नवरात्र के छठे रुप देवी आदिशक्तिश्री दुर्गा कात्यायनी की आराधना

बिजनौर। शारदीय नवरात्र के छठे दिन आदिशक्तिश्री दुर्गा के छठे रूप देवी कात्यायनी की पूजा-अर्चना की गई। भक्तों ने मां की आराधना कर रोग, शोक, संताप व भय आदि के नष्ट होने की कामना की। मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ रही। सुरक्षा की दृष्टि से मंदिरों के बाहर भारी पुलिस बल तैनात रहा।

शारदीय नवरात्र के छठे दिन शुक्रवार को आदिशक्तिश्री दुर्गा के छठे रूप देवी कात्यायनी की पूजा।अर्चना की गई। शहर के प्राचीन महाकालिका मंदिर व चामुंडा धाम में तड़के पांच बजे से मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमडनी शुरू हो गई। श्रद्धालुओं ने मां दुर्गा के छठे रूप देवी कात्यायनी की आराधना की। श्रद्धालुओं ने प्रसाद चढ़ाकर रोग, शोक, संताप व भय आदि के नष्ट होने की कामना की। प्राचीन महाकालिका मंदिर में अतुल सर्राफ, अनिल विश्नोई व रमेश चन्द्र पुरोहित, जबकि चामुंडा धाम में नवीन अग्रवाल, भूपेन्द्र चैधरी, प्रमोद कुमार खन्ना, धर्मेन्द्र चैधरी, कैलाश चन्द्र सिंह व रामनिवास शर्मा आदि व्यवस्था बनाने में लगे रहे। श्रद्धालुओं ने लाइन में लगकर मां की पूजा की। दोनों ही मंदिरों में प्रसाद बेचने वालों के अलावा चाट-पकौड़ी व बच्चों के खिलौनों की दुकाने लगी रही। श्रद्धालुओं ने इन दुकानों से जमकर खरीददारी की। सुरक्षा की दृष्टि से मंदिरों के बाहर भारी पुलिस बल तैनात रहा।




शास्त्रों के अनुसार महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया था। इसलिए वे कात्यायनी कहलाती हैं। माता कात्यायनी की उपासना से आज्ञा चक्र जाग्रति की सिद्धियां साधक को स्वयंमेव प्राप्त हो जाती हैं। वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है तथा उसके रोग, शोक, संताप, भय आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं। इनके नाम से जुड़ी कथा है कि एक समय कत नाम के प्रसिद्ध ऋषि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए, उन्हीं के नाम से प्रसिद्ध कात्य गोत्र से, विश्वप्रसिद्ध ऋषि कात्यायन उत्पन्न हुए। उन्होंने भगवती पराम्बरा की उपासना करते हुए कठिन तपस्या की। उनकी इच्छा थी कि भगवती उनके घर में पुत्री के रूप में जन्म लें। माता ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। कुछ समय के पश्चात जब महिषासुर नामक राक्षस का अत्याचार बहुत बढ़ गया था, तब उसका विनाश करने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अपने अपने तेज और प्रताप का अंश देकर देवी को उत्पन्न किया था। महर्षि कात्यायन ने इनकी पूजा की इसी कारण से यह देवी कात्यायनी कहलाई।




अश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेने के बाद शुक्ल सप्तमी, अष्टमी और नवमी, तीन दिनों तक कात्यायन ऋषि ने इनकी पूजा की, पूजा ग्रहण कर दशमी को इस देवी ने महिषासुर का वध किया। इन का स्वरूप अत्यन्त ही दिव्य है। इनका वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला है। इनकी चार भुजाएं हैं, इनका दाहिना ऊपर का हाथ अभय मुद्रा में है, नीचे का हाथ वरदमुद्रा में है। बांये ऊपर वाले हाथ में तलवार और निचले हाथ में कमल का फूल है और इनका वाहन सिंह है। आज के दिन साधक का मन आज्ञाचक्र में स्थित होता है। योगसाधना में आज्ञाचक्र का महत्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित साधक कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व अर्पित कर देता है। पूर्ण आत्मदान करने से साधक को सहजरूप से मां के दर्शन हो जाते हैं। मां कात्यायनी की भक्ति से मनुष्य को अर्थ, कर्म, काम, मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

रामलीला में हुआ सूर्पनखा संवाद व खरदूषण वध लीला का मंचन

बिजनौर। श्रीरामलीला समिति के तत्वावधान में चल रही रामलीला में सूर्पनखा संवाद व खरदूषण वध लीला का मंचन किया गया। वन में रावण की बहन सूर्पनखा की नाक लक्ष्मण ने काट दी। इस पर रावण ने राम लक्ष्मण का वध करने को खरदूषण को भेजा। लक्ष्मण व खरदूषण के बीच युद्ध हुआ। जिसमें खरदूषण मारा गया। इस मौके पर समिति के अध्यक्ष अचल अग्रवाल, महामंत्री राहुल शर्मा, प्रदीप कौशिक, अमित अग्रवाल व वरुण अग्रवाल आदि मौजूद रहे।

बिजनौर से शहजाद अंसारी की रिपोर्ट