GST को जिक्र से हकीकत बनने में बीते 21 साल, जानिए इतिहास

नई दिल्ली। 135 करोड़ की आबादी और 120 लाख करोड़ रूपए की अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत जैसे देश की टैक्स प्रणाली इतनी जटिल थी कि शीर्ष उद्योगपतियों से लेकर एक छोटा कारोबारी तक कोई उसे अकेले नहीं समझ सकता। आजादी के 70 साल बीतने के बाद भी इस देश में एक टैक्स की बात केवल चर्चाओं तक सीमित थी। जो आज यानी 30 जून 2017 को जीएसटी (GST) यानी गुड्स एंड सर्विस टैक्स की लांचिंग के साथ एक हकीकत बनने जा रही है। जीएसटी के लागू होने के साथ ही 70 साल पुराने करीब दो दर्जन अलग—अलग केन्द्रीय और राज्य टैक्सों का अंत हो जाएगा।

आइये हम आपको बताते हैं करीब 21 साल पहले शुरू हुई ​जीएसटी की चर्चा से लेकर आज उसके हकीकत बनने तक की पूरी कहानी।

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1986 में तत्कालीन केन्द्रीय वित्त मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने संसद में एक्साइज टैक्स प्रणाली को सरल और बेहतर तरीके से लागू करने की सिफारिश की थी। यह एक चर्चा मात्र थी। जिस पर संसद का ध्यान तो कई बार गया लेकिन राजनीतिक ईच्छा शक्ति की कमी के चलते इसे ठंडे बस्ते में डाले रखा गया।

2000 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई ने इस दिशा में एक कदम आगे बढ़ाते हुए पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता के नेतृत्व में एक कमिटी का गठन किया। जिसे जीएसटी का मॉडल तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई।

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इस दिशा में अगला कदम भी प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई ने ही 2003 में उठाया और सरकार के आर्थिक सलाहकार विजय करकरे के नेतृत्व में एक टास्क फोर्स का गठन कर कर सुधार के लिए सुझाव मांगे गए।

2004 में विजय करकरे ने वाजपेई सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में बताया कि मौजूदा टैक्स प्रणाली को हटाकर जीएसटी को लागू किया जाना चाहिए।

28 फरवरी 2006 में पहली बार जीएसटी केन्द्रीय वित्तमंत्री बजट सत्र के मुख्य संबोधन का हिस्सा बना सका। तत्कालीन वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने 1 अप्रैल 2010 तक जीएसटी को लागू करने के लक्ष्य का जिक्र करते हुए राज्य सरकारों के वित्तमंत्रियों की आधिकारिक कमिटी बनाकर जीएसटी को लागू करने का रोड़मैप तैयार करने की बात कही।

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2008 में राज्यों के वित्तमंत्रियों वाली कमिटी का औपचारिक गठन किया गया। इस कमिटी ने अप्रैल 2008 में जीएसटी को लागू करने के लिए अपने सुझावों की रिपोर्ट वित्तमंत्रालय को सौंप दी।

नवंबर 2009 में इस कमिटी द्वारा लिए गए निर्णयों को बहस के लिए जनता के बीच ले जाने के लिए रखा गया।

2010 में तत्कालीन वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने असीम दासगुप्ता के नेतृत्व वाली कमिटी द्वारा प्रस्तावित जीएसटी के मूल मॉडल को आगे बढ़ाते हुए 2010 में नई कर प्रणाली को लागू करने की बात दोहराई। वहीं विपक्ष में रही बीजेपी ने दासगुप्ता मॉडल का विरोध किया।

फरवरी 2010 में जीएसटी लागू करने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाते हुए प्रणव मुखर्जी ने ​राज्य सरकारों द्वारा बसूले जाने वाले कॉमर्शियल टैक्सों को कम्प्यूटरीकृत करने का फैसला लिया। और जीएसटी के लागू होने की तिथि को आगे बढ़ाने की बात कही।

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21 मार्च 2011 में यूपीए 2 में 115वे संविधान संशोधन बिल के रूप में जीएसटी को चर्चा के लिए लोकसभा में पेश किया गया।

29 मार्च 2011 को जीएसटी बिल वित्तीय मामलों पर जसवंत सिन्हा के नेतृत्व वाली संसदीय स्थायी समिति को सौंपा गया। इस दौरान पश्चिम बंगाल के वित्तमंत्री असीम दासगुप्ता ने इस्तीफा दे दिया और उनकी जगह केरल के वित्तमंत्री केएम मनि ने ली।

