जस्टिस रंजन गोगोई : राजनीति के अयोध्या कांड का समापन लिखने वाले चीफ़ जस्टिस

CJI Ranjan gogoi
जस्टिस रंजन गोगोई : राजनीति के अयोध्या कांड का समापन लिखने वाले चीफ़ जस्टिस

नई दिल्ली। पिछले साल जारी हुई किताब ‘गुवाहाटी हाईकोर्ट, इतिहास और विरासत’ में देश के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के बारे में एक ख़ास किस्से का ज़िक्र है। एक बार जस्टिस गोगोई के पिता केशब चंद्र गोगोई (असम के पूर्व मुख्यमंत्री) से उनके एक दोस्त ने पूछा कि क्या उनका बेटा भी उनकी ही तरह राजनीति में आएगा? इस सवाल पर जस्टिस गोगोई के पिता केशब चंद्र गोगोई ने कहा कि मेरा बेटा एक शानदार वकील है और उसके अंदर इस देश के मुख्य न्यायाधीश बनने की क्षमता है। भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई शुक्रवार को उच्चतम न्यायालय के कक्ष संख्या एक में अंतिम बार बैठे। हालांकि वह आधिकारिक रूप से रविवार को सेवानिवृत्त होंगे। इस मौके पर आपको सीजेआई रंजन गोगोई के उन फैसलों के बारे में बताएंगे जिनके लिए वह हमेशा याद रखे जाएंगे। 500 साल पुराने अयोध्या विवाद का निपटारा हो या असम में एनआरसी लागू करवाने, जस्टिस गोगोई ने अपनी कड़क छवि के मुताबिक काम किया। उन्होंने न तो खुद कोई प्रकरण टाला और न सरकार को लटकाने दिया।

Justice Ranjan Gogoi Chief Justice Who Wrote The Ayodhya Scandal Of Politics :

अयोध्या पर दिया ऐतिहासिक फ़ैसला
न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने अयोध्या विवाद में तय किया कि दलीलों को लंबे समय तक खींचे जाने की इजाजत नहीं दी जाएगी। उन्होंने 161 साल से लंबित रामजन्म भूमि के विवाद का शानदार निपटारा किया। उन्होंने मंदिर के लिए भूमि जरूर हिन्दू पक्ष को दी बल्कि मुस्लिम पक्ष को भी मस्जिद के लिए पांच एकड़ जमीन देने का आदेश दिया। इस केस की सुनवाई उन्होंने बहुत ही संतुलित ढंग से की और जल्द निपटाने के लिए सुनवाइयां शनिवार को भी कीं। खास बात यह है कि इस मुद्दे का फैसला भी उन्होंने शनिवार 9 नवंबर को दिया। दूसरा फैसला राफेल लड़ाकू विमान की खरीद पर सरकार को क्लीन चिट देने का है। इसमें एक बार नहीं बल्कि दो बार उन्होंने सरकार को क्लीन चिट दी।

जब जस्टिस काटजू को कोर्ट में किया तलब

जस्टिस गोगोई के मुख्य न्यायाधीश बनने से पहले ही उनकी सख्त छवि उस वक्त उभरकर सामने आई थी, जब उन्होंने जस्टिस मार्कंडेय काटजू को अवमानना के एक मामले में कोर्ट में तलब कर लिया। जस्टिस काटजू ने केरल के सौम्या बलात्कार कांड में कोर्ट के फैसले की बेहद तल्ख लहजे में आलोचना की थी। जस्टिस गोगोई ने इसे अदालत की अवमानना की तरह लिया और काटजू को कोर्ट में पेश होने के लिए नोटिस जारी कर दिया। इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब सुप्रीम कोर्ट का कोई पूर्व जज कोर्ट में इस तरह से पेश हुआ हो। हालांकि, बाद में वकीलों की दरख्वास्त पर जस्टिस गोगोई ने काटजू को चेतावनी देकर जाने दिया।

जजों की रिक्तयां पूरी कीं
जस्टिस गोगोई के कार्यकाल के दौरान दस सालों में यह पहला मौका आया था कि उच्चतम न्यायालय में जजों की एक भी रिक्ति नहीं रही। उनके कार्यकाल में कोर्ट में सभी 34 पदों पर जजों की नियुक्ति की गई।

