कोर्ट की रोक के बावजूद भी नही थम रहा जनपद में बालू का खनन

कदौरा । कदौरा विकासखंड के कितने गांवों से मौरम व रेता का अवैध कारोबार संचालित हो रहा है इस अवैध काम को कौन लोग दबंगई से अंजाम तक पहुंचा रहे हैं। इससे जिला प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों को कोई लेना देना नहीं है और न ही खनिज अधिकारी इस मामले में कोई कार्यवाही करना चाहते हैं। यही कारण है कि शाम ढलते ही चिन्हित गांवों से ट्रैक्टर-ट्रालियों से ही नहीं बल्कि ट्रकों से मौरम व रेता का अवैध खनन का कार्य शुरू हो जाता है और प्रातः होते ही अवैध कारोबार में लिप्त लोग दिन में चैन की नींद सोते नजर आते हैं।




विकासखंड के ग्राम भेड़ी खुर्द के बाद लोहिया ग्राम मदरा लालपुर से भी पिछले लंबे समय से अवैध तरीके से मौरम व रेता का अवैध खनन ग्राम प्रधान प्रतिनिधि चंद्रशेखर जो पूर्व प्रधान बताये जाते हैं वह अपनी दबंगई से कराते देखे जा रहे हैं। शाम ढलते ही उनके संरक्षण में अनेकों ट्रैक्टर व ट्राली नदी के किनारे पहुंचकर मौरम व रेता को भरकर गंतव्य स्थानों के लिये प्रस्थान कर जाते हैं। ऐसे वाहनों को रोकने या टोकने की हिम्मत खाकी बर्दीधारी सुविधा शुल्क के लालच में नहीं करते हैं। तो वहीं जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी तो मानो अपनी आंख व कान बंद करके कुर्सियों पर बैठे हुये हैं। यह स्थिति तब है जब न्यायालय द्वारा जनपद में खनन कार्य पर वर्ष 2012 में रोक लगा दी थी लेकिन ग्राम प्रधान प्रतिनिधि ने अपनी कमाई बढ़ाने की मंशा से नदी के तट पर रात के अंधेरे में चहल कदमी कर मौरम व रेता का अवैध तरीके से खनन कराने में कोई हिचक नहीं दिखा रहे हैं।



इसका जीता जागता उदाहरण गांव पहुंची मीडिया टीम ने जब गांव का भ्रमण किया तो गांव में एक दो स्थानों पर नहीं बल्कि दर्जनों स्थानों पर मौरम व रेता के ढेर लगे देखा तो ग्रामीणों से जानकारी ली तो उन्होंने दबी जुबान से बताया कि ग्राम प्रधान प्रतिनिधि शाम ढलते ही नदी से मौरम व रेता का अवैध खनन करवाकर गांव में ढेर लगवा देते हैं इसके बाद उसकी बिक्री करते हैं। ताज्जुब की बात तो यह है कि अवैध मौरम कारोबारियों के विरुद्ध अभियान चलाने का दावा करते नहीं थकने वाले जिला खनिज अधिकारी व उनके विभागीय अधिकारियों की नजरों में ऐसे गांवों को अब तक चिन्हित क्यों नहीं किया जहां दर्जनों की संख्या में लाखों रुपये की मौरम व रेता डम्प है। ताज्जुब की बात तो यह है कि ऐसे मौरम व रेता के ढेर अमरबेल की तरह है जो कभी भी खत्म होने का नाम ही नहीं लेते। प्रातः ग्रामीण जिस स्थान को खाली देखते हैं और प्रातः जब वह घर से बाहर निकलते हैं तो उन्हें उस स्थान पर मौरम या रेता का बड़ा ढेर दिखता हैं। यह प्रक्रिया सालों से चली आ रही हैं। लेकिन जिला खनिज कार्यालय के अधिकारियों ने इसका आज तक कोई संज्ञान ही नहीं लिया।

जालौन से सौरभ पांडेय की रिपोर्ट