हरियाणा: 10 माह पहले पार्टी बनाई, अब तय करेंगे हरियाणा का सीएम

Dushyant chautala
हरियाणा: 10 माह पहले पार्टी बनाई, अब तय करेंगे हरियाणा का सीएम

नई दिल्ली। हरियाणा विधानसभा चुनाव की मतगणना जारी है। मतगणना शुरू होने के बाद कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस आगे हो रही है। ऐसे में दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी किंगमेकर बनकर उभर रही है। पूर्व उप प्रधानमंत्री ताऊ देवीलाल के परपोते दुष्यंत चौटाला की पार्टी जजपा ने भाजपा और कांग्रेस जैसे बड़े दलों की नींद उड़ा दी है। मतगणना शुरू होने से पहले दुष्यंत ने दावा किया था कि हरियाणा में भाजपा और कांग्रेस कोई पार्टी 40 सीटें नहीं ला पाएगी।

Haryana Formed Party 10 Months Ago Now Cm Of Haryana Will Decide :

बता दें दुष्यंत नौ दिसंबर 2018 को जजपा का गठन किया था। महज एक साल के अंदर जेजेपी ने अपनी सियासी जमीन खासी मजबूत की है। हरियाणा की सियासत में ताऊ चौधरी देवीलाल की जबरदस्त पकड़ थी। देवीलाल की पार्टी ने 1987 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में 90 में से 85 सीटें जीतकर तहलका मचा दिया था। उनकी राजनीतिक विरासत को उनके बेटे ओम प्रकाश चौटाला ने संभाला और प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, लेकिन 32 साल के बाद उनकी विरासत संभाल रहा चौटाला परिवार दो धड़ों में बंट गया है। इंडियन नेशनल लोक दल(इनेलो) में फूट हो गई।

इनेलो की कमान जहां ओम प्रकाश चौटाला और उनके छोटे बेटे अभय चौटाला के हाथों में है। भतीजे दुष्यंत चौटाला ने दिसंबर 2018 में अपनी अलग पार्टी जजपा बना ली। बीते 10 महीने में पार्टी तीसरा चुनाव लड़ रही है। पहले जींद उपचुनाव लड़ा, उसके बाद लोकसभा चुनाव और अब विधानसभा चुनाव में पूरी 90 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जजपा, कांग्रेस के साथ जा सकती है। अभय चौटाला की नजदीकी भाजपा से है। ऐसा अकाली दल के मुखिया प्रकाश सिंह बादल से उनकी नजदीकी की वजह से है। दुष्यंत चौटाला और अभय में 36 का आंकड़ा है। ऐसे में दुष्यंत चौटाला कभी नहीं चाहेंगे कि वो भाजपा के खेमे में जाएं।

भाजपा से जाटों की नाराजगी को जजपा ने खूब भुनाया। चुनावी रैलियों में जजपा ने उनसे समर्थन मांगा और जानकारों के अनुसार, जाटों के एक बड़े वोट बैंक का उनको साथ मिला भी। ऐसे में पार्टी, कांग्रेस के साथ जा सकती है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का ये भी कहना है कि जजपा भाजपा को भी अपना समर्थन दे सकती है। इसके लिए भाजपा, जजपा को मुख्यमंत्री के बाद वाले कुछ अहम पदों का ऑफर दे सकती है। फिलहाल नतीजे आने तक कुछ भी स्पष्ट कह पाना मुश्किल है।

नई दिल्ली। हरियाणा विधानसभा चुनाव की मतगणना जारी है। मतगणना शुरू होने के बाद कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस आगे हो रही है। ऐसे में दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी किंगमेकर बनकर उभर रही है। पूर्व उप प्रधानमंत्री ताऊ देवीलाल के परपोते दुष्यंत चौटाला की पार्टी जजपा ने भाजपा और कांग्रेस जैसे बड़े दलों की नींद उड़ा दी है। मतगणना शुरू होने से पहले दुष्यंत ने दावा किया था कि हरियाणा में भाजपा और कांग्रेस कोई पार्टी 40 सीटें नहीं ला पाएगी। बता दें दुष्यंत नौ दिसंबर 2018 को जजपा का गठन किया था। महज एक साल के अंदर जेजेपी ने अपनी सियासी जमीन खासी मजबूत की है। हरियाणा की सियासत में ताऊ चौधरी देवीलाल की जबरदस्त पकड़ थी। देवीलाल की पार्टी ने 1987 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में 90 में से 85 सीटें जीतकर तहलका मचा दिया था। उनकी राजनीतिक विरासत को उनके बेटे ओम प्रकाश चौटाला ने संभाला और प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, लेकिन 32 साल के बाद उनकी विरासत संभाल रहा चौटाला परिवार दो धड़ों में बंट गया है। इंडियन नेशनल लोक दल(इनेलो) में फूट हो गई। इनेलो की कमान जहां ओम प्रकाश चौटाला और उनके छोटे बेटे अभय चौटाला के हाथों में है। भतीजे दुष्यंत चौटाला ने दिसंबर 2018 में अपनी अलग पार्टी जजपा बना ली। बीते 10 महीने में पार्टी तीसरा चुनाव लड़ रही है। पहले जींद उपचुनाव लड़ा, उसके बाद लोकसभा चुनाव और अब विधानसभा चुनाव में पूरी 90 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जजपा, कांग्रेस के साथ जा सकती है। अभय चौटाला की नजदीकी भाजपा से है। ऐसा अकाली दल के मुखिया प्रकाश सिंह बादल से उनकी नजदीकी की वजह से है। दुष्यंत चौटाला और अभय में 36 का आंकड़ा है। ऐसे में दुष्यंत चौटाला कभी नहीं चाहेंगे कि वो भाजपा के खेमे में जाएं। भाजपा से जाटों की नाराजगी को जजपा ने खूब भुनाया। चुनावी रैलियों में जजपा ने उनसे समर्थन मांगा और जानकारों के अनुसार, जाटों के एक बड़े वोट बैंक का उनको साथ मिला भी। ऐसे में पार्टी, कांग्रेस के साथ जा सकती है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का ये भी कहना है कि जजपा भाजपा को भी अपना समर्थन दे सकती है। इसके लिए भाजपा, जजपा को मुख्यमंत्री के बाद वाले कुछ अहम पदों का ऑफर दे सकती है। फिलहाल नतीजे आने तक कुछ भी स्पष्ट कह पाना मुश्किल है।