सीजेआई का कार्यालय आरटीआई के दायरे में
मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की नेतृत्व वाली पीठ ने मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के दायरे में आने को लेकर फैसला सुनाया। इसमें कोर्ट ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय भी पब्लिक अथॉरिटी है। लिहाजा यहां भी आरटीआई के तहत जानकारी मांगी जा सकती है।

सबरीमाला मामला सात सदस्यीय बेंच को भेजा
रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली 5 न्यायमूर्तियों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई की। साथ ही मामले को सात सदस्यीय बड़ी बेंच को भेज दिया। इस दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश जारी रहेगा। जैसा कि कोर्ट 2018 में दिए अपने फैसले में कह चुका है।

सरकारी विज्ञापन में नेताओं की तस्वीर पर पाबंदी
सीजेआई रंजन गोगोई और पीसी घोष की पीठ ने सरकारी विज्ञापनों में नेताओं की तस्वीर लगाने पर पाबंदी लगा दी थी। कोर्ट के फैसले के बाद से सरकारी विज्ञापन में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश, संबंधित विभाग के केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, संबंधित विभाग के मंत्री के अलावा किसी भी नेता की सरकारी विज्ञापन पर तस्वीर प्रकाशित करने पर पाबंदी है।

7 भाषाओं में प्रकाशित होंगे सुप्रीम कोर्ट के फैसले
अंग्रेजी और हिंदी समेत 7 भाषाओं में कोर्ट के फैसलों को प्रकाशित करने का फैसला गोगोई ने ही लिया। इससे पहले तक शीर्ष अदालत के फैसले सिर्फ अंग्रेजी में ही प्रकाशित होते थे। अब फैसले अंग्रेजी और हिंदी समेत 7 भाषाओं में आएंगे। कई बार किसी मामले के पक्षकार अंग्रेजी भाषा को समझ नहीं पाते थे और उनकी मांग होती थी कि उनको उस भाषा में फैसले की कॉपी मुहैया कराई जाए, जिसको वो बोलते और पढ़ते हैं।

उत्तर-पूर्व से आये पहले सीजेआई
18 नवंबर, 1954 को जन्मे जस्टिस रंजन गोगोई 1978 में बार काउंसिल से जुड़े थे। उन्होंने शुरुआत गुवाहाटी हाईकोर्ट से की, 2001 में गुवाहाटी हाईकोर्ट में जज भी बने। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में बतौर जज 2010 में नियुक्त हुए। 2011 में वह पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने। 23 अप्रैल, 2012 को जस्टिस रंजन गोगोई उच्चतम न्यायालय के जज बने। 3 अक्टूबर, 2018 को देश के 46वें चीफ़ जस्टिस बने रंजन गोगोई इस पद तक पहुंचने वाले उत्तर पूर्व भारत के पहले व्यक्ति हैं। उनकी शुरुआती परवरिश डिब्रूगढ़ में, फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी के सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज से इतिहास में ग्रैजुएशन और लॉ फ़ैकल्टी से क़ानून की पढ़ाई हुई।

हमेशा से पारदर्शिता के पक्षधर
जस्टिस गोगोई को पारदर्शिता के पक्षधर जजों में गिना जाता है। उनकी संपत्ति, जेवर और नकदी से जुड़ी जानकारी बताती है कि वो कितना साधारण जीवन जीते हैं। उनके पास एक कार भी नहीं है। उनकी मां और असम की मशहूर समाजसेवी शांति गोगोई से उन्हें कुछ संपत्ति मिली है जो कि उनके पास मौजूद हैं। इसके साथ ही संपत्ति से जुड़ी जानकारी में कोई भी बदलाव आने के बाद वे उसे घोषित भी करते रहे हैं। चीफ़ जस्टिस के कार्यालय को आरटीआई क़ानून के दायरे में लाकर उन्होंने इसकी पुष्टि एक बार फिर से कर दी है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि न्यायमूर्तियों को इतिहास उनके फ़ैसलों की वजह से ही याद रखता है। देश की सबसे बड़ी अदालत के कोर्ट नंबर एक से आए फ़ैसले भी इसी कसौटी पर कसे जाएंगे। अयोध्या का फ़ैसला यकीनन हमेशा याद रखा जाएगा।

