अल्पसंख्यक नागरिकों के लिए जहन्नुम से भी बदतर है पाकिस्तान, ये हैं वहां के हालात

नई दिल्ली। क्या आपने सुना है कि किसी देश में नौकरी की योग्यता के लिए धर्म का जिक्र ​किया जाए? क्या किसी देश की सरकार ये सुनिश्चित कर सकती है कि उसके देश में मैला उठाने और सफाई करने का काम धर्म विशेष के लोग ही करेंगे? ऐसा सिर्फ ​इसलिए किया जाएगा ता​कि सफाई कर्मी के रूप में उनका शोषण किया जा सके और ड्यूटी के दौरान दुर्घटना का शिकार होने पर उसे मरने के लिए छोड़ा जा सके। ऐसे में होने वाली मौत एक अल्पसंख्यक की होगी जिसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाएगा।

ऐसा पाकिस्तान में हो रहा है। पाकिस्तान की हैदराबाद मुनिसिपल कार्पोरेशन ने सफाई कर्मियों की भर्ती निकाली है। इस भर्ती के लिए योग्यता के रूप में आवेदनकर्ता का ईसाई या किसी अन्य अल्पसंख्यक समुदाय से होना आवश्यक है। इसके साथ ही सफाई कर्मियों को अपने धर्मग्रन्थ पर हाथ रखकर शपथ लेनी होगी कि वे सफाई के अलावा कोई अन्य काम नहीं करेंगे।

मुनिसिपल कार्पोरेशन की ओर से जारी विज्ञापन पर पाकिस्तान की किसी भी संवैधानिक संस्था ने सवाल नहीं उठाया है। जबकि यह विज्ञापन पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 27 का खुलेआम उल्लंघन करने वाला है। जानकारों की माने तो पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के खिलाफ मानवाधिकारों के हनन का यह पहला मामला नहीं है। पाकिस्तान के कई अस्पतालों में धर्म के आधार पर सफाई कर्मियों की भर्ती की जा चुकी है। आम तौर पर ​सफाई कर्मियों की भर्ती के लिए ईसाई, हिन्दू और शियाओं से आवेदन मांगे जाते हैं।

पाकिस्तान के हालातों का जिक्र करते हुए एक वेबसाइट ने बताया है कि पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के समय से ईसाइयों को मैला ढ़ोने के कामों में लगाया जा रहा है। पूर्व में यह काम दलित हिन्दू किया करते थे, लेकिन बंटबारे के साथ हिन्दुओं के भारत चले जाने के बाद पाकिस्तान में ऐसे कामगारों की कमी हो गई जिन्हें सफाई और मैला ढ़ोने के लिए रखा जाता। ऐसे में वहां के बहुसंख्यकों ने उन ईसाइयों को इस काम के लिए रखना शुरू कर दिया जो एक जमाने पहले दलित हुआ करते थे और साफ सफाई का काम किया करते थे। आमतौर पर मुस्लिमों को सफाई कर्मी के रूप में भर्ती करने से बचा जाता है, क्योंकि मुस्लिम सफाई कर्मियों के मुकाबले अल्पसंख्यक कर्मियों का शोषण किया जाना सरल होता है। उनके लिए आवाज उठाने वाला कोई नहीं होता।

एक रिपोर्ट के अनुसार जून 2017 में ही सीवर की सफाई करने के लिए उतरे एक सफाई कर्मी को जहरीली गैस ने अपनी चपेट में ले लिया। उसके साथी कर्मियों ने उसे सीवर से तो निकाल लिया लेकिन रमजान का पाक महीने का हवाला देते हुए किसी भी अस्पताल ने उस अधमरे सफाईकर्मी को इलाज देने से मना कर दिया। जिसके बाद कर्मी की मौत हो गई। मानवाधिकार के उल्लंघन का आलम इस हद तक है कि अल्पसंख्यक सफाई कर्मियों की मौत पर उनके परिवार को किसी तरह के मुआवजे नहीं दिए जाते।

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की हालात को देखें तो करीब 18 करोड़ आबादी वाले पाकिस्तान में ईसाइयों की जनसंख्या 10 लाख के आस पास है। कुल आबादी में मात्र 4 प्रतिशत शिक्षित है या फिर पढ़ने जाती है। करीब 80 फीसदी ईसाई आबादी के पास अपनी छत तक नहीं है। 70 फीसदी आबादी के पास रोजगार नहीं है। जिनके पास रोजगार है उनमें 80 फीसदी सफाईकर्मी हैं। ईसाई महिलाएं घरों में झाडू पोछा और साफ सफाई का काम करतीं हैं तो आबादी का अधिकांश हिस्सा दिहाड़ी मजदूरी करता है।

ईसाई सफाई कर्मियों का कहना है कि पाकिस्तान में मुस्लिम और अल्पसंख्यक सफाईकर्मियों के बीच 40 पर 60 का अनुपात है। सारा काम 60 फीसदी अल्पसंख्यक कर्मचारी ही करते हैं। मुस्लिम सफाईकर्मियों की ड्यूटी भी अल्पसंख्यक कर्मी ही करता है। इसीलिए कुछ सालों से निजी अस्पतालों और संस्थाओं ने अल्पसंख्यक सफाईकर्मी रखने शुरू कर दिए हैं।