नवंबर 2012 में एकबार फिर जीएसटी को लागू करवाने के प्रयासों ने जोर पकड़ा और वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने राज्यों के वित्तमंत्रियों की समिति की बैठक बुलाकर मतभेद दूर करने की नियत से अंतिम सुझाव मांगते हुए 31 दिसबंर 2012 को जीएसटी लागू करने की तिथि तय की।

फरवरी 2013 में चिदंबरम ने जीएसटी को लेकर केन्द्र और प्रदेश सरकारों की बीच वित्तीय घाटे को लेकर खड़ी हुई समस्या को दूर करने के लिए अपने बजट अभिभाषण में 9000 करोड़ के हर्जाने के प्रावधान का जिक्र किया।

अगस्त 2013 में संसदीय स्थाई समिति ने अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपते हुए जीएसटी में कुछ बदलावों की सिफारिश की।

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सितंबर 2013 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जीएसटी का विरोध करते हुए कहा कि नई कर प्रणाली के लागू होने से गुजरात को प्रतिवर्ष 14000 करोड़ का नुकसान होगा।

2014 में जीएसटी को लेकर प्रथम प्रयास करने वाली राजग सरकार की सत्ता में वापसी हुई और संसदीय स्थायी समिति ने जीएसटी बिल को हरी झंडी दे दी।

18 दिसंबर 2014 केन्द्रीय कैबिनेट ने 122वें संविधान संशोधन के रूप में जीएसटी बिल को पास कर दिया। जिसे 19 दिसंबर को लोकसभा में पास करवाने के लिए रखा गया लेकिन कांग्रेस ने इसका विरोध किया।

फरवरी 2015 में वित्तमंत्री ने अप्रैल 2016 तक जीएसटी को लागू करने की समयसीमा निर्धारित की। 6 मई को लोकसभा में जीएसटी संसोधन बिल बहुमत के साथ पास हो गया। 12 मई को यह बिल राज्यसभा में पेश हुआ जहां कांग्रेस ने जीएसटी को 18 प्रतिशत तक सीमित रखने की मांग उठाते हुए संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजने की मांग की।

अगस्त 2015 में जीएसटी बिल राज्यसभा में पेश हुआ लेकिन कांग्रेस के बहुमत वाले सदन में बीजेपी इस बिल को पास करवाने में असफल साबित हुई।

करीब एक साल बाद जुलाई 2016 में केन्द्र सरकार ने जीएसटी की दरों को 18 प्रतिशत तक सीमित किए जाने की मांग का विरोध करते हुए प्रदेश सरकारों को अपने पक्ष में ले लिया। जिसके बाद मजबूरत कांग्रेस को पीछे हुटना पड़ा और 3 अगस्त 2016 को राज्यसभा में जीएसटी बिल दो तिहाई बहुमत से पास हो गया।

सितंबर 2016 में 16 राज्यों ने जीएसटी का समर्थन प्रदान कर दिया जिसके बाद राष्ट्रपति ने जीएसटी बिल पर अंतिम मोहर लगा दी।

12 सितंबर 2016 को केन्द्र सरकार ने जीएसटी पर केन्द्रीय परिषद के गठन का निर्णय लिया और 22 से 23 सितंबर के बीच परिषद की पहली बैठक आयोजित करवाई गई। नवंबर तक जीएसटी के लिए पांच स्तरीय टैक्स प्रणाली पर आम राय बना ली गई।

16 जनवरी 2017 को वित्तमंत्री अरुण जेटली ने घोषणा कर दी कि 1 जुलाई 2017 को जीएसटी लागू किया जाएगा। जिसके बाद राज्य सरकारों के साथ उनके वित्तीय घाटे की समस्या के समाधान के रास्ते निकाले गए।

फरवरी 2017 में केन्द्र सरकार ने घोषणा की जीएसटी के लागू होने के पांच साल बाद तक राज्य सरकारों को होने वाले वित्तीय घाटे की भरपाई के लिए हर्जाना दिया जाएगा।

21 जून 2016 तक जीएसटी परिषद ने जम्मूकश्मीर को छोड़कर अन्य सभी राज्यों में जीएसटी को लागू करने के लिए प्रदेश सरकारों का समर्थन प्राप्त कर लिया।

30 जून 2016 यानी आज करीब 21 साल लंबी उठापटक झेलने के बाद जीएसटी एक हकीकत बनने जा रहा है। केन्द्र सरकार ने जीएसटी के उद्घाटन समारोह को आर्थिक आजादी के समारोह के रूप में मनाने का निर्णय लिया है।