गोरखपुर महोत्सव पर सवाल, क्यों बदले बदले नजर आते हैं सरकार

gorakhpur-mahotsaw
गोरखपुर महोत्सव पर सवाल, क्यों बदले बदले नजर आते हैं सरकार

लखनऊ। आज गोरखपुर शहर का जिक्र आते ही जो बात हमारे और आपके जहन में सबसे पहले आती है, वह है इस शहर का उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से कनेक्शन। गोरखपुर से विधायक और फिर सांसद बनने के बाद सूबे के मुख्यमंत्री बने योगी आदित्यनाथ इन दिनों गोरखपुर महोत्सव को लेकर बेहद व्यस्त हैं। सरकार के नजरिए से इस महोत्सव को भोजपुरी संस्कृति से विस्तार से जोड़कर देखा जा रहा है। कार्यक्रम भले ही सांस्कृतिक हो लेकिन वास्तविकता में इस कार्यक्रम पर सियासत होना शुरू हो गई है। सीएम योगी पर भी सीएम मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव पर सैफई महोत्सव को लेकर उठने वाले सवालों जैसे ही तीर दागे जा रहे हैं।

Is Gorakhpur Mahotsav Priority For Cm Yogi Adityanath Uttar Pradesh And Gorakhpur :

गोरखपुर महोत्सव पर सबसे बड़ा सवाल किया है बीआरडी मेडिकल कालेज में इंसेफ्लाइटिस से होने वाली मौतों की तादात ने। इस मेडिकल कालेज में 24 घंटों में हुई 40 बच्चों की मौत ने यूपी सरकार को हिला कर रख दिया था। इन मौतों को लेकर लंबे समय तक सियासत हुई और फिर शांत हो गई, लेकिन गोरखपुर महोत्सव ने एकबार इन मौतों को लेकर सीएम योगी आदित्यनाथ को घेरने का मौका दे दिया है।

विपक्ष पूछने लगा है कि जिस गोरखपुर में हर रोज 5 बच्चों की मौत होती है, उस गोरखपुर के लिए प्राथमिकता क्या होनी चाहिए थी? गोरखपुर में इलाज की सुविधा को बेहतर बनाने की जरूरत थी या फिर महोत्सव के नाम पर पैसा पानी की तरह बहाने की।

यह सवाल शायद अपने आप में बेहद जायज है, क्योंकि सरकार का दावा है कि गोरखपुर महोत्सव पर 33 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। उस सूरत में जब गोरखपुर का मेडिकल कालेज अपने बिलों का भुगतान समय पर नहीं कर पाता। अगर इन 33 करोड़ रुपयों को गोरखपुर मेडिकल कालेज में मौजूद व्यवस्था को सुदृढ़ करने पर खर्च किया जाता तो शायद हर रोज कम से कम एक बच्चे की जिन्दगी बचाई जा सकती थी। शायद अगले साल इंसेफ्लाइटिस से होने वाली मौतों के आंकड़े को थोड़ा घटाया जा सकता था।

यह सवाल इसलिए भी उठाया जा रहा है क्योंकि सीएम योगी वह व्यक्ति थे जिन्होंने इंसेफ्लाटिस पर होने वाली बच्चों की मौतों पर संसद में आंसू गिराए थे। उनके आंसुओं ने सारे देश का ध्यान गोरखपुर की इस समस्या की ओर खींचा था।

यह सवाल इसलिए भी उठाया जा रहा है क्योंकि सीएम योगी से ऐसी उम्मीद नहीं की जा रही थी, कि वे महोत्सव जैसे आयोजनों को करना पसंद करते होंगे। यह सवाल इसलिए भी उठाया जा रहा है क्योंकि सरकार के पास प्राइमरी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए स्वेटर खरीदने के लिए बजट कम है और वादे के बाद भी जूते मोजे देने के लिए बजट ही नहीं है।

यह सवाल इसलिए भी उठाया जा रहा है, क्योंकि एक जिम्मेदार मुख्यमंत्री के रूप में उनकी प्राथमिकताएं दूसरी होनी चाहिए थीं, अगर अनुराधा पौडवाल को सुनना था तो 100 रुपए की ओरिजनल एमपी3 लखनऊ के जनपथ मार्केट की मशहूर म्यूजिक लाइब्रेरी में​ खरीदी जा सकती थी।