नई दिल्ली। पिछले साल जारी हुई किताब 'गुवाहाटी हाईकोर्ट, इतिहास और विरासत' में देश के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के बारे में एक ख़ास किस्से का ज़िक्र है। एक बार जस्टिस गोगोई के पिता केशब चंद्र गोगोई (असम के पूर्व मुख्यमंत्री) से उनके एक दोस्त ने पूछा कि क्या उनका बेटा भी उनकी ही तरह राजनीति में आएगा? इस सवाल पर जस्टिस गोगोई के पिता केशब चंद्र गोगोई ने कहा कि मेरा बेटा एक शानदार वकील है और उसके अंदर इस देश के मुख्य न्यायाधीश बनने की क्षमता है। भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई शुक्रवार को उच्चतम न्यायालय के कक्ष संख्या एक में अंतिम बार बैठे। हालांकि वह आधिकारिक रूप से रविवार को सेवानिवृत्त होंगे। इस मौके पर आपको सीजेआई रंजन गोगोई के उन फैसलों के बारे में बताएंगे जिनके लिए वह हमेशा याद रखे जाएंगे। 500 साल पुराने अयोध्या विवाद का निपटारा हो या असम में एनआरसी लागू करवाने, जस्टिस गोगोई ने अपनी कड़क छवि के मुताबिक काम किया। उन्होंने न तो खुद कोई प्रकरण टाला और न सरकार को लटकाने दिया। अयोध्या पर दिया ऐतिहासिक फ़ैसला न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने अयोध्या विवाद में तय किया कि दलीलों को लंबे समय तक खींचे जाने की इजाजत नहीं दी जाएगी। उन्होंने 161 साल से लंबित रामजन्म भूमि के विवाद का शानदार निपटारा किया। उन्होंने मंदिर के लिए भूमि जरूर हिन्दू पक्ष को दी बल्कि मुस्लिम पक्ष को भी मस्जिद के लिए पांच एकड़ जमीन देने का आदेश दिया। इस केस की सुनवाई उन्होंने बहुत ही संतुलित ढंग से की और जल्द निपटाने के लिए सुनवाइयां शनिवार को भी कीं। खास बात यह है कि इस मुद्दे का फैसला भी उन्होंने शनिवार 9 नवंबर को दिया। दूसरा फैसला राफेल लड़ाकू विमान की खरीद पर सरकार को क्लीन चिट देने का है। इसमें एक बार नहीं बल्कि दो बार उन्होंने सरकार को क्लीन चिट दी। जब जस्टिस काटजू को कोर्ट में किया तलब जस्टिस गोगोई के मुख्य न्यायाधीश बनने से पहले ही उनकी सख्त छवि उस वक्त उभरकर सामने आई थी, जब उन्होंने जस्टिस मार्कंडेय काटजू को अवमानना के एक मामले में कोर्ट में तलब कर लिया। जस्टिस काटजू ने केरल के सौम्या बलात्कार कांड में कोर्ट के फैसले की बेहद तल्ख लहजे में आलोचना की थी। जस्टिस गोगोई ने इसे अदालत की अवमानना की तरह लिया और काटजू को कोर्ट में पेश होने के लिए नोटिस जारी कर दिया। इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब सुप्रीम कोर्ट का कोई पूर्व जज कोर्ट में इस तरह से पेश हुआ हो। हालांकि, बाद में वकीलों की दरख्वास्त पर जस्टिस गोगोई ने काटजू को चेतावनी देकर जाने दिया। जजों की रिक्तयां पूरी कीं जस्टिस गोगोई के कार्यकाल के दौरान दस सालों में यह पहला मौका आया था कि उच्चतम न्यायालय में जजों की एक भी रिक्ति नहीं रही। उनके कार्यकाल में कोर्ट में सभी 34 पदों पर जजों की नियुक्ति की गई। सीजेआई का कार्यालय आरटीआई के दायरे में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की नेतृत्व वाली पीठ ने मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के दायरे में आने को लेकर फैसला सुनाया। इसमें कोर्ट ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय भी पब्लिक अथॉरिटी है। लिहाजा