इसलिए दलित महिलाएं 8 को नहीं 10 मार्च को मनाती हैं भारतीय महिला दिवस

इसलिए दलित महिलाएं 8 को नहीं 10 मार्च को मनाती हैं भारतीय महिला दिवस
इसलिए दलित महिलाएं 8 को नहीं 10 मार्च को मनाती हैं भारतीय महिला दिवस

नई दिल्ली। वैसे तो आज यानि 8 मार्च को पूरे विश्व भर में महिलाओं के सम्मान के लिए अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। लेकिन भारत की कुछ दलित महिलाएं लंबे समय से आठ मार्च की जगह 10 मार्च को भारतीय महिला दिवस मना रही हैं। इसके पीछे एक खास वजह ये है कि इस दिन 19वीं सदी में स्त्रियों के अधिकारों, अशिक्षा, छुआछूत, सतीप्रथा, बाल या विधवा-विवाह जैसी कुरीतियों पर आवाज उठाने वाली देश की पहली महिला शिक्षिका सावित्री बाई फुले का स्मृति दिवस होता है। इस महिला दिवस पर आइये जानते हैं भारत की इस महानाय‍िका के बारे में….

International Women Day 2020 Savitri Bai Fule Smriti Diwas And Bhartiya Mahila Diwas :

बताया जाता है कि स्त्री श‍िक्षा की रीढ़ और क्रांतिकारी सामाजिक विचारक चरित्र है ही नहीं। यही नहीं पूरे विश्व में भी उनके जैसी स्त्री श‍िक्षा अध‍िकारों के लिए प्रतिबद्ध महानायिका मिलना मुशिकल है, इसलिए उनके स्मृत‍ि दिवस को भारतीय महिला दिवस के रूप में मनाते हैं।

सावि‍त्री बाई फुले से जुड़ी ये खास बातें

सावित्रीबाई फुले जनवरी 1831 में महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थिकत नायगांव नामक छोटे से गांव में पैदा हुई थीं। महज 9 साल की छोटी उम्र में पूना के रहने वाले ज्योतिबा फुले के साथ उनकी शादी हो गई। विवाह के समय सावित्री बाई फुले पूरी तरह अनपढ़ थीं, तो वहीं उनके पति तीसरी कक्षा तक पढ़े थे। जिस दौर में वो पढ़ने का सपना देख रही थीं, तब दलितों के साथ बहुत भेदभाव होता था।

उस समय की एक घटना के अनुसार एक दिन सावित्री अंग्रेजी की किसी किताब के पन्ने पलट रही थीं और तभी उनके पिताजी ने देख लिया। वो दौड़कर आए और किताब हाथ से छीनकर घर से बाहर फेंक दी। ऐसा उन्होने इसलिए किया क्योंकि शिक्षा का हक़ केवल उच्च जाति के पुरुषों को ही है, दलित और महिलाओं का शिक्षा ग्रहण करना पाप था। बस उसी दिन वो किताब वापस लाकर प्रण कर बैठीं कि कुछ भी हो जाए वो एक न एक दिन पढ़ना जरूर सीखेंगी।

आखिर में एक दिन उन्होंने खुद पढ़कर अपने पति ज्योतिबा राव फुले के साथ मिलकर समाज की लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले। इतिहास के पन्नों में आज भी वह दिन दर्ज है जब साल 1848 में महाराष्ट्र के पुणे में देश का सबसे पहले बालिका स्कूल की स्थापना की थी। वहीं, 18वां स्कूल भी पुणे में ही खोला गया था। उन्होंने 28 जनवरी, 1853 को गर्भवती बलात्कार पीड़ितों के लिए बाल हत्या प्रतिबंधक गृह की स्थाापना की।

बताया जाता है कि ये वह दौर था जब सावित्रीबाई फुले स्कूल जाती थीं, तो लोग पत्थर मारते थे। उन पर गंदगी फेंकते थे, सावित्रीबाई ने उस दौर में लड़कियों के लिए स्कूल खोला जब बालिकाओं को पढ़ाना-लिखाना सही नहीं माना जाता था। सावित्रीबाई फुले एक कवयित्री भी थीं। उन्हें मराठी की आदिकवयित्री के रूप में भी जाना जाता था।

