गुरुवार को है वराह जयंती, इन उपायों से होगा शत्रु का नाश

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को श्रीहरि ने वाराह रूप धारण कर पृथ्वी को हिरण्याक्ष जैसे राक्षस के चंगुल से मुक्त कराया था। इसलिए यह तिथि वाराह जयंती के रूप में विख्यात है। इस वर्ष यह जयंती 24 अगस्त को मनाई जाएगी। श्रीहरि के भक्तगण इस दिन श्रद्धा-भाव से भगवान विष्णु के वाराह अवतार का शास्त्रोक्त विधि से पूजन करते और उपवास रखते हैं।

वराह जयंती के दिन भगवान वराह के मंत्रों का जप करने से सभी तरह के शत्रुओं का नाश होता है। और व्यक्ति के सौभाग्य में आ रही बाधाएं शांत होती हैं। वराहवतार की पूजा से विभिन्न प्रकार के तंत्र-मंत्र की काट भी होती है।

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पौराणिक कथानुसार आदिकाल में भगवान ने महाअसुर हिरण्याक्ष का वध करने के लिए वाराह अवतार लिया था। कई लोग इस अवतार को हरि का पहला अवतार मानते हैं। इसकी कथा बेहद रोचक है। कहा जाता है कि कश्यप ऋषि व उनकी पत्नी दिति के हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु नामक दो महाबलशाली पुत्र थे। मगर दोनों की प्रवृतियां घोर आसुरी थीं। ऊपर से उन्होंने कठोर तपस्या से ब्रह्माजी को प्रसन्न करके असीम शक्तियां भी अर्जित कर ली थीं और शक्ति के मद में चूर होकर चहुंओर अपना आतंक फैलाने लगा।

हिरण्याक्ष के आतंक से धरतीवासी त्राहि-त्राहि कर उठे। धरती लोक के बाद उसने देवराज इन्द्रलोक को भी जीत लिया और जल देवता वरुण देव को युद्ध के लिए ललकारा। हिरण्याक्ष को सुन वरुण देव बोले, ‘इस जगत में भगवान विष्णु से अधिक शक्तिमान कोई दूसरा नहीं है। यदि तुम अपनी श्रेष्ठता साबित करना चाहते हो तो उन्हें युद्ध में हराकर दिखाओ।’

यह बात हिरण्याक्ष को चुभ गई, वह उनकी खोज में निकल पड़ा। तभी उसे नारद मुनि से ज्ञात हुआ कि भगवान विष्णु वाराह अवतार लेकर धरती को रसातल से बाहर निकालकर अपने दांतों पर उठा कर समुद्र से बाहर ला रहे हैं। यह सुन हिरण्याक्ष रसातल जा पहुंचा। उसने देखा कि एक विशाल वाराह दांतों पर पृथ्वी को उठाते हुए जा रहा है। उसने वराह भगवान को युद्ध के लिए ललकारते हुए अपनी विशालकाय गदा से उन पर प्रहार किया। तब भगवान विष्णु जी अपने सुदर्शन चक्र से उस महाअसुर को यमलोक पहुंचा कर धरती लोक को उसके आतंक से मुक्त किया।

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