यहां भी आरटीआई के तहत जानकारी मांगी जा सकती है। सबरीमाला मामला सात सदस्यीय बेंच को भेजा रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली 5 न्यायमूर्तियों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई की। साथ ही मामले को सात सदस्यीय बड़ी बेंच को भेज दिया। इस दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश जारी रहेगा। जैसा कि कोर्ट 2018 में दिए अपने फैसले में कह चुका है। सरकारी विज्ञापन में नेताओं की तस्वीर पर पाबंदी सीजेआई रंजन गोगोई और पीसी घोष की पीठ ने सरकारी विज्ञापनों में नेताओं की तस्वीर लगाने पर पाबंदी लगा दी थी। कोर्ट के फैसले के बाद से सरकारी विज्ञापन में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश, संबंधित विभाग के केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, संबंधित विभाग के मंत्री के अलावा किसी भी नेता की सरकारी विज्ञापन पर तस्वीर प्रकाशित करने पर पाबंदी है। 7 भाषाओं में प्रकाशित होंगे सुप्रीम कोर्ट के फैसले अंग्रेजी और हिंदी समेत 7 भाषाओं में कोर्ट के फैसलों को प्रकाशित करने का फैसला गोगोई ने ही लिया। इससे पहले तक शीर्ष अदालत के फैसले सिर्फ अंग्रेजी में ही प्रकाशित होते थे। अब फैसले अंग्रेजी और हिंदी समेत 7 भाषाओं में आएंगे। कई बार किसी मामले के पक्षकार अंग्रेजी भाषा को समझ नहीं पाते थे और उनकी मांग होती थी कि उनको उस भाषा में फैसले की कॉपी मुहैया कराई जाए, जिसको वो बोलते और पढ़ते हैं। उत्तर-पूर्व से आये पहले सीजेआई 18 नवंबर, 1954 को जन्मे जस्टिस रंजन गोगोई 1978 में बार काउंसिल से जुड़े थे। उन्होंने शुरुआत गुवाहाटी हाईकोर्ट से की, 2001 में गुवाहाटी हाईकोर्ट में जज भी बने। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में बतौर जज 2010 में नियुक्त हुए। 2011 में वह पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने। 23 अप्रैल, 2012 को जस्टिस रंजन गोगोई उच्चतम न्यायालय के जज बने। 3 अक्टूबर, 2018 को देश के 46वें चीफ़ जस्टिस बने रंजन गोगोई इस पद तक पहुंचने वाले उत्तर पूर्व भारत के पहले व्यक्ति हैं। उनकी शुरुआती परवरिश डिब्रूगढ़ में, फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी के सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज से इतिहास में ग्रैजुएशन और लॉ फ़ैकल्टी से क़ानून की पढ़ाई हुई। हमेशा से पारदर्शिता के पक्षधर जस्टिस गोगोई को पारदर्शिता के पक्षधर जजों में गिना जाता है। उनकी संपत्ति, जेवर और नकदी से जुड़ी जानकारी बताती है कि वो कितना साधारण जीवन जीते हैं। उनके पास एक कार भी नहीं है। उनकी मां और असम की मशहूर समाजसेवी शांति गोगोई से उन्हें कुछ संपत्ति मिली है जो कि उनके पास मौजूद हैं। इसके साथ ही संपत्ति से जुड़ी जानकारी में कोई भी बदलाव आने के बाद वे उसे घोषित भी करते रहे हैं। चीफ़ जस्टिस के कार्यालय को आरटीआई क़ानून के दायरे में लाकर उन्होंने इसकी पुष्टि एक बार फिर से कर दी है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि न्यायमूर्तियों को इतिहास उनके फ़ैसलों की वजह से ही याद रखता है। देश की सबसे बड़ी अदालत के कोर्ट नंबर एक से आए फ़ैसले भी इसी कसौटी पर कसे जाएंगे। अयोध्या का फ़ैसला यकीनन हमेशा याद रखा जाएगा।