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खुशनसीब है बह माँ-बाप, जिनका ऐसा “नालायक बेटा” होता है

It Is Good Luck To Have Parents Who Have Such An Unworthy Son

By टीम पर्दाफाश 
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रात के घनघोर अँधेरे के साथ तेज कड़कती बिजली की आबाज को साफ़ सुना जा सकता था। शर्द रात और बारिश का मिलन किसी की रगो में दौड़ते खून को जमा देने को आतुर थी। देर रात अचानक ही पिता जी की तबियत बिगड़ गयी। और इसकी भनक माँ को लग गई। लेकिन बह किसी को आबाज नहीं देना चाहती थी। अगर बह चाहती तो पास के कमरे में सो रहे अपने बेटा बहु को आबाज लगा उन्हें बुला सकती थी। लेकिन उन्हें डर था कि कंही किसी की नींद न खराब हो जाए। बैसे भी तो पुरे दिन काम पर रह कर बापिस थके हारे लौट कर अपने विस्तर में सो रहे होंगे। यह सब विचार माँ के मन में चल रहे थे।

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हालाँकि पिता जी की तबियत शर्दी के गिरते तापमान की तरह खराब होती जा रही थी। माँ अब ब्याकुल हो उठी थी, बह अब आबाज लगाकर किसी को बुलाना चाहती थी। साथ ही बराबर अपने पति के सर को अपनी साडी के पल्लू से पोछ रही थी। माँ ने पिता जी के सर को पोछते हुए खिड़की से आसमान की तरफ देखा, बाहर शर्द हबाओ के साथ तेज बिजली कड़क रही थी। निगाह घुमाई तो सामने उनका नालायक बेटा उनके सामने खड़ा था। जो सायद अपने पिता जी की आहट पर जाग गया था।

माँ ने जल्दी से उसको ड्राइवर बुलाने के लिए कहा, लेकिन उसने सोचा की अब इतनी रात इतनी शर्द में जल्दी से ड्राइवर कहा से आ पायेगा। इतना सोचते हुए, उसने सहजता के साथ अपने मजबूत कंधो पर पिता जी को उठने में सहारा दिया। और अपने कंधो के सहारे पिता जी को कार में बिठाया। अब पिता जी आराम से कार में बैठ चुके थे, बेटे ने बिना बक्त गंवाए गाडी को तेजी के साथ हॉस्पिटल की तरफ मोड़ दिया। हबायें बहुत तेज थी, शर्द रात में पड़ी ओश कार के सीसे पर साफ़ देखी जा सकती है। पिता जी दर्द से कराह रहे थे, साथ ही उसे डांट भी रहे थे, “धीरे चला नालायक, एक काम जो इससे ठीक से हो जाए।”

नालायक बेटा जल्दी से गाडी चलाकर किसी तरह हॉस्पिटल पहुंचना चाहता था। उसने अपने पिता जी से कहा, “आप ज्यादा बातें ना करें बाऊजी, बस तेज़ साँसें लेते रहिये, हम हॉस्पिटल पहुँचने वाले हैं।”

कुछ ही देर में नालायक बेटा तेज रफ्तार के साथ हॉस्पिटल की दहलीज में दाखिल हो जाता है। बाऊजी की तबियत बिगड़ चुकी थी, बह जल्दी से उन्हें गाडी से उतरने में मदद करता है। तब तक गाडी के पास हॉस्पिटल का स्ट्रेचर आ जाता है। डॉक्टर की निगरानी में अब बाऊजी हॉस्पिटल के अंदर थे। नालायक बेटे ने एक तेज साँस ली, और खुले आसमान की तरफ देखा मानो बह जल्दी पहुंचने पर ऊपर बाले का सुक्रिया करना चाहता हो।

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बेटे के मन में बड़ी बेचैनी हो रही थी, बह तेज कदमो के साथ अस्पताल के बरामदे में चहलकदमी करने लगा। बार बार हांथो को मसल अपने मुंह पर रख लेता, मानो उसकी हांथो की गर्माहट से शर्दी रुक जाएगी। बचपन से आज तक उसने अपने लिए सिर्फ एक शब्द ही सुना था, बाऊजी के मुंह से नालयक। उसने भी कहीं न कहीं अपने मन में यह स्वीकार कर लिया था कि उसका नाम ही शायद नालायक है। तभी तो सभी लोग उससे स्कूल के समय से ही कहते थे, कि देखो नालायक फिर से फेल हो गया। इसकी करामात देख कोई इसको चपराशी भी न रखे। कोई पागल ही इसके साथ शादी करेगी, कोई मुर्ख ही अपनी बेटी का हाँथ इसके हांथो में दे। क्यूंकि बह नालायक था।

समय बीतता गया, बड़ा हो गया लेकिन शव्दो के वाण बंद नहीं हुए। एक समय पर शादी हो गयी, लेकिन सभी यही कहते इस बेचारी के भाग्य फुट गए जो इस नालायक के पल्ले पड़ गयी। जीवन में अगर कोई था, जिसने उसके सही नाम से पुकारा बह माँ थी। जिसने उसके असल नाम को जीबित रखा हुआ था। बरना मोहल्ले बालो से लेकर दुनिया की नजर में उसका नाम नालायक ही पड़ गया था। पर आज अगर बाऊजी को कुछ हो गया तो सायद माँ भी… इतना सोचते ही आँख भर आई।

