पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू होने से IPS खुश, IAS-PCS लॉबी में पसरा सन्नाटा

IPS
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लखनऊ। प्रदेश की योगी सरकार ने पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करके दशकों से लंबित सबसे संवेदनशील प्रशासनिक निर्णय एक झटके में कर दिया। प्रदेश में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करने का प्रयास बीते 43 वर्षों से चला आ रहा था। हालांकि सरकार में हमेशा प्रभावशाली रहने वाले आईएएस संवर्ग की शासन-व्यवस्था में मजबूत पकड़ और जनता से जुड़ी तमाम दलीलों के आगे यह प्रयोग अमली जामा नहीं पहन पा रहा था। योगी आदित्यनाथ सरकार ने सीएए की घटनाओं के बाद इतनी तेजी से इस प्रणाली को लागू करने की ओर कदम उठाया कि किसी को इसके पक्ष-विपक्ष में बोलने का मौका ही नहीं मिल पाया।

Ips Happy With The Implementation Of Police Commissioner System Silence In Ias Pcs Lobby :

नाम न छापने की शर्त पर एक आईपीएस अधिकारी ने बताया कि लखनऊ सहित कई जिलों में सीएए के विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान हिंसा से निपटने में पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों के बीच सामंजस्य में कमी को पुलिस विभाग ने सटीक अवसर मानकर सत्ताशीर्ष से सीधा संवाद किया।

पुलिस के मौजूदा आला अधिकारी सरकार को समझाने में सफल रहे कि भीड़तंत्र की लगातार बढ़ती चुनौतियों से निपटने के लिए बड़े शहरों में पुलिस कमिश्नर प्रणाली अपरिहार्य हो गई है। पर्दे के पीछे कई पूर्व पुलिस प्रमुखों ने भी इस मामले में सरकार का मत स्थिर करने में अहम भूमिका निभाई।

हालात ये हुए कि नई व्यवस्था लागू करने की एक सप्ताह से चल रही कवायद के बीच न तो आईएएस एसोसिएशन के पदाधिकारी संवर्ग का पक्ष सरकार के सामने रखने को आगे आए और न ही पीसीएस एसोसिएशन के पदाधिकारी। संवर्ग व जनहित से सीधे जुड़े मामले में निर्णय के बाद भी पदाधिकारी मौन साधे रहे। प्रतिक्रिया के लिए संपर्क करने पर चुप्पी साध गए। हालांकि, दोनों ही संवर्गों के आम अफसरों में इस फैसले से बेहद बेचैनी है।

इस निर्णय से जनता को कितना फायदा होगा यह तो बाद में पता चलेगा लेकिन इसका नतीजा ये हुआ कि ब्यूरोक्रेसी में हमेशा दो नंबर पर माने जाने वाली आईपीएस लॉबी की बांछे खिल गई हैं। दूसरी ओर आला ब्यूरोक्रेट आईएएस व पीसीएस अफसर चुप्पी साधे हैं।

इस पर पूर्व मुख्य सचिव अतुल गुप्ता का कहना है कि आम लोगों के पास पुलिस उत्पीड़न के बाद अपना पक्ष रखने के लिए जिला प्रशासन एक मजबूत विकल्प था। अब उन्हें पुलिस कांस्टेबिल से पुलिस कमिश्नर तक एक ही सिस्टम से दो-चार होना पड़ेगा। कानून-व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए मौजूदा व्यवस्था में निचले स्तर पर सुधार की जरूरत थी, लेकिन किया गया ऊपरी स्तर पर। पर, अब जो भी निर्णय हुआ है, उसके बेहतर क्रियान्वयन की उम्मीद की जानी चाहिए।

लखनऊ। प्रदेश की योगी सरकार ने पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करके दशकों से लंबित सबसे संवेदनशील प्रशासनिक निर्णय एक झटके में कर दिया। प्रदेश में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करने का प्रयास बीते 43 वर्षों से चला आ रहा था। हालांकि सरकार में हमेशा प्रभावशाली रहने वाले आईएएस संवर्ग की शासन-व्यवस्था में मजबूत पकड़ और जनता से जुड़ी तमाम दलीलों के आगे यह प्रयोग अमली जामा नहीं पहन पा रहा था। योगी आदित्यनाथ सरकार ने सीएए की घटनाओं के बाद इतनी तेजी से इस प्रणाली को लागू करने की ओर कदम उठाया कि किसी को इसके पक्ष-विपक्ष में बोलने का मौका ही नहीं मिल पाया। नाम न छापने की शर्त पर एक आईपीएस अधिकारी ने बताया कि लखनऊ सहित कई जिलों में सीएए के विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान हिंसा से निपटने में पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों के बीच सामंजस्य में कमी को पुलिस विभाग ने सटीक अवसर मानकर सत्ताशीर्ष से सीधा संवाद किया। पुलिस के मौजूदा आला अधिकारी सरकार को समझाने में सफल रहे कि भीड़तंत्र की लगातार बढ़ती चुनौतियों से निपटने के लिए बड़े शहरों में पुलिस कमिश्नर प्रणाली अपरिहार्य हो गई है। पर्दे के पीछे कई पूर्व पुलिस प्रमुखों ने भी इस मामले में सरकार का मत स्थिर करने में अहम भूमिका निभाई। हालात ये हुए कि नई व्यवस्था लागू करने की एक सप्ताह से चल रही कवायद के बीच न तो आईएएस एसोसिएशन के पदाधिकारी संवर्ग का पक्ष सरकार के सामने रखने को आगे आए और न ही पीसीएस एसोसिएशन के पदाधिकारी। संवर्ग व जनहित से सीधे जुड़े मामले में निर्णय के बाद भी पदाधिकारी मौन साधे रहे। प्रतिक्रिया के लिए संपर्क करने पर चुप्पी साध गए। हालांकि, दोनों ही संवर्गों के आम अफसरों में इस फैसले से बेहद बेचैनी है। इस निर्णय से जनता को कितना फायदा होगा यह तो बाद में पता चलेगा लेकिन इसका नतीजा ये हुआ कि ब्यूरोक्रेसी में हमेशा दो नंबर पर माने जाने वाली आईपीएस लॉबी की बांछे खिल गई हैं। दूसरी ओर आला ब्यूरोक्रेट आईएएस व पीसीएस अफसर चुप्पी साधे हैं। इस पर पूर्व मुख्य सचिव अतुल गुप्ता का कहना है कि आम लोगों के पास पुलिस उत्पीड़न के बाद अपना पक्ष रखने के लिए जिला प्रशासन एक मजबूत विकल्प था। अब उन्हें पुलिस कांस्टेबिल से पुलिस कमिश्नर तक एक ही सिस्टम से दो-चार होना पड़ेगा। कानून-व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए मौजूदा व्यवस्था में निचले स्तर पर सुधार की जरूरत थी, लेकिन किया गया ऊपरी स्तर पर। पर, अब जो भी निर्णय हुआ है, उसके बेहतर क्रियान्वयन की उम्मीद की जानी चाहिए।