भौम प्रदोष व्रत: रुद्रावतार हनुमार जी की पूजा का महत्व और पूजा विधि

भौम प्रदोष व्रत: रुद्रावतार हनुमार जी की पूजा का महत्व और पूजा विधि
भौम प्रदोष व्रत: रुद्रावतार हनुमार जी की पूजा का महत्व और पूजा विधि

लखनऊ। हिन्दू धर्म के अनुसार, प्रदोष व्रत कलियुग में अति मंगलकारी और शिव कृपा प्रदान करनेवाला होता है। माह की त्रयोदशी तिथि में सायं काल को प्रदोष काल कहा जाता है। मान्यता है कि प्रदोष के समय महादेव कैलाश पर्वत के रजत भवन में इस समय नृत्य करते हैं और देवता उनके गुणों का स्तवन करते हैं। जो भी लोग अपना कल्याण चाहते हों यह व्रत रख सकते हैं। प्रदोष व्रत को करने से हर प्रकार का दोष मिट जाता है।इस व्रत के महात्म्य को गंगा के तट पर किसी समय वेदों के ज्ञाता और भगवान केभक्त सूतजी ने शौनकादि ऋषियों को सुनाया था। सूतजी ने कहा है कि कलियुग में जब मनुष्य धर्म के आचरण से हटकर अधर्म की राह पर जा रहा होगाहर तरफ अन्याय और अनाचार का बोलबाला होगा। मानव अपने कर्तव्य से विमुख होकर नीच कर्म में संलग्न होगा उस समय प्रदोष व्रत ऐसा व्रत होगा जो मानव को शिव की कृपा का पात्र बनाएगा और नीच गति से मुक्त होकर मनुष्य उत्तम लोकको प्राप्त होगा।

Know About Benefits And Importance Of Bhaum Pradosh Vrat :

सूत जी ने शौनकादि ऋषियों को यह भी कहा कि प्रदोष व्रत से पुण्य से कलियुग में मनुष्य के सभी प्रकार के कष्ट और पाप नष्ट हो जाएंगे। यह व्रत अति कल्याणकारी है इस व्रत के प्रभाव से मनुष्यको अभीष्ट की प्राप्ति होगी। इस व्रत में अलग अलग दिन के प्रदोष व्रत सेक्या लाभ मिलता है यह भी सूत जी ने बताया। सूत जी ने शौनकादि ऋषियों कोबताया कि इस व्रत के महात्मय को सर्वप्रथम भगवान शंकर ने माता सती कोसुनाया था। मुझे यही कथा और महात्मय महर्षि वेदव्यास जी ने सुनाया और यह उत्तम व्रत महात्म्य मैने आपको सुनाया है। प्रदोष व्रत विधानसूत जी ने कहा है प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी के व्रत को प्रदोष व्रत कहते हैं। सूर्यास्त के पश्चात रात्रि के आने से पूर्व का समय प्रदोष काल कहलाता है। इस व्रत में महादेव भोले शंकरकी पूजा की जाती है। इस व्रत में व्रती को निर्जल रहकर व्रत रखना होता है। प्रात: काल स्नान करके भगवान शिव की बेल पत्र, गंगाजल अक्षत धूप दीप सहित पूजा करें। संध्या काल में पुन: स्नान करके इसी प्रकार से शिव जी की पूजा करना चाहिए। इस प्रकार प्रदोष व्रत करने से व्रती को पुण्य मिलता है।

