पड़ताल: किसान हित पर पहल कैसे हो…

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पड़ताल: किसान हित पर पहल कैसे हो...

भारत एक बहुत बड़ा देश है, सैद्धांतिक रूप से भी व लोकतांत्रिक रूप से भी। लगभग 130 करोड़ की आबादी वाले इस देश में छोटे बड़े तमाम मुद्दे हैं जैसे महंगाई , बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा, किसान आदि। इन सब में ‘किसान’ एक ऐसा इंसान है, जो कभी कड़ी धूप में तो कभी कड़कड़ाती ठंड में बिना किसी परवाह के खेतों में लगातार काम करता है ताकि 130 करोड़ आबादी का पेट भर सके, यह वही किसान है जो भविष्य में मिलने वाले बिना किसी पेंशन के बिना किसी ग्रेज्युटी के, बिना वेतन वृद्धि की आशा के निस्वार्थ भाव से दिन रात खेतों में अपना पसीना बहाता रहता है और प्रतिफल स्वरूप उसे बोनस में कभी सूखा तो कभी बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं, आग, पाशुहानी, बैंक कर्ज़, सूदखोरी इत्यादि प्राप्त होता है। जब कभी ये शब्द कम पड़ जाए तो कभी कभी आत्महत्या के रूप में भी उसे लाभांश प्राप्त होता है।

Kisan Hit Ki Pahal :

यह किसान 10 से 4 की ड्यूटी के बजाय 24 घंटे सातों दिन ड्यूटी करता है। यह वही किसान है जो बिना किसी का कौम पूछे ,बिना किसी जाति में जिज्ञासा दिखाए सबका पेट भरने को आतुर रहता है क्योंकि यह हमारे भारत का कर्मठ व योगी किसान है। हमारे इस कृषि प्रधान देश में हमने इतना तकनीकी विकास कर लिया है कि आज हम किसानों को ही भूल गए हैं। सरकार कोई भी हो सभी के शासनकाल में किसानों का उत्पीड़न हुआ है, किसी में कुछ कम तो किसी में कुछ ज्यादा। हमारी सरकारों को देश की कृषि अस्मिता बचाने, किसानों का पलायन रोकने, किसानों की आय वृद्धि के लिए एक सुधारात्मक नीति बनानी चाहिए। किसानों के लिए अलग से कृषि बजट का प्रावधान होना चाहिए।उनके लिए अलग कम ब्याज पर बैंक कर्ज़ का प्रावधान होना चाहिए।

लेकिन दुख इस बात का होता है कि जब कोई किसान या आम नागरिक किसी बैंक में अपनी निजी आवश्यकता हेतु कर्ज़ के लिए जाता है तो उसे तमाम प्रकार के अटपटे सवालों से मुखातिब होना पड़ता है, उसे ऐसी बैंकिंग प्रणाली का सामना करना पड़ता है जो साधारण व्यक्ति के लिए आसान नहीं है, अंत में उसे खाली हाथ लौटकर जाना पड़ता है ऐसी स्थिति में उसका सरकार व सरकारी तंत्र से धीरे धीरे विश्वास उठ जाता है।

इन बैंककर्मियों को कौन समझाए कि उनकी बैंकिंग अर्थव्यस्था भगोड़े कर्जदार पूंजीपतियों से नहीं बल्कि इन्हीं आम नागरिकों से चलता है। सरकार को यह बात समझ लेनी चाहिए कि उनके द्वारा दिए गए आम नागरिक सुविधाएं जैसे मुद्रा लोन, कृषि लोन, उद्यम लोन आदि का फायदा आसानी से आम नागरिक को नहीं मिलता। सरकार को इसका फायदा आम नागरिक तक पहुंचने के लिए अपनी योजनाओं को इतना सरल सुगम बनाना पड़ेगा जिससे कि अनावश्यक कागजी कार्यवाही का सामना नहीं करना पड़े। इन योजनाओं पर पूरी तरह पारदर्शिता चादर चढ़ाना चाहिए।

हालांकि वर्तमान सरकार के इस कदम की तारीफ करनी चाहिए कि उसने किसानों के कुछ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि करके कुछ हद तक राहत पहुंचाने का कार्य किया है,परन्तु किसानों के अन्य कृषि मदों जैसे खाद,यूरिया,बीज,आदि के दामों को संतुलित करके किसानों तक पहुंचाना होगा ताकि उन्हें इनका लाभ देकर कृषि के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।

महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार को कृषि उपज मंडी कानून में सुधारात्मक कदम उठाने होंगे ताकि किसानों का व्यापारियों, दलालों द्वारा की जाने वाली जमाखोरी, मुनाफा खोरी तथा उत्पीड़न से छुटकारा मिल सके।

देखा जाए तो किसान देश की अर्थव्यस्था का केंद्र बिंदु है, इसलिए इन्हें राजनैतिक प्रलोभन का शिकार होने से जितना बचाया जा सके उतना अच्छा है। कुछ स्वार्थी राजनेताओं को सोचना चाहिए कि किसान सिर्फ वोट बैंक हिस्सा नहीं है बल्कि देश का निर्माता भी है। उन्हें इस वोट बैंक की गन्दी राजनीती से दूर रहना होगा।याद रहे किसान हरियाली द्योतक है किसान हरा भरा होगा तभी देश हरा भरा होगा।

