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यूपी विधानसभा चुनाव में ये प्रावधान हुआ लागू तो बीजेपी के 50 फीसदी विधायक हो जाएंगे अयोग्य

यूपी की योगी सरकार ने हाल ही में नई जनसंख्या नीति 'उत्तर प्रदेश जनसंख्या (नियंत्रण, स्थिरिकरण और कल्याण) विधेयक, 2021' को लागू कर दिया है। इसके साथ ही प्रदेश सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण पर जारी मसौदा विधेयक में दो बच्चों से अधिक के माता-पिता को स्थानीय चुनाव लड़ने रोक लगाने। अगर इन्हीं प्रावधानों को राज्य विधानसभा चुनावों के लिए भी लागू कर दिया जाए, तो खुद बीजेपी के ही 50 फीसदी विधायक चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित हो जाएंगे।

By संतोष सिंह 
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लखनऊ। यूपी की योगी सरकार ने हाल ही में नई जनसंख्या नीति ‘उत्तर प्रदेश जनसंख्या (नियंत्रण, स्थिरिकरण और कल्याण) विधेयक, 2021’ को लागू कर दिया है। इसके साथ ही प्रदेश सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण पर जारी मसौदा विधेयक में दो बच्चों से अधिक के माता-पिता को स्थानीय चुनाव लड़ने रोक लगाने। इसके साथ ही सरकारी नौकरियों में प्रमोशन के लिए आवदेन देने और सरकारी सब्सिडी पाने के अधिकार से वंचित करने का प्रावधान किया है। अगर इन्हीं प्रावधानों को राज्य विधानसभा चुनावों के लिए भी लागू कर दिया जाए, तो खुद बीजेपी के ही 50 फीसदी विधायक चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित हो जाएंगे।

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बीजेपी के 152 विधायकों के 3 या ज्यादा हैं बच्चे

उत्तर प्रदेश विधानसभा की वेबसाइट पर कुल 397 विधायकों की प्रोफाइल अपलोड है। इनमें 304 विधायक बीजेपी के हैं। इनके प्रोफाइल बताते हैं कि 152 यानी बिल्कुल आधे विधायकों को दो से ज्यादा बच्चे हैं। इनमें एक बीजेपी विधायक के तो आठ बच्चे हैं। इस लिस्ट में किसी और विधायक को इतने ज्यादा बच्चे नहीं हैं। एक विधायक को सात बच्चे हैं। बीजेपी के 8 विधायक ऐसे हैं, जिनके 6-6 बच्चे हैं। वहीं, 15 विधायकों को 5, 44 को 4, 83 को 3, 103 को 2-2 बच्चे हैं जबकि 34 विधायकों को 1-1 बच्चा है। वहीं, 15 विधायकों में किसी को एक भी बच्चा नहीं है तो किसी ने बच्चे की जानकारी ही नहीं दी है।

बीजेपी सांसद रवि किशन हैं चार बच्चों के पिता

जनसंख्या नियंत्रण पर बात यहीं खत्म नहीं होती है। गोरखपुर से लोकसभा सांसद और भोजपुरी फिल्म अभिनेता रवि किशन ने जनसंख्या नियंत्रण पर प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया है। रवि किशन भी बीजेपी के सांसद हैं और चार बच्चों के पिता हैं। यह अलग बात है कि सरकार के समर्थन के बिना कोई प्राइवेट मेंबर बिल शायद ही पास हो सके। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के मुताबिक, संसद ने वर्ष 1970 से ही कोई प्राइवेट मेंबर बिल पास नहीं किया है।

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देशभर में जनसंख्या नियंत्रण के मकसद से दो बच्चों की नीति पर जोर

देशभर में जनसंख्या नियंत्रण के मकसद से संसद में लाए गए जनसंख्या नियंत्रण विधेयक, 2019 में भी दो दो बच्चों की नीति को ही सरकारी सुविधाओं का आधार बनाया गया है। यानी, दो बच्चों से ज्यादा के माता-पिता हैं तो कानून लागू होने पर सरकारी नौकरी और सब्सिडी पाने के अयोग्य हो जाएंगे। लोकसभा की वेबसाइट के अनुसार 186 सांसद हैं जो इस कानून के दायरे में आ जाएंगे। जिनमें से बीजेपी के 105 सांसद हैं जिन्हें दो से ज्यादा बच्चे हैं।

केंद्र सरकार का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा

केंद्र सरकार ने पिछले साल दिसंबर महीने में सुप्रीम कोर्ट की ओर से मिले नोटिस के जवाब में कहा था कि भारत, जनसंख्या नियंत्रण के स्वैच्छिक उपायों के बल पर 2.1 की प्रजनन दर से रिपेल्समेंट लेवल के मुहाने पर आ गया है। यानी, देश में अभी प्रति महिला औसतन 2.1 बच्चे पैदा कर रही है जो मौजूदा आबादी में स्थितरता के लिहाज से सटीक है। मतलब ये कि इस प्रजनन दर से न आबादी बढ़ेगी और न घटेगी। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि चीन के साथ-साथ दुनिया के कुछ देशों में लागू जनसंख्या नियंत्रण का मॉडल बताता है कि प्रति दंपती बच्चे की संख्या निर्धारित कर देने से आबादी के स्तर पर काफी गड़बड़ी सामने आ सकती है, जिसका खतरनाक परिणाम भुगतना पड़ सकता है।

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केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को दिए गए अपने हलफनाम में कहा था कि 36 में 25 राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों में 2.1 या इससे भी कम का रिप्लेसमेंट लेवल आ गया है। हालांकि यूपी के 57, बिहार के 37, राजस्थान के 14, मध्य प्रदेश के 25, छत्तीसगढ़ के 2 और झारखंड के 9 को मिलाकर कुल 146 जिलों में प्रजनन दर 3 से ज्यादा है। जनगणना कार्यालय के मुताबिक, 2001 से 2011 के 10 वर्ष पिछले 100 वर्षों में पहला ऐसा दशक रहा है, जब भारत में ठीक पिछले दशक के मुकाबले कम आबादी बढ़ी।

 यूपी की नई जनसंख्या नीति पर बहस है जारी

बता दें कि हाल ही उत्तर प्रदेश में जनसंख्या नियंत्रण की मसौदा नीति आने के बाद चर्चा का विषय बनी हुई है। इसके ऐलान के बाद देश में जनसंख्या नियंत्रण का मुद्दा काफी पहले से गंभीर शक्ल अख्तियार कर चुका है, लेकिन जब यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस दिशा में पहल की तो राष्ट्रीय स्तर पर कानून बनाने की मांग फिर से जोर पकड़ गई है।

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