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इंसानियत शर्मसार! आगरा में सड़क पर जन्मीं तीन बेटियां, दर्द से चिखती-चिल्लाती रहीं महिलाएं लेकिन नहीं खुला अस्पताल का गेट

Humans Are Ashamed Three Daughters Born On The Road In Agra Women Screaming In Pain But The Hospital Gate Did Not Open

By टीम पर्दाफाश 
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नई दिल्ली: कोरोना-काल की वेदना और उस पर प्रसव वेदना, शब्दों में समेटना बेहद मुश्किल है। असहनीय दर्द से निकलती चीखें अस्पताल के ठीक सामने की सड़क का सन्नाटा तो तोड़ पाई मगर जिम्मेदारों का जमीर नहीं जगा पाईं। आगरा के 132 साल पुराने लेडी लॉयल अस्पताल के दरवाजे शनिवार की सुबह गर्भवती महिलाओं के लिए नहीं खुले। कराहती, चिल्लाती और बार-बार दर्द से बेसुध होती महिलाएं सड़क पर थीं। भगवान-भरोसे थीं। टूटती उम्मीदों के बीच सात-आठ महिलाएं देवदूत बनकर आई, अपनी और कपड़ों की आड़ बनाई और देखते ही देखते बमुश्किल 30 मिनट के अंतराल में तीन गर्भवती महिलाओं के प्रसव करा दिया। मातृशक्ति का अद्भुत संयोग देखिए, तीनों ही प्रसूताओं ने स्वस्थ बच्चियों का जन्म दिया।

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शनिवार की सुबह साढ़े पांच बजे नूरी दरवाजा निवासी प्रीति तीव्र प्रसव पीड़ा से गुजरी, तो वह अपने पति साथ बाइक पर बैठकर लेडी लॉयल अस्पताल पहुंची। दरवाजे पर गार्ड ने रोक दिया। कहा- बिना थर्मल स्क्रीनिंग अस्पताल में प्रवेश संभव नहीं। असहनीय दर्द से गुजरती नीलम गेट के पास ही सड़क किनारे बैठ गई। लगभग 15 मिनट बाद ही केके नगर, सिकंदरा से बाइक पर अपने देवर के साथ आई रीना को भी थर्मल स्क्रीनिंग न होने से अस्पताल में नहीं जाने दिया गया। इस परिवार के पास भी कोई रास्ता नहीं था सिवाय सड़क पर बैठकर कराहने, इंतजार करने और सिस्टम को कोसने के।

लेडी लॉयल अस्पताल से नूरी दरवाजा की दूरी बमुश्किल एक किलोमीटर है, इसलिए प्रीति के पति ने घर पर सूचना दी तो घर की तीन चार महिलाएं अस्पताल की ओर दौड़ पड़ी। एक मां ही दूसरी मां की पीड़ा समझती है। आसपास मौजूद चार-पांच महिलाएं भी प्रसव की कठिनतम वेदना से गुजर रहीं गर्भवतियों के पास आ गईं। संख्या आठ हो गई तो महिलाओं ने खुद ही एक घेरा बनाया। घेरे को कपड़ों से ढक दिया। पहले प्रीति का प्रसव कराया और फिर रीना का। संयोगवश कुछ ही मिनट बाद ही शीतला गली निवासी नीलम अपने पति के साथ रिक्शे से लेडी लॉयल अस्पताल पहुंच गई। थर्मल स्क्रीनिंग न होने की वजह से उसे गेट के लौटा दिया गया। वापसी में अस्पताल से सौ मीटर की दूरी पर उसे तेज प्रसव पीड़ा हुई। पति घबरा गया। चीख देवदूत बनी महिलाओं तक पहुंची, तो वह दौड़ी और जुट गईं नीलम का प्रसव कराने में। तरीका वही, अंदाज वही। नतीजा महज 30 मिनट के अंतराल में तीन स्वस्थ बच्चियों का जन्म और सुकून देती किलकारियां। तीनों जच्चा-बच्चा अब स्वस्थ हैं।

लापरवाही किसकी

तीनों प्रसव के लगभग एक घंटे बाद इन महिलाओं की थर्मल स्क्रीनिंग हुई। इसके बाद इन्हें अस्पताल के वार्ड में नर्सों के माध्यम से पहुंचाया गया। सवाल यह है कि अस्पताल में इमरजेंसी के चलते 24 घंटे की सेवाएं हैं। इसके बावजूद सुबह के समय थर्मल स्क्रीनिंग की व्यवस्था क्यों नहीं की गई और यदि किसी प्रसूता की जान चली जाती तो कौन जवाबदेह होता।

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कोरोना का कहर

अस्पताल में पिछले एक पखवाडे में दो दर्जन से अधिक गर्भवती महिलाएं कोरोना पॉजिटिव मिल चुकी हैं। अस्पताल प्रबंधन रिस्क नहीं लेना चाहता। ऐसे में बिना थर्मल स्क्रीनिग के अस्पताल में प्रवेश की अनुमति नहीं है। प्रसव के समय कोरोना टेस्ट भी अनिवार्य किया गया है।

इकलौती उम्मीद

निजी और सरकारी अस्पतालों में प्रसव न होने से पूरा दबाव लेडी लॉयल अस्पताल पर ही आ गया है। औसतन 50 प्रसव यहां कराए जा रहे हैं। बीते 25 अप्रैल को तो एक ही दिन में 154 प्रसव (सीजेरियन और नार्मल) कराकर अस्पताल ने अनोखा रिकार्ड बनाया था। तीन कोरोना विशेष के साथ सात आपरेशन थिएटर संचालित हैं।

