चीन को लगा बड़ा झटका, RCEP समझौते से भारत ने खींचा अपना हाथ

narendra modi
चीन को लगा बड़ा झटका, RCEP समझौते से भारत ने खींचा अपना हाथ

नई दिल्ली। भारत ने 16 देशों के आरसीईपी(RCEP) व्यापार समझौते में भाग लेने से इंकार कर दिया है। प्रधानमंत्री मोदी के इस फैसले की सत्ता पक्ष तो तारीफ कर ही रहा है, वहीं विपक्ष भी इसे अपनी जीत बता रहा है। हालांकि, पीएम मोदी ने इस समझौते में शामिल न होने के पीछे भारत के हितों को बताया है।

India Took A Step Back From Rcep Because Of This Reason :

पीएम मोदी का कहना है,’RCEP समझौते का मौजूदा स्वरूप बुनियादी भावना और मान्य मार्गदर्शक सिद्धांतों को पूरी तरह जाहिर नहीं करता है। यह मौजूदा परिस्थिति में भारत के दीर्घकालिक मुद्दों और चिंताओं का संतोषजनक रूप से समाधान भी पेश नहीं करता है।’ ऐसे में ये सवाल भी उठ रहे हैं कि भारत को RCEP समझौते में शामिल होने से क्या नुकसान होने वाले थे।

मिली जानकारी के मुताबिक कि RCEP पर चर्चा में कई मसलों पर भारत को भरोसा नहीं मिल पाया। इनमें आयात में बढ़ोतरी से होने वाले अपर्याप्त संरक्षण, RCEP सदस्य देशों के साथ 105 बिलियन डॉलर का व्यापार घाटा, बाजार पहुंच पर भरोसे की कमी, नॉन-टैरिफ प्रतिबंधों पर असहमति और नियमों के संभावित उल्लंघन शामिल हैं। चीन इसमें सबसे बड़ी वजह है।

भारत के इस समझौते से बाहर होने का सबसे बड़ा कारण चीन से इंपोर्ट बताया जा रहा है। RCEP समझौता करता तो भारतीय बाजार में सस्ते चाइनीज सामान की बाढ़ आ जाती।

RCEP यानी क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी में 10 आसियान देशों के अलावा 6 अन्य देश ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, न्यूजीलैंड और दक्षिण कोरिया भी शामिल हैं। समझौता करने वाले देशों के बीच मुक्त व्यापार को बढ़ावा मिलता है। लिहाजा, भारत के समझौते में शामिल होने से चीन को भारतीय बाजार में पैर पसारने का अच्छा मौका मिल जाता।

RCEP में शामिल देशों के साथ भारत का निर्यात से ज्यादा आयात होता है। समझौते के तहत ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिससे अगर आयात बढ़ता है तो उसे नियंत्रित किया जा सके। यानी चीन या किसी दूसरे देश के सामान को भारतीय बाजार में पर्याप्त अनुपात में अनुमति देने पर स्थिति स्पष्ट नहीं थी। इस समझौते में शामिल देशों को एक-दूसरे को व्यापार में टैक्स कटौती समेत तमाम आर्थिक छूट देनी होगी। लेकिन समझौते में नॉन-टैरिफ प्रतिबंधों को लेकर कोई भरोसेमंद वादा शामिल नहीं है।

RCEP में जो देश शामिल हैं, उनके साथ भारत का व्यापार भी फायदेमंद नहीं रहा है। पिछले एक साल का वित्तीय घाटा 105 बिलियन डॉलर का रहा है। यानी इस लिहाज से भी भारत के लिए यह समझौता फायदेमंद नहीं था। इन तमाम वजहों से ही भारत में RCEP का विरोध किया जा रहा था। विपक्षी कांग्रेस से लेकर मजदूर संगठन भी इसका विरोध कर रहे थे, जिसके बाद मोदी सरकार ने आंतरिक हितों का हवाला देते हुए खुद RCEP से बाहर कर लिया।

नई दिल्ली। भारत ने 16 देशों के आरसीईपी(RCEP) व्यापार समझौते में भाग लेने से इंकार कर दिया है। प्रधानमंत्री मोदी के इस फैसले की सत्ता पक्ष तो तारीफ कर ही रहा है, वहीं विपक्ष भी इसे अपनी जीत बता रहा है। हालांकि, पीएम मोदी ने इस समझौते में शामिल न होने के पीछे भारत के हितों को बताया है। पीएम मोदी का कहना है,'RCEP समझौते का मौजूदा स्वरूप बुनियादी भावना और मान्य मार्गदर्शक सिद्धांतों को पूरी तरह जाहिर नहीं करता है। यह मौजूदा परिस्थिति में भारत के दीर्घकालिक मुद्दों और चिंताओं का संतोषजनक रूप से समाधान भी पेश नहीं करता है।' ऐसे में ये सवाल भी उठ रहे हैं कि भारत को RCEP समझौते में शामिल होने से क्या नुकसान होने वाले थे। मिली जानकारी के मुताबिक कि RCEP पर चर्चा में कई मसलों पर भारत को भरोसा नहीं मिल पाया। इनमें आयात में बढ़ोतरी से होने वाले अपर्याप्त संरक्षण, RCEP सदस्य देशों के साथ 105 बिलियन डॉलर का व्यापार घाटा, बाजार पहुंच पर भरोसे की कमी, नॉन-टैरिफ प्रतिबंधों पर असहमति और नियमों के संभावित उल्लंघन शामिल हैं। चीन इसमें सबसे बड़ी वजह है। भारत के इस समझौते से बाहर होने का सबसे बड़ा कारण चीन से इंपोर्ट बताया जा रहा है। RCEP समझौता करता तो भारतीय बाजार में सस्ते चाइनीज सामान की बाढ़ आ जाती। RCEP यानी क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी में 10 आसियान देशों के अलावा 6 अन्य देश ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, न्यूजीलैंड और दक्षिण कोरिया भी शामिल हैं। समझौता करने वाले देशों के बीच मुक्त व्यापार को बढ़ावा मिलता है। लिहाजा, भारत के समझौते में शामिल होने से चीन को भारतीय बाजार में पैर पसारने का अच्छा मौका मिल जाता। RCEP में शामिल देशों के साथ भारत का निर्यात से ज्यादा आयात होता है। समझौते के तहत ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिससे अगर आयात बढ़ता है तो उसे नियंत्रित किया जा सके। यानी चीन या किसी दूसरे देश के सामान को भारतीय बाजार में पर्याप्त अनुपात में अनुमति देने पर स्थिति स्पष्ट नहीं थी। इस समझौते में शामिल देशों को एक-दूसरे को व्यापार में टैक्स कटौती समेत तमाम आर्थिक छूट देनी होगी। लेकिन समझौते में नॉन-टैरिफ प्रतिबंधों को लेकर कोई भरोसेमंद वादा शामिल नहीं है। RCEP में जो देश शामिल हैं, उनके साथ भारत का व्यापार भी फायदेमंद नहीं रहा है। पिछले एक साल का वित्तीय घाटा 105 बिलियन डॉलर का रहा है। यानी इस लिहाज से भी भारत के लिए यह समझौता फायदेमंद नहीं था। इन तमाम वजहों से ही भारत में RCEP का विरोध किया जा रहा था। विपक्षी कांग्रेस से लेकर मजदूर संगठन भी इसका विरोध कर रहे थे, जिसके बाद मोदी सरकार ने आंतरिक हितों का हवाला देते हुए खुद RCEP से बाहर कर लिया।