यह सवाल इसलिए भी उठाया जा रहा है, क्योंकि उत्तर प्रदेश के अधिकांश विकास कार्यों को बजट की कमी के चलते धीमा किया गया है, ऐसे में नए आयोजनों को प्राथमिकता दिया जाना गैरजरूरी नजर आता है।

लखनऊ। आज गोरखपुर शहर का जिक्र आते ही जो बात हमारे और आपके जहन में सबसे पहले आती है, वह है इस शहर का उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से कनेक्शन। गोरखपुर से विधायक और फिर सांसद बनने के बाद सूबे के मुख्यमंत्री बने योगी आदित्यनाथ इन दिनों गोरखपुर महोत्सव को लेकर बेहद व्यस्त हैं। सरकार के नजरिए से इस महोत्सव को भोजपुरी संस्कृति से विस्तार से जोड़कर देखा जा रहा है। कार्यक्रम भले ही सांस्कृतिक हो लेकिन वास्तविकता में इस कार्यक्रम पर सियासत होना शुरू हो गई है। सीएम योगी पर भी सीएम मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव पर सैफई महोत्सव को लेकर उठने वाले सवालों जैसे ही तीर दागे जा रहे हैं।गोरखपुर महोत्सव पर सबसे बड़ा सवाल किया है बीआरडी मेडिकल कालेज में इंसेफ्लाइटिस से होने वाली मौतों की तादात ने। इस मेडिकल कालेज में 24 घंटों में हुई 40 बच्चों की मौत ने यूपी सरकार को हिला कर रख दिया था। इन मौतों को लेकर लंबे समय तक सियासत हुई और फिर शांत हो गई, लेकिन गोरखपुर महोत्सव ने एकबार इन मौतों को लेकर सीएम योगी आदित्यनाथ को घेरने का मौका दे दिया है।विपक्ष पूछने लगा है कि जिस गोरखपुर में हर रोज 5 बच्चों की मौत होती है, उस गोरखपुर के लिए प्राथमिकता क्या होनी चाहिए थी? गोरखपुर में इलाज की सुविधा को बेहतर बनाने की जरूरत थी या फिर महोत्सव के नाम पर पैसा पानी की तरह बहाने की।यह सवाल शायद अपने आप में बेहद जायज है, क्योंकि सरकार का दावा है कि गोरखपुर महोत्सव पर 33 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। उस सूरत में जब गोरखपुर का मेडिकल कालेज अपने बिलों का भुगतान समय पर नहीं कर पाता। अगर इन 33 करोड़ रुपयों को गोरखपुर मेडिकल कालेज में मौजूद व्यवस्था को सुदृढ़ करने पर खर्च किया जाता तो शायद हर रोज कम से कम एक बच्चे की जिन्दगी बचाई जा सकती थी। शायद अगले साल इंसेफ्लाइटिस से होने वाली मौतों के आंकड़े को थोड़ा घटाया जा सकता था।यह सवाल इसलिए भी उठाया जा रहा है क्योंकि सीएम योगी वह व्यक्ति थे जिन्होंने इंसेफ्लाटिस पर होने वाली बच्चों की मौतों पर संसद में आंसू गिराए थे। उनके आंसुओं ने सारे देश का ध्यान गोरखपुर की इस समस्या की ओर खींचा था।यह सवाल इसलिए भी उठाया जा रहा है क्योंकि सीएम योगी से ऐसी उम्मीद नहीं की जा रही थी, कि वे महोत्सव जैसे आयोजनों को करना पसंद करते होंगे। यह सवाल इसलिए भी उठाया जा रहा है क्योंकि सरकार के पास प्राइमरी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए स्वेटर खरीदने के लिए बजट कम है और वादे के बाद भी जूते मोजे देने के लिए बजट ही नहीं है।यह सवाल इसलिए भी उठाया जा रहा है, क्योंकि एक जिम्मेदार मुख्यमंत्री के रूप में उनकी प्राथमिकताएं दूसरी होनी चाहिए थीं, अगर अनुराधा पौडवाल को सुनना था तो 100 रुपए की ओरिजनल एमपी3 लखनऊ के जनपथ मार्केट की मशहूर म्यूजिक लाइब्रेरी में​ खरीदी जा सकती थी।यह सवाल इसलिए भी उठाया जा रहा है, क्योंकि उत्तर प्रदेश के अधिकांश विकास कार्यों को बजट की कमी के चलते धीमा किया गया है, ऐसे में नए आयोजनों को प्राथमिकता दिया जाना गैरजरूरी नजर आता है।