ये हैं यूपी के अच्छे पुलिस वाले, एक आईजी दूसरा दारोगा

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Ig Mohit Agarwal So Bb Tiwari Are Real Cops Of Uttar Pradesh Police

लखनऊ। पुलिस और पुलिस कर्मियों की चर्चा जब भी खबरों में होती है तो अधिकांशतय कारण नकारात्मक ही होते हैं। अपने देश के किसी भी राज्य के किसी भी कोने में चले जाइये और पुलिस का जिक्र भर छोड़ दीजिए लोग आपको दर्जनभर कमियां मौखिक ही गिना देंगे वो भी उदाहरण के साथ। लेकिन वास्तविकता ये है कि पुलिस की नकारात्मक छवि कुछ मुट्ठी भर कर्मियों की वजह से बनी है, जिन्होंने अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल किया है। इसी पुलिस में ऐसे अधिकारी और कर्मी भी हैं जो न सिर्फ ईमानदारी से अपनी ड्यूटी करते हैं बल्कि समाज के प्रति अपनी अन्य जिम्मेदारियों को लेकर भी गंभीर रहते हैं।

आज यूपी की मीडिया में दो पुलिसवालों की चर्चा खूब हो रही है। पहला नाम है आईजी गोरखपुर मोहित अग्रवाल का जिन्होंने महज छह महीनों की मेहनत से एक सरकारी प्राइमरी स्कूल को कांवेन्ट स्कूल की तर्ज पर विकसित कर दिखाया है। उन्होंने न सिर्फ पुलिस अधिकारियों को उनकी सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति जागरुक किया है, बल्कि ऐसी कमरों में बैठकर देश में प्राइमरी शिक्षा की दशा को सुधारने के नाम पर लाखों का वेतन डकारने वाले बड़े बाबुओं को भी अपना काम गंभीरता से करने का संदेश दिया है।
वहीं दूसरा नाम है सोनभद्र जिले के शक्तिनगर एसओ बीबी तिवारी का। तिवारी ने सड़क दुर्घटना के बाद अपने दोनों पैर गंवा बैठे एक गरीब बच्चे की जिम्मेदारी निजी तौर पर उठाने का संकल्प लिया है। तिवारी इस दिव्यांग की दवा और पढ़ाई का खर्चा उठा रहे हैं। आज यह अच्छी खबर भी सोशल मीडिया पर छाई हुई है।
अगर हम गांवों में होने वाली चर्चा का जिक्र करें तो वहां आज भी लोगों मानना है कि पुलिस वाले गुंडे और बदमाश पैदा करते हैं। दूसरों से घूंस खाकर निर्दोष लोगों को झूठे मामलों में फंसा कर उन्हें बदमाश बना देते है। लेकिन ये बात जितनी सच है उतना ही बड़ा सच ये भी है कि पुलिस छोटे—छोटे कानून तोड़ने वाले सैकड़ों लोगों को रोज सुधरने का मौका देती है।

आईजी मोहित अग्रवाल और एसओ बीबी तिवारी ने गरीब बच्चों की शिक्षा को प्रति जिस तरह की प्रतिबद्धता जाहिर की वह समाज के बीच में पुलिस की छवि को निश्चित ही प्रभावित करेगी। शायद ये दोनों पुलिस वाले जानते हैं कि हमारे समाज की हर समस्या का हल शिक्षा में ही छुपा है। जिसके लिए सरकारी व्यवस्थाएं तो तमाम हैं, लेकिन व्यवस्थित एक भी नहीं। जिसमें हस्तक्षेप करने के साथ—साथ सुधार के लिए निजी योगदान आवश्यक है।

लखनऊ। पुलिस और पुलिस कर्मियों की चर्चा जब भी खबरों में होती है तो अधिकांशतय कारण नकारात्मक ही होते हैं। अपने देश के किसी भी राज्य के किसी भी कोने में चले जाइये और पुलिस का जिक्र भर छोड़ दीजिए लोग आपको दर्जनभर कमियां मौखिक ही गिना देंगे वो भी उदाहरण के साथ। लेकिन वास्तविकता ये है कि पुलिस की नकारात्मक छवि कुछ मुट्ठी भर कर्मियों की वजह से बनी है, जिन्होंने अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल किया है। इसी…