बस पॉलिटिक्स: रायबरेली में सोनिया के खिलाफ अदिति सिंह लड़ गईं तो?

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रायबरेली: अदिति सिंह का नाम आजकल सुर्खियों में ज़्यादा है। जब से कांग्रेस मजदूरों के नाम पर बस पोलिटिक्स कर रही है तब से ही कांग्रेस विधायक अदिति सिंह राष्ट्रीय सुर्खियों में हैं. अदिति सिंह ने पार्टी लाइन से अलग चलते हुए प्रियंका गांधी पर गंदी राजनीति करने का आरोप लगाया और फिर पार्टी हाईकमान ने उन्हें सस्पेंड कर दिया. पर यदि कांग्रेस ने अदिति सिंह को निलंबित कर ये सोच रही है कि उसने कोई बहुत बड़ा तीर मार लिया है, तो इससे हास्यास्पद कुछ नहीं होगा। यदि पिछले वर्ष लोक सभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश मात्र एक सीट से अपनी इज्जत बचाने में सफल हुई थी, तो इसका प्रमुख कारण था रायबरेली में अदिति सिंह का प्रभाव। मोदी योगी के प्रचंड लहर के बावजूद जो व्यक्ति 2017 के विधानसभा चुनाव में अपनी सीट बचा ले, तो वो निस्संदेह कोई आम नेता तो है नहीं।

If Aditi Singh Fought Against Sonia In Rae Bareli :

2019 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अधिकतर सीटों पर भाजपा से शिकस्त मिली थी। केवल सोनिया गांधी ही रायबरेली से अपनी सीट बचाने में सफल रही थी, लेकिन उनका मत प्रतिशत भी बहुत गिरा था। 2014 में जो सोनिया गांधी साढ़े तीन लाख से भी ज़्यादा मतों के अंतर से जीती थीं, वो 2019 में मात्र डेढ़ लाख से थोड़ा ज़्यादा मतों के अंतर से ही जीत पाई थी, यानी पौने दो लाख से ज़्यादा मत सोनिया मैडम को इस बार मिले ही नहीं.

यह तब था जब एक औसत उम्मीदवार उनके सामने खड़ा हुआ था। अब कल्पना कीजिए यदि दिनेश प्रताप सिंह के बजाए अदिति सिंह होती, तो?

यूं तो अदिति सिंह खुद एक वंशवादी राजनेता हैं, परन्तु रायबरेली में वे बहुत लोकप्रिय हैं। उनके पिता अखिलेश सिंह का विवादों के साथ भले चोली दामन का रिश्ता रहा हो, परन्तु वे पांच बार रायबरेली से विधायक रहे हैं। 2003 में कांग्रेस से निकाले जाने के बावजूद जनाब ने 2007 में बतौर निर्दलीय उम्मीदवार विजय प्राप्त की थी। 2017 में अदिति सिंह रायबरेली सदर से विजयी हुई थीं। ये तब था, जब कांग्रेस यूपी के चुनावी इतिहास में पहली बार दहाई का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई थी। इसके बावजूद अदिति अपने क्षेत्र में 95000 मतो के अंतर से जीती थीं। यदि वे मोदी लहर को झेल सकती हैं, तो वो निस्संदेह सोनिया गांधी को रायबरेली से अपदस्थ भी कर सकती हैं।

इसके अलावा अदिति सिंह काफी राष्ट्रवादी भी हैं। कश्मीर से धारा 370 हटाने के मसले पर भी अदिति ने कांग्रेस से अलग अपना पक्ष रखा था, और हाल ही में कोरोना वॉरियर्स के लिए पीएम मोदी की अपील पर भी उन्होंने दीये जलाये थे। इतना ही नहीं, पिछले वर्ष पार्टी व्हिप का उल्लंघन करते हुये अदिति विधानसभा के विशेष सत्र में शामिल होने पहुंची थीं, और इसके बाद उन्हें पार्टी की तरफ से कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया था। इसके अलावा वे योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली से काफी प्रभावित भी दिखती हैं, और हाल ही में उन्होंने बताया कि योगी जी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, और CAA विरोधी अभियान को नियंत्रित करने का उनका तरीका प्रशंसनीय था।

अब सुनने में आ रहा है कि भाजपा अदिति सिंह को रायबरेली से 2024 के लोकसभा चुनावों में बतौर उम्मीदवार उतार भी सकती हैं। यदि सोनिया गांधी एक बार फिर चुनाव लड़ती हैं, तो इस बार उनका भी वही हश्र होगा, जो 2019 में उनके बेटे राहुल गांधी का हुआ था। अब प्रश्न ये नहीं कि क्या वे भाजपा ज्वाइन करेगी, प्रश्न तो यह है कि आखिर कब? जिस तरह से वे आजकल बयान दे रही हैं, किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए यदि अदिति भाजपा का दामन थाम लें।

गौरतलब है कि बागी कांग्रेसी नेताओं का पार्टी छोड़ने का सिलसिला इन दिनों जोरों पर है. आपने पिछले कुछ दिनों पहले देखा था कि कैसे मध्य प्रदेश के कद्दावर नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया. इसी तरह पहले भी कई कद्दावर नेताओं ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा में एक सम्मानित राजनीति कर रहे हैं. तो हम कह सकते हैं कि अदिति सिंह जल्द ही भाजपा ज्वाइन कर सकती हैं और अपने विचारों वाली पार्टी में राजनीति की दूसरी पारी खेल सकती हैं.

