क्या पाटीदारों को लेकर गुजरात में यूपी वाली गलती दोहराएगी कांग्रेस

क्या पाटीदारों को लेकर गुजरात में यूपी वाली गलती दोहराएगी कांग्रेस

अहमदाबाद : विधानसभा चुनावों के चलते देश की सियासत का केन्द्र बन चुके गुजरात की राजनीति तेजी से बदल रही है। ये चुनावी लड़ाई सत्तारूढ़ भाजपा और कांग्रेस के बीच जरूर है लेकिन इसे गुुजरात के आंतरिक अंदोलनों से पैदा हुए चेहरों ने ज्यादा कठिन और कांटे की टक्कर वाला बना दिया है। 22 सालों से गुजरात की सत्ता से दूर कांग्रेस को इस चुनावों से वही संजीवनी मिलती नजर आ रही है, जिसकी उम्मीद में उसने यूपी में समाजवादी पार्टी से गठबंधन किया था। यूपी में सत्तारूढ़ सपा से गठबंधन के बावजूद कांग्रेस नतीजों में औंधेमुंह नजर आई और अपने साथ सपा को भी ले डूबी। नतीजों की समीक्षा में यही बात सामने आई कि सपा और कांग्रेस ने गठबंधन बनाने में बहुत देर कर दी थी। जिस वजह से गठबंधन के प्रत्याशियों में ही तलवारें खिंच गईं और मैदान भाजपा ने मार दिया।

अब गुजरात में भी कुछ ऐसा ही होता नजर आ रहा है। कांग्रेस को भाजपा के खिलाफ खड़े ​हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकुर और जिग्नेश मेवानी के रूप में तीनों अन्दोलनकारी चेहरों का साथ मिल गया है। पिछले एक महीने से इन तीनों को औचपारिक रूप से अपने साथ लाने के लिए कांग्रेस हाथ पैर पटक रही है। भाजपा के विरोध को छोड़कर इन तीनों नेताओं विचारधारा में कोई समानता नहीं है। कांग्रेस अपने अस्तित्व को बचाते हुए इन तीनों को अपने साथ किन शर्तों पर जोड़ेगी, और एक के साथ किए वादे दूसरे के लिए खिलाफत नहीं होगी इस बात को कैसे सुनिश्चित करेगी।

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कांग्रेस को सबसे बड़ा फायदा पाटीदार नेता हार्दिक पटेल से नजर आ रहा है। कांग्रेस जानती है कि 80 सीटों पर प्रभाव रखने वाला पाटीदार वोटबैंक खासतौर युवा पाटीदारों का समर्थन उसकी लड़ाई को मजबूती दे सकता है। लेकिन यह समर्थन उसे किस कीमत पर मिलेगा इसे लेकर मोलभाव खत्म होता नजर नहीं आ रहा।

ताजा खबरों की माने तो कांग्रेस और पाटीदार आरक्षण आंदोलन के नेताओं के बीच बात बिगड़ती नजर आ रही है। शुक्रवार को कांग्रेस और पाटीदार आंदोलन के नेताओं के बीच बैठक होना तय हुई थी। हार्दिक पटेल की टीम के एक सदस्य का आरोप है कि कांग्रेस के नेताओं ने बैठक के नाम पर उनका अपमान किया है। बैठक के नाम पर उन्हें पूरे दिन केवल इंतजार करवाया गया। वहीं कांग्रेस में मौजूद सूत्रों की माने तो कांग्रेस को हार्दिक और उनकी टीम के नेताओं द्वारा 30 से 35 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की शर्त रखी है, दूसरा पाटीदारों के आरक्षण के लिए जो फामूर्ला आन्दोलन समिति की ओर से सुझाया जा रहा है वह भी कांग्रेस के लिहाज से प्रैक्टिकल नहीं है।

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जिसकी कुछ वजहें भी सामने आ रही हैं। जैसे…

1. कांग्रेस अपनी पहचान खोकर पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल का हाथ नहीं पकड़ना चाहती, क्योंकि ऐसे में उसे जीत मिलती भी है तो उसका श्रेय राहुल गांधी को न जाकर हार्दिक पटेल को जाएगा। राहुल गांधी को जीत के बाद भी कुछ गुड फॉर नथिंग का टैग लगा ही रहेगा।

2. पाटीदारों आंदोलन की कोख से जन्में हार्दिक पटेल और उनकी टीम के नेताओं को मालूम है कि एक बेसिर पैर के आन्दोलन ने उन्हें जो पहचान दी है, वह अपने चरम पर है। अगर वह इस चुनाव में उसे नहीं भुना सके तो सब बेकार हो जाएगा। जिसके लिए हार्दिक पटेल एंड टीम कांग्रेस से अपनी ऊंची बोली लगवाने में लगी है।

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3. कांग्रेस जानती है कि हार्दिक पटेल एंड टीम भाजपा के साथ नहीं जा सकते, और आज भी पूरा पाटीदार समाज इस आंदोलन के आधार पर कांग्रेस को वोट नहीं दे सकता। लेकिन उसे जो फायदा होगा उसकी कीमत वह खुद तय करना चाहती है, जिसके लिए अंत समय तक इंतजार किया जाएगा।

4. कांग्रेस की बड़ी समस्या ये भी है कि आज वह पाटीदार नेताओं को आरक्षण के मुद्दे पर हामी भर भी देती है तो अगले ही दिन से भाजपा ओबीसी और एससी एसटी वर्ग को उसके विरोध में खड़ा कर देगी। पाटीदारों के वोटों की कीमत उसे इस नुकसान के रूप में भी चुकानी पड़ सकती है।

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