मोदी का गुजरात मॉडल फंसा जातीय समीकरण में, कांग्रेस को फायदा

नई दिल्ली। गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 में आरक्षण व जातीय स्वाभिमान एक अहम मुद्दा रहेगा। पिछड़ा वर्ग आरक्षण व पाटीदार आरक्षण आन्दोलन की गुजरात चुनाव में प्रभावकारी भूमिका में कोली मछुआरा व कुणबी पाटीदार की निर्णायक भूमिका रहेगी। गुजरात की सत्ता की चाभी कोली व कुणबी जाति के हाथ में रहेगी। गुजरात के सत्ता सिंघासन पर भाजपा व कांग्रेस में कौन बैठेगा, इसका निर्णय कोली मछुआरा व कुणबी पाटीदार ही करेंगे।

गुजरात में इस समय जो राजनीतिक स्थिति बनी है, उससे यही संकेत मिल रहा है कि कांग्रेस व भाजपा के परम्परागत वोट बैंक में बदलाव होगा। शंकर सिंह बाघेला को तोड़कर भाजपा खेमे में लाने के पीछे क्षत्रिय-राजपूत वोट बैंक में सेंधमारी करना अमित शाह का मकसद रहा है लेकिन शंकर सिंह बाधेला अपना अलग राजनीतिक मंच बनाकर चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुके हैं।

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कांग्रेस के साथ भी शक्ति सिंह गोहिल मजबूत क्षत्रिय नेता हैं। परन्तु आघेला व गोहिल में कोई क्षत्रिय वोट बैंक को पूरी तरह अपने साथ करने का दावा नहीं कर सकता, कारण क्षत्रिय व ब्राह्मण पार्टी कम जातिगत उम्मीदवार के आधार पर मतदान करते रहें हैं। गुजरात के कई क्षेत्रों में क्षत्रिय-राजपूत ओबीसी में शुमार है। कोली समाज जो गुजरात का एक मजबूत आधार वाला समाज है।

भाजपा के साथ कोली सीएम फेस प्रोजेक्ट करने की घोषणा की शर्त पर उसके साथ जाने का निर्णय ले सकता है। आरएसएस के आन्तरिक सर्वे में भाजपा को 57-60 सीटें ही मिलती दिख रही है। इस रिपोर्ट से मोदी व शाह की परेशानी बढ़ी है। कांग्रेस हो या भाजपा सवर्ण जातियों के अलावा कुणबी को ही ज्यादा तवज्जो देती है, जबकि गुजरात में 24.26 प्रतिशत कोली सहित भोई, माछी, खारवा, केवट, कहार, धीवर, माझी, मल्लाह, आदि के साथ 29.84 प्रतिशत आबादी कोली-निषाद मछुआरों की है।

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भाजपा में प्रभावी चेहरे की कमी

गुजरात विधानसभा चुनाव आगामी दिसम्बर महीने में प्रस्तावित है जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के लिए काफी महत्वपूर्ण है। इस समय गुजरात भाजपा में कोई प्रभावी चेहरा नहीं दिखायी दे रहा है। मुद्दो के साथ साथ प्रभावी व्यक्ति ही जीत का आधार होता है। भाजपा में इसकी कमी दिखायी दे रही है। पाटीदार आरक्षण आन्दोलन व आनन्दी बेन पटेल को मुख्यमंत्री पद से हटा कर विजय रूपाणी को सीएम बनाने से कुणबी पाटीदार समाज काफी नाराज हैै।

प्रतिष्ठा लगी है दांव पर

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राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी अहमद पटेल की जीत से कांग्रेस मनोवैज्ञानिक रूप से मजबूत हुई है। अमित शाह व नरेन्द्र मोदी गुजरात चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर हर महीने दौरा कर रहे हैं। परन्तु गुजरात चुनाव में इनका सीधा जुड़ाव न होने से भाजपा कमजोर स्थिति में हो गयी है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष जीतू बाघानी व विजय रूपाणी प्रभावशाली चेहरे नहीं हैं। विगत दिनों बुलेट ट्रेन के बहाने आबे के साथ प्रधानमंत्री गुजरात जाकर चुनावी माहौल बनाने का ही काम किये।

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