देव आनंद के जन्मदिन पर जानिए उनसे जुडी कुछ ख़ास बातें

मुंबई: बॉलीवुड के सदाबहार अभिनेता देव आनंद का आज जन्मदिन है। 26 सितम्बर 1923 को पंजाब में जन्मे देव आनंद का निधन 88 की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से 2011 को हो गया था। उनका अंदाज आज भी उनके हजारों लाखों चाहने वालों के जहन में ज़िंदा है। देव आनंद ने जिंदगी को बड़े ही आंनद से जिया शायद यही कारण है कि वो देव आनंद बने, उनके अन्दर की जिन्दादिली ने उन्हें कभी बूढ़ा नहीं होने दिया।




ख़ास तौर पर लड़कियों के दिल में जगह बनाने वाले देव आनंद ने हिन्दी सिनेमा में दो दशक तक राज किया है। उन्होंने न केवल लेखन, निर्देशन और फिल्म निर्माण में ही हाथ आजमाया बल्की खूब सफलता भी हासिल की। गुजरे जमाने में उनकी आकर्षक अदाओं की एक झलक पाने के लिए प्रशंसक बेताब रहते थे।

देव आनंद का असली नाम धर्मदेव पिशोरीमल आनंद था उनका ये नाम उनको उनके पिता पिशोरीमल से मिला था जो कि पेशे से वकील थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गुरुदास पुर के घोरता गाँव से की फिर उन्होंने डलहौजी में सेक्रेड हार्ट स्कूल से मैट्रिक तक की पढ़ाई की। उसके बाद उन्होंने सरकारी कॉलेज लाहौर से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। देव आनंद का परिवार भी हिन्दी सिनेमा से जुड़ा हुआ था। देव के भाई चेतन आनंद और विजय आनंद भी भारतीय सिनेमा में सफल निर्देशक थे और उनकी बहन शील कांता कपूर प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक शेखर कपूर की मां हैं।

देव आनंद की पहली फिल्म “हम एक हैं” 1947 में प्रभात स्टूडियो में शूट हुई लेकिन यह फिल्म फ्लॉप हो गयी थी जिसकी वजह से वो दर्शकों के दिल में वह अपनी पहचान नहीं बचा सके। इस फिल्म के निर्माण के दौरान प्रभात स्टूडियो में देव की दोस्ती गुरुदत्त से हो गई और दोनों में तय हुआ कि जो पहले सफल होगा, वह दूसरे को सफल होने में मदद करेगा, और जो भी पहले फिल्म निर्देशित करेगा, वह दूसरे को अभिनय का मौका देगा। फिर उसी के दो साल बाद 1948 में देव आनंद की फिल्म ‘जिद्दी’ प्रदर्शित हुई जो उनके करियर की पहली हिट फिल्म साबित हुई। इस फिल्म की कामयाबी के बाद उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा और ‘नवकेतन बैनर’ की स्थापना की।




वर्ष 1950 में उन्होंने नवकेतन के बैनर तले अपनी फिल्म “अफसर” का निर्माण किया जिसके निर्देशन की जिम्मेदारी उन्होंने अपने बड़े भाई चेतन आनन्द को सौंपी और इस फिल्म की अभिनेत्री के लिए उन्होंने सुरैया का चयन किया और अभिनेता के लिए रूप में देव आनंद खुद ही थे। जब उन्होंने फिल्म को बॉक्स आफ़िस में बुरी तरह से असफल होते देखा उसके बाद उन्हें गुरुदत्त की याद आई। फिर उन्होंने अपनी अगली फिल्म बाज़ी के निर्देशन की ज़िम्मेदारी गुरुदात को शौंप दी और बाजी की सफलता के बाद देव आनंद फिल्म उद्दोग में अच्छे अभी नेता के रूप में शुमार होने लगे।

इस बीच देव ने ‘मुनीम जी’, ‘दुश्मन’, ‘कालाबाजार’, ‘सी.आई.डी’, ‘पेइंग गेस्ट’, ‘गैम्बलर’, ‘तेरे घर के सामने’, ‘काला पानी’ जैसी कई सफल फिल्में दी। वर्ष 1971 में उन्होंने फिल्म “हरे रामा हरे कृष्णा” का निर्देशन किया और इसकी कामयाबी के बाद उन्होंने अपनी कई फिल्मों का निर्देशन किया। इन फिल्मों में हीरा पन्ना, देश परदेस, लूटमार, स्वामी दादा, ‘सच्चे का बोलबाला, अव्वल नंबर, बाजी, ज्वैल थीफ, सीआईडी, जॉनी मेरा नाम, अमीर-गरीब, वारंट जैसी कई हिट फिल्में शामिल रहीं।

देव आनंद अभिनेत्री सुरैया से बहुत प्यार करते थे। उनकी ऑटोबायोग्राफी ‘रोमांसिंग विथ लाइफ’ में उन्होंने सुरैया से अपनी मोहब्बत के बारे में विस्तार से लिखा है। उस ज़माने में देव साहब ने सुरैया को तीन हजार रुपये की हीरे की अंगूठी दी थी। हालांकि दोनों के धर्म अलग होने की वजह से सुरैया की नानी इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हुईं और दोनों को अलग होना पड़ा। इसके बाद सुरैया ने कभी शादी नहीं की। देव ने 1954 में कल्पना कार्तिक के साथ शादी की, लेकिन उनकी शादी अधिक समय तक नहीं चल सकी।




देव को वर्ष 1993 में फिल्मफेयर ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’ और 1996 में स्क्रीन वीडियोकॉन ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। बाद में उन्होंने अमेरिकी फिल्म ‘सांग ऑफ लाइफ’ का निर्दशन भी किया। प्रेम कहानी पर आधारित एक फिल्म की शूटिंग अमेरिका में हुई जिसमे मुख्य भूमिका में देव आनंद थे और उनको छोडकर फिल्म के सभी अन्य कलाकार अमेरिका के थे। इतनी सफलताओं के बाद देव आनंद को वर्ष 2001 में भारत सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया। हिन्दी सिनेमा में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए वर्ष 2002 में देव आनंद को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

आस्था सिंह की रिपोर्ट

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