रायबरेली: अदिति सिंह का नाम आजकल सुर्खियों में ज़्यादा है। जब से कांग्रेस मजदूरों के नाम पर बस पोलिटिक्स कर रही है तब से ही कांग्रेस विधायक अदिति सिंह राष्ट्रीय सुर्खियों में हैं. अदिति सिंह ने पार्टी लाइन से अलग चलते हुए प्रियंका गांधी पर गंदी राजनीति करने का आरोप लगाया और फिर पार्टी हाईकमान ने उन्हें सस्पेंड कर दिया. पर यदि कांग्रेस ने अदिति सिंह को निलंबित कर ये सोच रही है कि उसने कोई बहुत बड़ा तीर मार लिया है, तो इससे हास्यास्पद कुछ नहीं होगा। यदि पिछले वर्ष लोक सभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश मात्र एक सीट से अपनी इज्जत बचाने में सफल हुई थी, तो इसका प्रमुख कारण था रायबरेली में अदिति सिंह का प्रभाव। मोदी योगी के प्रचंड लहर के बावजूद जो व्यक्ति 2017 के विधानसभा चुनाव में अपनी सीट बचा ले, तो वो निस्संदेह कोई आम नेता तो है नहीं। 2019 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अधिकतर सीटों पर भाजपा से शिकस्त मिली थी। केवल सोनिया गांधी ही रायबरेली से अपनी सीट बचाने में सफल रही थी, लेकिन उनका मत प्रतिशत भी बहुत गिरा था। 2014 में जो सोनिया गांधी साढ़े तीन लाख से भी ज़्यादा मतों के अंतर से जीती थीं, वो 2019 में मात्र डेढ़ लाख से थोड़ा ज़्यादा मतों के अंतर से ही जीत पाई थी, यानी पौने दो लाख से ज़्यादा मत सोनिया मैडम को इस बार मिले ही नहीं. यह तब था जब एक औसत उम्मीदवार उनके सामने खड़ा हुआ था। अब कल्पना कीजिए यदि दिनेश प्रताप सिंह के बजाए अदिति सिंह होती, तो? यूं तो अदिति सिंह खुद एक वंशवादी राजनेता हैं, परन्तु रायबरेली में वे बहुत लोकप्रिय हैं। उनके पिता अखिलेश सिंह का विवादों के साथ भले चोली दामन का रिश्ता रहा हो, परन्तु वे पांच बार रायबरेली से विधायक रहे हैं। 2003 में कांग्रेस से निकाले जाने के बावजूद जनाब ने 2007 में बतौर निर्दलीय उम्मीदवार विजय प्राप्त की थी। 2017 में अदिति सिंह रायबरेली सदर से विजयी हुई थीं। ये तब था, जब कांग्रेस यूपी के चुनावी इतिहास में पहली बार दहाई का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई थी। इसके बावजूद अदिति अपने क्षेत्र में 95000 मतो के अंतर से जीती थीं। यदि वे मोदी लहर को झेल सकती हैं, तो वो निस्संदेह सोनिया गांधी को रायबरेली से अपदस्थ भी कर सकती हैं। इसके अलावा अदिति सिंह काफी राष्ट्रवादी भी हैं। कश्मीर से धारा 370 हटाने के मसले पर भी अदिति ने कांग्रेस से अलग अपना पक्ष रखा था, और हाल ही में कोरोना वॉरियर्स के लिए पीएम मोदी की अपील पर भी उन्होंने दीये जलाये थे। इतना ही नहीं, पिछले वर्ष पार्टी व्हिप का उल्लंघन करते हुये अदिति विधानसभा के विशेष सत्र में शामिल होने पहुंची थीं, और इसके बाद उन्हें पार्टी की तरफ से कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया था। इसके अलावा वे योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली से काफी प्रभावित भी दिखती हैं, और हाल ही में उन्होंने बताया कि योगी जी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, और CAA विरोधी अभियान को नियंत्रित करने का उनका तरीका प्रशंसनीय था। अब सुनने में आ रहा है कि भाजपा अदिति सिंह को रायबरेली से 2024 के लोकसभा चुनावों में बतौर उम्मीदवार उतार भी सकती हैं। यदि सोनिया गांधी एक बार फिर चुनाव लड़ती हैं, तो इस बार उनका भी वही हश्र होगा, जो 2019 में उनके बेटे राहुल गांधी का हुआ था। अब प्रश्न ये नहीं कि क्या वे भाजपा ज्वाइन करेगी, प्रश्न तो यह है कि आखिर कब? जिस तरह से वे आजकल बयान दे रही हैं, किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए यदि अदिति भाजपा का दामन थाम लें। गौरतलब है कि बागी कांग्रेसी नेताओं का पार्टी छोड़ने का सिलसिला इन दिनों जोरों पर है. आपने पिछले कुछ दिनों पहले देखा था कि कैसे मध्य प्रदेश के कद्दावर नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया. इसी तरह पहले भी कई कद्दावर नेताओं ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा में एक सम्मानित राजनीति कर रहे हैं. तो हम कह सकते हैं कि अदिति सिंह जल्द ही भाजपा ज्वाइन कर सकती हैं और अपने विचारों वाली पार्टी में राजनीति की दूसरी पारी खेल सकती हैं.