सीबीआई के जवाहरबाग कांड जांच से तमाम अफसरों पर गाज गिरनी तय

इलाहाबाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मथुरा के जवाहर बाग पार्क में अवैध कब्जा हटाने को लेकर हुई 28 मौतों की घटना की जांच सीबीआई को सौंप दी। कोर्ट ने कहा है कि उन अधिकारियों को चिन्हित किया जाए जिन्होंने इंटेलीजेंस इनपुट एवं जिला प्रशासन द्वारा राज्य सरकार को भेजे गए पत्रों पर कोई कार्यवाही नहीं की। कोर्ट ने राज्य सरकार को भी निर्देश दिया है कि संबंधित सभी रिकार्ड सीबीआई को उपलब्ध कराएं। ताकि अपने कर्तव्य का पालन करने में लापरवाही बरतने वालों की पहचान कर उन पर कार्रवाई की जा सके। कोर्ट ने सीबीआई को दो माह का समय दिया है और कहा है कि वह अपनी रिपोर्ट हाईकोर्ट में सील कवर लिफाफे में पेश करे। सभी याचिकाओं की पुन: सुनवाई दो मई को होगी।




हाईकोर्ट ने कहा कि प्रदेश के डीजीपी इस मामले की पूरी पत्रावली तत्काल सीबीआई को सौंपे ताकि सीबीआई निर्धारित समय में नए सिरे से इस समूचे घटना की जांच कर सके। कोर्ट ने सीबीआई को दो जांच टीमें गठित कर जांच नये सिरे से शुरू करने का निर्देश दिया है। चूंकि नये सिरे से सीबीआई को जांचकर रिपोर्ट देनी है इस कारण हाईकोर्ट ने सीबीआई की रिपोर्ट पेश होने तक पुलिस द्वारा दाखिल चार्जशीट के आधार पर आपराधिक मुकदमों की सुनवाई पर रोक लगा दी है। साथ ही साथ कोर्ट ने सीबीआई को निर्देश दिया है कि वह अपनी जांच रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में कोर्ट के समक्ष इस केस की अगली सुनवाई की तिथि दो मई को प्रस्तुत करे। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश डी.बी. भोसले तथा न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की खण्डपीठ ने विजय पाल सिंह तोमर व कई अन्य की जनहित याचिकाओं पर दिया है।

कोर्ट ने कहा है कि सीबीआई की गठित पहली जांच टीम दो जून 2016 की जवाहर बाग पार्क को खाली कराने की घटना की जांच करे और नये सिरे से अपनी रिपोर्ट पेश करे। दूसरी टीम दो वर्ष तक भारी समर्थकों के साथ पार्क पर मास्टर माइंड रामवृक्ष यादव के अवैध कब्जा कायम रहने की जांच करे। कोर्ट ने कहा है कि उन अधिकारियों को चिन्हित किया जाए जिन्होंने इंटेलीजेंस इनपुट एवं जिला प्रशासन द्वारा राज्य सरकार को भेजे गए पत्रों पर कोई कार्यवाही नहीं की।




कोर्ट ने राज्य सरकार को भी निर्देश दिया है कि संबंधित सभी रिकार्ड सीबीआई को उपलब्ध कराएं। ताकि अपने कर्तव्य का पालन करने में लापरवाही बरतने वालों की पहचान कर उन पर कार्रवाई की जा सके। कोर्ट ने सीबीआई को दो माह का समय दिया है और कहा है कि वह अपनी रिपोर्ट हाईकोर्ट में सील कवर लिफाफे में पेश करे। सभी याचिकाओं की पुन: सुनवाई दो मई को होगी।

कोर्ट ने कहा है कि पुलिस विवेचना एवं रिपोर्ट में भारी खामियां है। महाधिवक्ता ने स्वयं ही एसआईटी जांच को स्वीकार किया है। पुलिस चार्जशीट व विवेचना के तरीके से स्पष्ट तौर पर नहीं कहा जा सकता कि गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ घटना में लिप्त होने का पर्याप्त साक्ष्य है और अभियोजन 28 मौतों में दो पुलिस अधिकारियों के हत्यारों सहित सभी की मौत के दोषियों को सजा दिला पायेगा।

कोर्ट ने सभी तथ्यों एवं पुलिस की लचर विवेचना को देखते हुए घटना के पीछे का सच जानने के लिए भी नये सिरे से जांच को जरूरी माना और कहा कि पूरे प्रकरण की सीबीआई से जांच कराया जाना जरूरी है। कोर्ट ने महाधिवक्ता की याचिकाकर्ता के राजनीतिक दल से जुड़े होने तथा बिना ठोस तथ्य के दाखिल याचिका की पोषणीयता पर सवाल उठाये गये। सवालों को यह कहते हुए नहीं माना कि कई याचिकाएं ऐसी ही मांगों को लेकर दाखिल की गयी है। ऐसे में पोषणीयता पर आपत्ति स्वीकार होने योग्य नहीं है।