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हाथरस केस: अ​र्थी को कांधा तो दूर आखिरी बार बेटी को कलेजे से लगाकर रो भी नहीं पाए परिजन

By शिव मौर्या 
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हाथरस। दर्द, चीख, चिल्लाहट  और मिन्नतों के बीच भी पुलिस और प्रशासन का कलेजा नहीं पसीजा। वह आखिरी बार अपनी बेटी को कलेजे से लगाकर रोना चाहते थे लेकिन अफसरों की हिटलरशाही के कारण उनको यह भी नसीब नहीं हुआ। डोली में विदा करने का उनका सपना तो चूर हो चुका था लेकिन बेटी की अर्थी को भी वह कंधा नहीं दे सके। वह चीखते रहे, चिल्लाते रहे, मिन्नते मांगते रहे कि बेटी को आखिरी बार देख लेने दो लेकिन प्रशासन और पुलिसिया तंत्र ने मिलकर उनसे यह भी हक छीन लिया।

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ऐसा क्या था कि इतनी जल्दबाजी में प्रशासन और पुलिस ने मिलकर बेटी के शव का रात में ही अंतिम संस्कार कर दिया। प्रशासन और पुलिस के इस खेल ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रदेश के हुक्कमरान दोषियों पर कड़ी से कड़ी सजा का फरमान जारी कर चुके हैं लेकिन इन सबके बीच पीड़ित परिवार के दर्द, चीख और मिन्नतों का हिसाब कौन देगा? जिन्हें बेटी की आर्थी को कांधा देने तक की इजाजत नहीं दी गई।

ऐसा क्या हो गया जिसे लेकर इतनी जल्दबाजी की गई। हिंदू रीति रिवाज में तो शाम के बाद शवों को जलाया भी नहीं जाता है लेकिन इन नियमों को दरकिनार करके भी शव का रात में ही अंतिम संस्कार कर दिया गया। बता दें कि, हाथरस दुष्कर्म मामले में पुलिस से सहयोग की अपेक्षा कर रहे परिवार को बीती रात पुलिस का अलग ही रवैया देखने को मिला जिससे पूरा परिवार बेहद आहत है।

दिल्ली से हाथरस पहुंचे लड़की के शव का पुलिसवालों ने आधीरात जबरन अंतिम संस्कार कर दिया और परिवार से पूछा तक नहीं। यह आरोप है मृतका के भाई का। भाई का कहना है कि पूरा परिवार पुलिस से मिन्नतें करता रहा लेकिन पुलिस ने नहीं सुनी। वहीं अब प्रशासन कह रहा है कि उन्होंने जो कुछ किया उसमें परिवार की सहमति थी। पीड़िता के भाई ने न्यूज एजेंसी से बातचीत में बताया कि, उन्होंने हमारी कोई राय नहीं ली जो किया अपनी मर्जी से किया। हम डरे हुए हैं। पुलिस ने हम पर दबाव डाला कि हम दीदी के शव को अंतिम संस्कार के लिए लेकर जाएं।

 

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