रिपोर्ट- रोशन मिश्रा

भारत एक बहुत बड़ा देश है, सैद्धांतिक रूप से भी व लोकतांत्रिक रूप से भी। लगभग 130 करोड़ की आबादी वाले इस देश में छोटे बड़े तमाम मुद्दे हैं जैसे महंगाई , बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा, किसान आदि। इन सब में 'किसान' एक ऐसा इंसान है, जो कभी कड़ी धूप में तो कभी कड़कड़ाती ठंड में बिना किसी परवाह के खेतों में लगातार काम करता है ताकि 130 करोड़ आबादी का पेट भर सके, यह वही किसान है जो भविष्य में मिलने वाले बिना किसी पेंशन के बिना किसी ग्रेज्युटी के, बिना वेतन वृद्धि की आशा के निस्वार्थ भाव से दिन रात खेतों में अपना पसीना बहाता रहता है और प्रतिफल स्वरूप उसे बोनस में कभी सूखा तो कभी बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं, आग, पाशुहानी, बैंक कर्ज़, सूदखोरी इत्यादि प्राप्त होता है। जब कभी ये शब्द कम पड़ जाए तो कभी कभी आत्महत्या के रूप में भी उसे लाभांश प्राप्त होता है।

यह किसान 10 से 4 की ड्यूटी के बजाय 24 घंटे सातों दिन ड्यूटी करता है। यह वही किसान है जो बिना किसी का कौम पूछे ,बिना किसी जाति में जिज्ञासा दिखाए सबका पेट भरने को आतुर रहता है क्योंकि यह हमारे भारत का कर्मठ व योगी किसान है। हमारे इस कृषि प्रधान देश में हमने इतना तकनीकी विकास कर लिया है कि आज हम किसानों को ही भूल गए हैं। सरकार कोई भी हो सभी के शासनकाल में किसानों का उत्पीड़न हुआ है, किसी में कुछ कम तो किसी में कुछ ज्यादा। हमारी सरकारों को देश की कृषि अस्मिता बचाने, किसानों का पलायन रोकने, किसानों की आय वृद्धि के लिए एक सुधारात्मक नीति बनानी चाहिए। किसानों के लिए अलग से कृषि बजट का प्रावधान होना चाहिए।उनके लिए अलग कम ब्याज पर बैंक कर्ज़ का प्रावधान होना चाहिए।

लेकिन दुख इस बात का होता है कि जब कोई किसान या आम नागरिक किसी बैंक में अपनी निजी आवश्यकता हेतु कर्ज़ के लिए जाता है तो उसे तमाम प्रकार के अटपटे सवालों से मुखातिब होना पड़ता है, उसे ऐसी बैंकिंग प्रणाली का सामना करना पड़ता है जो साधारण व्यक्ति के लिए आसान नहीं है, अंत में उसे खाली हाथ लौटकर जाना पड़ता है ऐसी स्थिति में उसका सरकार व सरकारी तंत्र से धीरे धीरे विश्वास उठ जाता है।

इन बैंककर्मियों को कौन समझाए कि उनकी बैंकिंग अर्थव्यस्था भगोड़े कर्जदार पूंजीपतियों से नहीं बल्कि इन्हीं आम नागरिकों से चलता है। सरकार को यह बात समझ लेनी चाहिए कि उनके द्वारा दिए गए आम नागरिक सुविधाएं जैसे मुद्रा लोन, कृषि लोन, उद्यम लोन आदि का फायदा आसानी से आम नागरिक को नहीं मिलता। सरकार को इसका फायदा आम नागरिक तक पहुंचने के लिए अपनी योजनाओं को इतना सरल सुगम बनाना पड़ेगा जिससे कि अनावश्यक कागजी कार्यवाही का सामना नहीं करना पड़े। इन योजनाओं पर पूरी तरह पारदर्शिता चादर चढ़ाना चाहिए।

हालांकि वर्तमान सरकार के इस कदम की तारीफ करनी चाहिए कि उसने किसानों के कुछ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि करके कुछ हद तक राहत पहुंचाने का कार्य किया है,परन्तु किसानों के अन्य कृषि मदों जैसे खाद,यूरिया,बीज,आदि के दामों को संतुलित करके किसानों तक पहुंचाना होगा ताकि उन्हें इनका लाभ देकर कृषि के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।

महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार को कृषि उपज मंडी कानून में सुधारात्मक कदम उठाने होंगे ताकि किसानों का व्यापारियों, दलालों द्वारा की जाने वाली जमाखोरी, मुनाफा खोरी तथा उत्पीड़न से छुटकारा मिल सके।

देखा जाए तो किसान देश की अर्थव्यस्था का केंद्र बिंदु है, इसलिए इन्हें राजनैतिक प्रलोभन का शिकार होने से जितना बचाया जा सके उतना अच्छा है। कुछ स्वार्थी राजनेताओं को सोचना चाहिए कि किसान सिर्फ वोट बैंक हिस्सा नहीं है बल्कि देश का निर्माता भी है। उन्हें इस वोट बैंक की गन्दी राजनीती से दूर रहना होगा।याद रहे किसान हरियाली द्योतक है किसान हरा भरा होगा तभी देश हरा भरा होगा।

रिपोर्ट- रोशन मिश्रा