ISRO का नया कीर्तिमान, देश के सबसे बड़े रॉकेट का सफल प्रक्षेपण

श्रीहरिकोटा। अन्तरिक्ष में अपनी पैठ बनाने में जुटा इसरो (ISRO)आए दिन नए अपने सफल परीक्षण कर रहा है। आज एक बार फिर इसरो ने अपने मुख्यालय आंध्रा प्रदेश के श्रीहरिकोटा से देश के सबसे बड़े रॉकेट जीएसएलवी-मार्क 3 का सफल प्रक्षेपण किया। इसकी सफलता के साथ ही भारत ने अंतरिक्ष में बड़ी कामयाबी हासिल कर ली है जिसके बाद देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ने वैज्ञानिकों को बधाई दिया। सफल प्रक्षेपण के बाद इसकी खुशी साफ तौर पर इस अभियान से जुड़े वैज्ञानिकों के चेहरे पर देखा जा सकता था। सोशल मीडिया पर भी इस कामयाबी के बाद खुशी की लहर दौड़ गयी है। इस सफल प्रक्षेपण के बाद एक वैज्ञानिक ने कहा कि इसकी सफलता एक तरह से अपने बच्चे को पहली बार चलते हुए देखने जैसा है।



 

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जानें GSLV की खासियत…

  • जीएसएलवी एमके-तृतीय देश का पहला ऐसा उपग्रह है जो अंतरिक्ष आधारित प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करके तेज स्पीड वाली इंटरनेट सेवाएं मुहैया कराने में सक्षम है।
  • इंटरनेट सेवाओं का फैलाव शायद तुरंत ना हो लेकिन देश ऐसी क्षमता विकसित करने पर जोर दे रहा है जो फाइबर ऑप्टिक इंटरनेट की पहुंच से दूर स्थानों को जोड़ने में महत्वपूर्ण हो।
  • तीन टन से ज्यादा वजनी जीसैट-19 उपग्रह भारत में बना और प्रक्षेपित होने वाला सबसे भारी उपग्रह है, यह एक विशालकाय जानवर के बराबर है।
  • जीसैट-19 को पहली बार स्वदेश निर्मित लीथियम आयन बैटरियों से संचालित किया जा रहा है।
  • अब तक 2300 किलोग्राम से अधिक वजन के संचार उपग्रहों के लिए इसरो को विदेशी लांचरों पर निर्भर करना पड़ता था।
  • जीएसएलवी एमके-थ्री 4000 किलोग्राम तक के पेलोड को उठाकर भूतुल्यकालिक अंतरण कक्षा (जीटीओ) और 10 हजार किलोग्राम तक के पेलोड को पृथ्वी की निचली कक्षा में पहुंचाने में सक्षम है।
  • यह रॉकेट 640 टन वजनी और 43.43 मीटर लंबा था।
  • इस रॉकेट की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि रॉकेट के मुख्य व सबसे बड़े क्रायोजेनिक इंजन को इसरो के वैज्ञानिकों ने भारत में ही विकसित किया।
  • इस मिशन की सफलता से अब वजनी उपग्रहों को अंतरिक्ष में ले जाने के लिए विदेशी एंजेसियों को जो पैसे दिए जाते थे वो बच जाएंगे. और भारत विदेशी ग्राहकों को लुभाने में भी सफल होंगे।
  • जीसैट-19 एक बहुतरंगी उपग्रह है, जो का और कू बैंड वाले ट्रांसपोंडर्स अपने साथ लेकर गया।
  • जीसैट-19 की सबसे नई बात यह है कि पहली बार उपग्रह पर कोई ट्रांसपोन्डर नहीं था।

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