सरकारी आवासों में रह रहे पुलिसकर्मियों को राहत

इलाहाबाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित कर कहा है कि जब तक प्रमुख सचिव गृह यह तय नहीं कर लेते कि पुलिस मुख्यालय, जोन, परिक्षेत्र या जिला में से किसे माना जाय तब तक मुख्यालय में सरकारी आवासों मे रह रहे याची सिपाहियों से पेनल रेंट की वसूली न की जाय। कोर्ट ने आवासों से उन्हें हटाने के आदेश पर भी रोक लगा दी है। यह आदेश जस्टिस अमित बी. स्थालेकर ने झांसी में सरकारी क्वार्टर में रह रहे सिपाही बाबूराम व कई अन्य सिपाहियों की तरफ से दायर अलग-अलग याचिकाओं पर पारित किया है।



सिपाहियों की तरफ से अधिवक्ता विजय गौतम का कहना था कि शासनादेश 28 जनवरी 1998 में हेडक्वार्टर परिभाषित किया गया है। बहस थी कि वर्तमान केस में झांसी रेंज का मतलब हुआ कि मुख्यालय झांसी है। जबकि सरकारी वकील माता प्रसाद का कहना था कि हेड क्वार्टर जोन भी हो सकता है, रेंज भी कहा जा सकता है और जिला मुख्यालय को भी हेडक्वार्टर कहा जा सकता है। याची कान्सटेबिलों के वकील गौतम का तर्क था कि याची का सरकारी आवास झांसी रेंज हेडक्वार्टर में है तो उसकी तैनाती रेंज में कही भी होगी तो उसके सरकारी क्वार्टर को अनाधिकृत कब्जा कहकर उससे पेनल रेंट की वसूली करना गलत होगा। कोर्ट का कहना था कि ऐसा लगता है कि सरकार की अभी तक क्वार्टर आवंटन की कोई स्पष्ट नीति नहीं है कि वह सिपाहियों को सरकारी क्वार्टर रेंजवाइज, जोनवाइज अथवा डिस्ट्रिकवाइज आवंटित करते हों।

आवास आवंटन को लेकर मुख्यालय किसे माना जाय यह अस्पष्ट है। हाईकोर्ट ने कहा कि यह पूरे प्रदेश का कान्सटेबिलों के सरकारी आवास आवंटन का मामला है। ऐसे में कोर्ट ने प्रमुख सचिव गृह को निर्देश दिया है कि वह आवास आवंटन व हेडक्वार्टर को स्पष्ट करते हुए चार माह में निर्णय ले। इस बीच कोर्ट ने पेनल रेंट की वसूली याची सिपाहियों से करने को लेकर यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया है और याचिकाएं निस्तारित कर दी हैं।



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