मामला गंभीर, जांच कराएंगेःअधीक्षिका

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डा.कल्याणी मिश्रा, प्रभारी अधीक्षिका का कहना है कि कोरोना की वजह से बिना थर्मल स्क्रीनिंग के किसी को अंदर जाने नहीं दिया जा रहा है। यह सख्त निर्देश दिए गये हैं। सुबह की घटना की जांच करायी जा रही है। दो दोषी होंगे, उन पर कार्रवाई होगी। दो महिलाओं को एडमिट किया गया है। वो स्वस्थ हैं। फ्रंट पर काम करने वाले सर्जन को पीपीई किट मुहैया करा दी गई है। बाकी एचआईवी किट से काम चल रहा है।

क्या कहा प्रसूताओं ने :

प्रीति को प्रसव पीड़ा के बाद होश नहीं था। जब बच्ची हो गई। उसको बेड पर लिटा दिया गया। इसके बाद थोड़ा होश आया है। अब उसकी स्थिति सही है। बच्ची भी सही है। प्रीति के मुताबिक, मेरा इलाज भी शुरू से इसी अस्पताल से चल रहा था। फाइल भी दिखायी। फिर भी नहीं मानें।

नीलम के आंसू रुकने के नाम नहीं ले रहे थे। क्योंकि नीलम के पास इस समय कोई तीमारदार नहीं था। जेठानी घर देख रहीं हैं। पति दवाई का इंतजाम करने में लगे हैं। नीलम की बहुत अधिक ब्लीडिंग हो चुकी है। बच्ची सही है। नीलम का कहना है कि यह मेरी दूसरी बेटी है।

रीना अब स्वस्थ है। उसकी सास देखरेख कर रहीं है। रीना ने बताया कि उसे रास्ते से ही होश नहीं था। ब्लीडिंग हो रही थी। देवर उसको लेकर आया। वहां मौजूद महिलाओं ने प्रसव कराया। रीना की सास भामावती का कहना है कि हमारे बच्चे पहले घर पर हो जाते थे। लेकिन अब डर लगता है।

पीड़ा परिजनों की जुबानी

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महिलाओं ने बनाया साड़ी का पर्दाः कश्यप

चित्रा टाकीज निवासी प्रीति के पति अमित कश्यप के मुताबिक, वह अपनी पत्नी को तड़के पैदल लेकर चला। लेकिन वह चल नहीं पा रही थी। पड़ोस से बाइक मांगी। इसके बाद लेकर लेडीलॉयल पहुंचा। लेकिन वहां उसे अंदर नहीं जाने दिया। लौटा दिया। पत्नी को प्रसव पीड़ा हो रही थी। उसे ब्लीडिंग होने लगी। मैं गिड़गिड़ाता रहा। इससे पहले मैंने घर फोन कर दिया था। तो मेरे घर की महिलाएं भागते-भागते पहुंची। प्रसव पीड़ा और आए दिन हो रहे केसों ने मुझे झकझोर दिया। मेरी पत्नी को महिलाएं घर ले जाने लगीं। उसके बहुत प्रसव पीड़ा हुई। मेरी मां ने अपनी साड़ी उतारकर मेरे परिवार की महिलाओं ने उससे पर्दा बनाया। तब मेरी बच्ची का जन्म हुआ।

मेरे रोने-चिल्लाने पर भी रहम नहीं आयाः मानसिंह

नीलम के पति मानसिंह ने बताया कि सुबह पत्नी को गोद में लेकर आ रहा था। रिक्शा तक नहीं मिला। कुछ दूरी पर मिले एक रिक्शेवाले ने रहम दिखाया। लेडी लॉयल तक छोड़ा। वहां पहले से ही एक मरीज के पास महिलाओं का हुजुम लगा था। हम लोगों को थर्मल स्क्रीनिंग के लिए बोला लेकिन पत्नी की हालत प्रसवपीड़ा से काफी खराब थी। मैं हाथ जोड़ता रहा। ब्लीडिंग शुरू हो गयी थी। मुझे रोता देख एक महिला मेरे पास आयी। मैं उन महिलाओं के पास अपनी पत्नी को ले गया। मैं शुक्रगुजार हूं उन के प्रयास से 10 मिनट बाद बच्ची हो गयी। लेकिन हमें अंदर नहीं जाने दिया। जब हल्ला मचा कि सड़क पर प्रसव हो रहे हैं। तब स्टाफ दौड़कर आया। फिर भर्ती किया।

महिलाएं मेरे लिए तो भगवान बनकर आईः महिपति

केके नगर निवासी रीना के पति महिपति ने बताया कि छोटा भाई राजेंद्र जुगाड़ से जो रिक्शे चलते हैं। उससे पत्नी को लेकर लेडी लॉयल पहुंचा था। वह पैसे लेकर साइकिल से लेडी लॉयल आया। रास्ते में ही मेरी पत्नी की हालत खराब हो गयी थी। गेट पर ही रोक लिया गया था। लुहार जाति के लोग हैं हम। इसके बाद मेरा भाई रोने लगा। इतने में मैँ पहुंच गया। वहां पहले से ही काफी भीड़ इकट्ठा थी। मेरे लिए भगवान बनकर आ गयीं महिलाएं। जिन्होंने मेरी पत्नी को संभाल लिया। उन महिलाओं ने मेरी बच्ची का जन्म कराया। वहां पहले दो महिलाएं पड़ी थीं। जब हल्ला हुआ। तो नर्स दौड़कर आयीं। स्ट्रेचर पर रखकर तीनों को लेकर गयीं। मेरी पत्नी की दो घंटे बाद छुट्टी कर दी। फिर एंबुलेंस से घर तक पहुंचाया।

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