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हरियाणा चुनाव: हुड्डा दौड़े तो तेज लेकिन मंजिल पर नहीं पहुंचे

By बलराम सिंह 
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Haryana Elections Factionalism Heavily On Hoodas Hard Work But Late This Time But Not Well

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद कांग्रेस की कमान वापस सोनिया गांधी के पास आई। सोनिया के अध्यक्ष बनते ही हरियाणा के पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा ताकतवर बनकर उभरे। पार्टी ने हरियाणा में उनके हाथों में चुनाव की कमान सौंपी। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी,प्रदर्शन में सुधार होने के बाद भी कांग्रेस बहुमत के जादुई आंकड़े तक नही पहुंची। भूपेंद्र सिंह हुड्डा 17 विधायकों वाली कांग्रेस को 31 तक तो ले गए लेकिन जो तस्वीर उन्होंने उकेरी उसमें रंग नहीं भर सके।

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टिकट वितरण में हुड्डा की चली और 90 में 60 सीटों पर उनके कहने पर टिकट दी गई। बावजूद इसके हरियाणा कांग्रेस में अध्यक्ष बदलने के बाद भी गुटबाजी हावी रही। राज्य के दिग्गज अपने-अपने हिसाब से चुनाव लड़ते नजर आए। कांग्रेस के 31 विधायकों में अकेले हुड्डा खेमे के 22 विधायक हैं। हुड्डा को खुद को साबित करने के लिए 45 दिनों का समय मिला।

पार्टी ने हुड्डा को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश नहीं किया। पार्टी ऐसा इसलिए भी नहीं करना चाहती थी कि भाजपा ने 2014 के चुनाव में जाट बनाम नॉन जाट कर सफलता पाई थी। जबकि हरियाणा के जो नतीजे आए हैं उसमें 90 में करीब 25 विधायक जाट हैं। राज्य में हुड्डा और अशोक तंवर की अदावत करीब तीन सालों से चरम पर थी। पार्टी नेतृत्व हुड्डा की अपेक्षा अशोक तंवर पर अंतिम समय तक भरोसा करता रहा लेकिन तंवर ने न सिर्फ पार्टी नेतृत्व का भरोसा तोड़ा बल्कि राज्य में घूमकर हुड्डा और उनके समर्थकों के खिलाफ आवाज बुलंद किए रहे।

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