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भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए यहां आज भी चिता की भस्म से खेली जाती है होली

By आस्था सिंह 
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Holi Celebration In Varanasi By Funeral Ashes

लखनऊ। भगवान शिव की नगरी यानि वाराणसी में रंगभरी एकादशी के अगले दिन मणिकर्णिका घाट पर साधू संत जलती चिताओं के बीच जमकर होली खेलते हैं। होली खेलने की यह परंपरा आज से नहीं आदि काल से चली आ रही हैं। मान्यता हैं कि इस दिन भगवान भोलेनाथ औघड़दानी के रूप में विराजमान रहते हैं और जलती चिताओं के बीच होली खेलते हैं। चिताओं की भस्म से इस दिन महादेव का शृंगार होता है।

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एक बार कैलाश पर्वत पर विराजमान भगवान शिव से माता पार्वती कहने लगी कि प्रभु मुझे अपनी ससुराल ले चलिए तो बाबा विश्वनाथ माता गौरा को रंगभरी एकादशी के दिन काशी ले आये। और यहीं आकर कुछ दिन निवास किया। इसीलिए वाराणसी में रंगभरी एकादशी धूमधाम से मनाई जाती है। भक्त बाबा विश्वनाथ एक साथ होली खेलते हैं। और इसी दिन से वाराणसी में होली खेलने की शुरुआत हो जाती है।

भक्तों संग महादेव खेलते हैं होली

काशी में महादेव ने ना सिर्फ अपने पूरे कुनबे के साथ वास किया बल्कि हर उत्सवों में यहां के लोगों के साथ महादेव ने बराबर की हिस्सेदारी की। खासकर उनके द्वारा फाल्गुन में भक्तों संग खेली गयी होली की परंपरा आज भी जीवंत की जाती है बल्कि काशी के लोगों द्वारा डमरुओं की गूंज और हर हर महादेव के नारों के बीच एक-दूसरे को भस्म लगाने परंपरा है।

भूतनाथ की मंगल होरी,
देखि सिहायें बिरज की छोरीय,
धन-धन नाथ अघोरी,
दिगंबर खेलैं मसाने में होरी..

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