टहलते हुए उसकी निगाह पास बने मंदिर पर पड़ी, बन्हा जाकर प्रार्थना में डूब गया। प्रार्थना में शक्ति थी या समस्या मामूली, डाक्टरों ने सुबह सुबह ही बाऊजी को घर जाने की अनुमति दे दी। बाऊजी अब ठीक हो चुके थे, माँ के चेहरे पर हल्की सी आती मुश्कुराहट को साफ़ देखा जा सकता था। हॉस्पिटल से छुट्टी होने के बाद बापिस घर आने का समय हो गया था। कुछ ही देर में बह घर के बाहर मौजूद था। बाऊजी को फिर गाडी से उतरने में सहारा दिया, और कमरे तक अभी छोड़ा ही था कि बाऊजी एक वार फिर चीखे, “छोड़ नालायक ! तुझे तो लगा होगा कि बूढ़ा अब लौटेगा ही नहीं।”

उसने एक निगाह बाऊजी की तरफ देखा और उदास मन से कमरे से बाहर आ गया। लेकिन माँ से अब रहा नहीं गया, “इतना सब तो करता है, बावजूद इसके आपके लिए वो नालायक ही है? राजेश और विशाल अभी तक टाँगे फैला कर सो रहे है उन्हें तो अंदाजा भी नहीं होगा की रात को क्या हुआ होगा। बहुओ ने भी जहमति नहीं उठाई की उन्हें एक बार बाऊजी की तबियत के बारे में बता दे। यह एक आहट पाकर आ गया और किसी को भी परेशान नहीं किया तय समय पर हॉस्पिटल ले गया। लेकिन फिर भी नालायक। भगवान न करे कल को कुछ अनहोनी हो जाती तो ?और आप हैं की, उसे शर्मिंदा करने और डांटने का एक भी मौका नहीं छोड़ते।

इतना कहते कहते माँ की आँखों में आँशु उमड़ पड़े, इस बार बाऊजी ने आश्चर्य भरी नजरों से उनकी ओर देखा और फिर नज़रें नीची कर ली। माँ अब भी रोते हुए बोल रही थी, आखिर क्या कमी है हमारे बेटे में ? हां मानती हूँ पढ़ाई में थोड़ा कमजोर था। तो क्या सभी होशियार ही इस दुनिया में पैदा होते है। आज बह हम दोनों के लिए क्या नहीं करता, अपना परिवार हम दोनों की देखभाल घर-मकान, पुश्तैनी कारोबार, रिश्तेदार और रिश्तेदारी सब कुछ तो बखूबी सम्भाल रहा है। और बाकी दोनों पुत्र जिन्हे आप लायक समझते है बह अपनी बीबी बच्चो के अलावा ज्यादा से ज्यादा अपनी ससुराल का ख्याल रखते है। कभी आपसे या मुझसे पूछा कि बाऊजी की तबियत कैसी है। और आप है कि इसको नालायक ही बोलते है।

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बाऊजी अब भी ख़ामोशी के साथ माँ की बात सुन रहे थे, तभी माँ को रोते देख बाऊजी ने अपने लड़खड़ाते हांथो से माँ के आँशु पोछते हुए कहा, निर्मला तुम भी मेरी भावनाओ को नहीं समझ पाई ? तुमने सिर्फ मेरे शब्दों को पकड़ा उनमे छिपा अपनापन नहीं। तुम्हे क्या लगता है, इतना सबकुछ हो जाने के बाबजूद क्या मेरा मन उसको बेटा कहकर गले लगाने को नहीं करता। करता है निर्मला जोर से करता है, मेरा दिल पत्थर का नहीं है। अगर सच कहूं तो मुझे डर लगता है, की कंही यह भी उन दोनों बेटो की तरह “लायक” न बन जाए। और इसीलिए अपने जीते जी इसको मैं कभी इसकी पूर्णताः का अहसास नहीं होने दूंगा।

बाऊजी की बाते सुन माँ चौक गयी, ये क्या कह रहे हैं आप। हां निर्मला ठीक ही तो कह रहा हूँ, अब यही सच है अब चाहें तो तुम इसे मेरा स्वार्थ कह सकती हो। लेकिन मैं इसको बगल में लेते लायक बेटो की तरह बनता हुआ नहीं देख सकता हूँ।

इतना कहते ही बाऊजी ने अपने हांथो को जोड़ते हुए माँ की तरफ कर दिए, जिसे झट से निर्मला ने अपनी हथेली में भर लिया। अरे ये क्या कर रहे है आप ? मुझे क्यों पाप का भागी बना रहे है। मेरी ही गलती है, जो मैंने इतने सालो में आपके मन को नहीं पहचाना और हमेशा उसे ताना समझा। दरबाजे के कोने से सट कर नालायक बेटा माँ बाऊजी की बातो को सुन सुन कर आंसुओं में तरबतर हुए जा रहा था। उसका मन करा की दौड़ कर बाऊजी के गले से लग जाये पर ऐसा करते ही उसके बाऊजी झेंप जाते।

इतना सोचते ही उसने अपने कमरे की तरफ कदम बड़ा दिए, अभी कमरे तक पहुंचा भी नहीं था। की एक जोरदार आबाज आई, अरे नालायक वो दवाईयाँ कहाँ रख दी। गाडी में ही भूल गया क्या? कितना भी करलो इस लड़के के साथ एक काम इससे ठीक से नहीं होता। दिन भर नालायको की तरह मटरगस्ती करवा लो। नालायक झट पट आँसू पोंछते हुए गाड़ी से दवाईयाँ निकाल कर बाऊजी के कमरे की तरफ दौड़ गया।

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The Hindu Times से साभार

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