हैप्पी बर्थड़े दादा: कौन भुला पाएगा गांगुली का वो हवा में टी-शर्ट लहराना

कोलकाता। आज के दौर में भारतीय क्रिकेट अगर बुलंदियों की तरफ अग्रसर है तो उसके पीछे सौरभ गांगुली और महेंद्र सिंह धोनी की भूमिका को नहीं भुलाया जा सकता। इस दोनों खिलाड़ियों में खास बात यह है कि जहां कैप्टन कूल का जन्मदिन कल यानि 7 जुलाई को मनाया गया वहीं दादा का जन्मदिन आज है। गांगुली आज अपना 45वां जन्मदिन मना रहे हैं। भारतीय टीम को ‘फर्श से अर्श’ तक पहुंचाने का श्रेय दादा के नाम से मशहूर सौरव गांगुली को ही जाता है। गांगुली ने 11 जनवरी 1992 को ब्रिस्बेन में वेस्टइंडीज के खिलाफ एकदिवसीय करियर की शुरुआत की थी, लेकिन 1996 के इंग्लैंड दौरे पर अपने पहले ही टेस्ट में शतक लगाने के साथ ही वह सुर्खियों में आ गए थे।

दादा का शुरुआती दौर वह दौर था जब भारतीय टीम कई मुश्किल परिस्थितियों से गुजर रही थी, क्रिकेटप्रेमियों को भारतीय टीम से उम्मीदें तो बहुत थी लेकिन टीम अपने ख्याती के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर प रही थे। उस दौर में एक कहावत भी खूब मशहूर हुआ था कि यह भारतीय टीम घर में शेर और विदेशों में ढेर हो जाती है। वास्तविकता भी यही था कि उस समय भारतीय टीम विदेश के तेज और बाउंसी विकेट पर आसानी से हथियार डाल देती थी। टीम इंडिया को इस इमेज से बाहर निकालने का श्रेय सौरव गांगुली को ही जाता है।

ईंट का जवाब पत्थर से…

टीम इंडिया को अक्सर विदेशी टीमें जमकर स्लेज करती थीं। मैदान पर भारतीय टीम कभी भी जवाब नहीं देती थी, लेकिन गांगुली ने इस रवैये को बदल दिया। सौरव ने टीम को सिखाया की ईंट का जवाब पत्थर से देना है और विदेशी टीम को उसी भाषा में जवाब देना है जिस भाषा में स्लेज करती है। भला गांगुली का वह इंग्लैंड दौरा कैसे भूला जा सकता है जब चैम्पियंस ट्रॉफी का फाइनल मुक़ाबला भारत-इंग्लैंड के बीच खेला जा रहा था और इस मैच को जीतने के बाद मौजूदा कप्तान दादा अपनी टी-शर्ट उतार हवा में लहराने लगे थे जिसे देश को लोगों ने जमकर सराहा था।

टीम इंडिया की किस्मत बदल दी…

एक वक्त मैच फिक्सिंग के भूत ने टीम इंडिया पर कई सवाल खड़े कर दिए थे, जब टीम के कई खिलाड़ियों का नाम फिक्सिंग में आया था। तब लगा कि भारतीय क्रिकेट इस बड़े भूंचाल में नहीं बच पाएगा, लेकिन तभी चयनकर्ता ने गांगुली को कप्तान बनाया और दादा ने अपनी जांबाज कप्तानी से टीम इंडिया की किस्मत बदल दी। गांगुली ने टीम को ऐसे मुकाम पर पहुंचाया जो देश ही नहीं बल्कि देश के बाहर भी जीतना जानती थी. गांगुली की कप्तानी में ही टीम इंडिया 1983 के बाद 2003 में वर्ल्डकप के फाइनल तक पहुंची।