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भारतीय मीडिया सबसे बुरे दौर में, आखिर क्यों आंखे मूंदे है सरकार!

By टीम पर्दाफाश 
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नई दिल्ली: वैश्विक महामारी कोरोना के दौर में भारतीय मीडिया पर व्याप्त संकट अत्यधिक भयावह रुख अख्तियार कर रहा है। देश की अर्थव्यवस्था के संकट ने दुनिया के साथ ही मीडिया के आर्थिक तंत्र की कमर तोड़ दी है। प्रिंट मीडिया व वेब मीडिया सबसे बुरे दौर में है। भारत में दो दशक से बहुत तेजी से आगे बढ़े टीवी चैनलों व एकाएक उभरे डिजिटल व पोर्टल मीडिया को अब अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए बुरी तरह जूझने को विवश कर दिया।

लॉकडाउन के संकट ने 25 मार्च के बाद से ही सबसे पहले प्रिंट व टेलीविजन मीडिया में सभी विज्ञापनों से आमद एकदम ठप हो गई। टीवी चैनलों का जिन निजी कॉरपारेट कंपनियों पर विज्ञापनों का बकाया भुगतान था, वह तो बंद हुआ ही आगे की विज्ञापन बुंकिग भी बंद हुई, पिछला भुगतान भी अटक गया। केंद्र सरकार के विज्ञापनों पर तो एक तरह से ताला ही लग गया। इससे भी बड़ा संकट मीडिया उद्योग के उन हजारों-लाखों लोगों पर पड़ा जो पूरे देश के लोगों को सुबह सुबह ताजा तरीन खबरें पढ़ाने में पर्दे के पीछे जी जान से काम करते हैं। इनमें बड़ी तादाद में फील्ड से खबरें लाने वाले रिपोर्टर-पत्रकार से लेकर डेस्क व फीचर, ले आउट डिजाइन, प्रोडक्शन से लेकर सेल्स मार्केंटिग के पूरे चक्र का पहिया ही ठप हो गया। इस क्षेत्र में लाखों लोगों व उनके परिजनों पर संकट बढ़ा है। देश के सबसे बड़े मीडिया समूहों ने अपने पत्रकारों के वेतन में भारी कटौती कर दी। इससे उन मीडिया कर्मियों पर सबसे ज्यादा संकट आन पड़ा है जो कई साल से मीडिया में काम करते आ रहे हैं।

प्रिंट मीडिया हो, टीवी मीडिया, उनके फील्ड रिपोर्टर, सहयोगी स्टाफ, कैमरामैन, फोटो जर्नलिस्ट और उनको लाने ले जाने वाले वाहन चालकों के स्वास्थ्य पर संकट खड़ा हो गया है। बड़ी तादाद में कोरोना संक्रमण रोगियों वाले अस्पतालों में समाचार संकलन करने वाले मीडिया कर्मियों की जान खतरे में पड़ गई है। कोलकाता में वरिष्ठ प्रेस फोटोग्राफर रोनी राय की हाल में मौत कोरोना संक्रमण से हो गई। महाराष्ट्र देश ऐसा बड़ा राज्य है जहां लोगों तक रोज नई नई सूचनाएं और जानकारियां पहुंचाने वाले पत्रकार कोरोना की चपेट में आ गए।

राजधानी दिल्ली में कुछ फोटोग्राफर व स्टाफ भी चपेट में है। काम के दौरान पत्रकारों को सुरक्षा के बारे में केंद्र सरकार की ओर से राज्यों को न तो कोई दिशा निर्देश दिए गए हैं और ना ही राज्य सरकारें इस काम के लिए आगे आयी हैं। देश के कई पत्रकार संगठनों ने केंद्र व राज्य सरकारों से मांग की है कि वे इस कोरोना महामारी की चपेट में आए पत्रकारों का भी सरकारी कर्मचारियों की भांति जीवन बीमा कराएं तथा कठिन विपरीत परिस्थितियों में काम करने की वजह से संक्रमित होने पर सरकारी खर्च पर उनका उपचार हो और मृत्यु की दशा में वही मुआवजा मिले जो जरूरी सेवा में जुटे पुलिसकर्मियों को मिल रहा है।

यहां आपको याद दिला दें कि भारत सरकार ने कोविड-19 महामारी की वजह से क़रीब 50 लाख केंद्रीय कर्मचारियों और लगभग 61 लाख पेंशनभोगियों के महंगाई भत्ते अगले डेढ़ वर्ष तक पुरानी दरों पर ही रोके रखने का निर्णय किया है। केंद्रीय वित्त मंत्रालय के आदेशानुसार केंद्र सरकार के कर्मचारियों के महंगाई भत्ते और केंद्र सरकार के पेंशनभोगियों की महंगाई राहत की मौजूदा दरों को जुलाई 2021 तक रोक दिया गया है।

उधर, कोरोना महामारी के बीच देश की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज ने सैलरी में कटौती की घोषणा की है। रिलायंस के हाइड्रोकार्बन बिजनस में काम करने वाले एंप्लॉयी जिनकी सैलरी 15 लाख सालाना से ज्यादा है, उनकी सैलरी में 10 पर्सेंट की कटौती होगी। सूत्रों के हवाले से खबर है कि सीनियर एग्जिक्युटिव की सैलरी में 30-50 पर्सेंट की भारी कटौती की जा सकती है। इसके अलावा परफॉर्मेंस आधारित बोनस को भी फिलहाल टाल दिया गया है।

अब सवाल यह उठता है कि कोरोना लॉकडाउन से जबरदस्ट आर्थिक संकट में घिरी भारतीय मीडिया के लिए सरकार क्या कदम उठाती है ?

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