकों तक एक छत्र राज किया। उनकी मखमली आवाज और गायन अंदाज का जादू दुनिया पर ऐसा चला कि रफी फिल्म की सफलता की गारंटी बन गए। हर अभिनेता रफी की डिमांड करने लगा। और देखते देखते रफी का कद बढ़ता चला गया, 1967 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा।

1977 में रफी साहब को उनके गाने क्या हुआ तेरा वादा के लिए राष्ट्रीय अवार्ड दिया गया। सीधे शब्दों में कहा जाए तो रफी ने बतौर गायक जो सम्मान और कद बॉलीवुड में हासिल किया वह उनसे पहले किसी और गायक को नहीं मिला था। 31 जुलाई 1980 को रफी साहब ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। रफी की अंतिम यात्रा में मुंबई शहर की सड़कों पर उमड़ी भीड़ से उनकी लोकप्रियता का अंदाज लगाया जाता है। जानकार बताते हैं कि जिस रास्ते से रफी साहब की अंतिमयात्रा गुजरी थी उस रास्ते पर पैर रखने के लिए जगह नहीं थी। लोग अपने मकानों की छतों और छज्जों पर आवाज के जादूगर के अंतिम दर्शन के लिए घंटों तक लटके रहे थे।

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रफी साहब के जीवन से जुड़े कुछ तथ्य —

.मोहम्मद रफी ने अलग अलग भाषाओं में 7,405 गानों में अपनी आवाज।
.उन्होंने 7 बार फिल्म फेयर अवार्ड मिला।
.उन्होंने भारत की 13 भाषाओं और दुनिया के 6 अलग अलग देशों की भाषाओं में गाने गाए।
.गायकी सीखने से पहले रफी साहब लाहौर में एक हज्जाम का काम करते थे।
.रफी की खोज आॅल इंडिया रेडियो के लाहौर स्टेशन ने की थी।
.लाहौर में उस्ताद अब्दुल वाहिद खान से उन्होंने गायन के गुर सीखे।
.रफी साहब 1945 में बनी दो फिल्मों में नजर भी आए जिनमें से एक फिल्म थी लैला मजनू।
.रफी साहब को गायन का शौक अपने पैतृक गांव के एक फकीर से मिला था, जो उनके गलियों में गाता घूमता था।
.संगीतकार नौशाद ने रफी साहब को फिल्मों में बतौर पार्श्वगायक स्थापित किया।
.नौशाद और रफी की जोड़ी ने बॉलीवुड को 149 गाने दिए जिनमें से 80 सोलो सॉग थे।
. बाबुल की दुआएं लेती जा, इस गाने की रिकार्डिंग में रफी साहब रो दिए थे। बाद में इसी गाने के लिए उन्हें नेश्नल अवार्ड मिला था। इस गाने की रिकार्डिंग पर रोने का खुलासा उन्होंने स्वयं अपने साक्षात्कार में किया था।

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गूगल ने गायक मोहम्मद रफी के 93वें जन्मदिन को ध्यान में रखते हुए रविवार को अपना डूडल तैयार किया है। जिसमें पद्मश्री मोहम्मद रफी को गाने की रिकार्डिंग करते हुए और उस गाने को फिल्म के लिए शूट होते दिखाया है। रफी का जन्म 24 दिसंबर 1924 में पंजाब के अमृतसर जिले के मजीठा इलाके के गांव कोटला सुल्तान सिंह में हुआ था। साल 1941 में अपना पहला फिल्मी गाना रिकार्ड करने वाले रफी ने 1980 के दशक तक बॉलीवुड…
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