नई दिल्ली। वैसे तो आज यानि 8 मार्च को पूरे विश्व भर में महिलाओं के सम्मान के लिए अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। लेकिन भारत की कुछ दलित महिलाएं लंबे समय से आठ मार्च की जगह 10 मार्च को भारतीय महिला दिवस मना रही हैं। इसके पीछे एक खास वजह ये है कि इस दिन 19वीं सदी में स्त्रियों के अधिकारों, अशिक्षा, छुआछूत, सतीप्रथा, बाल या विधवा-विवाह जैसी कुरीतियों पर आवाज उठाने वाली देश की पहली महिला शिक्षिका सावित्री बाई फुले का स्मृति दिवस होता है। इस महिला दिवस पर आइये जानते हैं भारत की इस महानाय‍िका के बारे में.... बताया जाता है कि स्त्री श‍िक्षा की रीढ़ और क्रांतिकारी सामाजिक विचारक चरित्र है ही नहीं। यही नहीं पूरे विश्व में भी उनके जैसी स्त्री श‍िक्षा अध‍िकारों के लिए प्रतिबद्ध महानायिका मिलना मुशिकल है, इसलिए उनके स्मृत‍ि दिवस को भारतीय महिला दिवस के रूप में मनाते हैं। सावि‍त्री बाई फुले से जुड़ी ये खास बातें सावित्रीबाई फुले जनवरी 1831 में महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थिकत नायगांव नामक छोटे से गांव में पैदा हुई थीं। महज 9 साल की छोटी उम्र में पूना के रहने वाले ज्योतिबा फुले के साथ उनकी शादी हो गई। विवाह के समय सावित्री बाई फुले पूरी तरह अनपढ़ थीं, तो वहीं उनके पति तीसरी कक्षा तक पढ़े थे। जिस दौर में वो पढ़ने का सपना देख रही थीं, तब दलितों के साथ बहुत भेदभाव होता था। उस समय की एक घटना के अनुसार एक दिन सावित्री अंग्रेजी की किसी किताब के पन्ने पलट रही थीं और तभी उनके पिताजी ने देख लिया। वो दौड़कर आए और किताब हाथ से छीनकर घर से बाहर फेंक दी। ऐसा उन्होने इसलिए किया क्योंकि शिक्षा का हक़ केवल उच्च जाति के पुरुषों को ही है, दलित और महिलाओं का शिक्षा ग्रहण करना पाप था। बस उसी दिन वो किताब वापस लाकर प्रण कर बैठीं कि कुछ भी हो जाए वो एक न एक दिन पढ़ना जरूर सीखेंगी। आखिर में एक दिन उन्होंने खुद पढ़कर अपने पति ज्योतिबा राव फुले के साथ मिलकर समाज की लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले। इतिहास के पन्नों में आज भी वह दिन दर्ज है जब साल 1848 में महाराष्ट्र के पुणे में देश का सबसे पहले बालिका स्कूल की स्थापना की थी। वहीं, 18वां स्कूल भी पुणे में ही खोला गया था। उन्होंने 28 जनवरी, 1853 को गर्भवती बलात्कार पीड़ितों के लिए बाल हत्या प्रतिबंधक गृह की स्थाापना की। बताया जाता है कि ये वह दौर था जब सावित्रीबाई फुले स्कूल जाती थीं, तो लोग पत्थर मारते थे। उन पर गंदगी फेंकते थे, सावित्रीबाई ने उस दौर में लड़कियों के लिए स्कूल खोला जब बालिकाओं को पढ़ाना-लिखाना सही नहीं माना जाता था। सावित्रीबाई फुले एक कवयित्री भी थीं। उन्हें मराठी की आदिकवयित्री के रूप में भी जाना जाता था।