जब मंगलवार के दिन प्रदोष तिथि का योग बनता है, तब भौम प्रदोष व्रत रखा जाता है, दिनांक 04.12.2018 को यह शुभ योग पड़ रहा है। मंगल ग्रह का ही एक अन्य नाम भौम है। यह व्रत हर तरह के कर्ज से छुटकारा दिलाता है। हमें अपने दैनिक और व्यावहारिक जीवन में कई बार अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए धन रुपयों-पैसों का कर्ज लेना आवश्यक हो जाता है। तब आदमी कर्ज/ऋण तो ले लेता है, लेकिन उसे चुकाने में उसे काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। ऐसे समय में कर्ज संबंधी परेशानी दूर करने के लिए भौम प्रदोष व्रत लाभदायी सिद्ध होता है। भौम प्रदोष व्रत की कथा इस प्रकार है की एक वृद्ध महिला भगवान हनुमानजी की भक्ता थी। एक दिन हनुमानजी ने उसकी श्रद्धा की परीक्षा लेने की सोची. हनुमानजी ने साधु का वेश बनाया और वृद्धा के घर गए। हनुमान जी ने कहा- ‘कोई हमारी इच्छा पूरी करे’। वृद्धा घर से बाहर आई और बोली- क्याक बात है महाराज। हनुमान बोले- मैं भूखा हूं, मुझे भोजन खिला दे। ऐसा कर सबसे पहले थोड़ी जमीन को लीप दे। वृद्धा परेशान हो गई और बोली-लीपने के बजाए आप कुछ और कहिए, मैं आपकी इच्छास को जरूर पूरा करूंगी. साधु ने वृद्धा से तीन बार प्रतिज्ञा ली और कहा- अपने बेटे को बुलाओं। मैं उसकी पीठ पर आग जलाकर और भोजन बनाऊंगा। अब वृद्धा बहुत घबरा गई। अपने पुत्र को साधु को सौंप दिया। साधु ने वृद्धा से उसके बेटे की पीठ पर आग जलवाई। आग जलाकर वृद्धा अपने घर वापिस चली गई। साधु ने भोजन बनाया और वृद्धा को बुलाया – अपने बेटे को बुलाओ, ताकि वो भी खाना खा सके। वृद्धा ने बेटे को आवाज लगाई- पुत्र को जीवित देख वृद्धा को बहुत हैरानी हुई और वह साधु के पैरों में गिरकर रोने लगी। इसके बाद हनुमानजी ने उसे दर्शनऔर आशीर्वाद दिया।

भौम (मंगल) प्रदोष व्रत के दिन व्रती को प्रात:काल उठकर नित्य क्रम से निवृत हो स्नान कर शिव जी का पूजन करना चाहिये। पूरे दिन मन ही मन “ऊँ नम: शिवाय ” का जप करें। पूरे दिन निराहार रहें। त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में यानी सुर्यास्त से तीन घड़ी पूर्व, शिव जी का पूजन करना चाहिये। भौम प्रदोष व्रत की पूजा शाम 4:30 बजे से लेकर शाम 7:00 बजे के बीच की जाती है।

व्रती को चाहिये की शाम को दुबारा स्नान कर स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण कर लें। पूजा स्थल अथवा पूजा गृह को शुद्ध कर लें। यदि व्रती चाहे तो शिव मंदिर में भी जा कर पूजा कर सकते हैं। पांच रंगों से रंगोली बनाकर मंडप तैयार करें। पूजन की सभी सामग्री एकत्रित कर लें। कलश अथवा लोटे में शुद्ध जल भर लें। कुश के आसन पर बैठ कर शिव जी की पूजा विधि-विधान से करें। “ऊँ नम: शिवाय ” कहते हुए शिव जी को जल अर्पित करें। इसके बाद दोनों हाथ जो‌ड़कर शिव जी का ध्यान करें।

द्वारा:पंडित प्रखर गोस्वामी, एस्ट्रो गुरुकुल क्लासेज
संपर्क करे व्हाट्सएप्प द्वारा +91 7881106274

लखनऊ। हिन्दू धर्म के अनुसार, प्रदोष व्रत कलियुग में अति मंगलकारी और शिव कृपा प्रदान करनेवाला होता है। माह की त्रयोदशी तिथि में सायं काल को प्रदोष काल कहा जाता है। मान्यता है कि प्रदोष के समय महादेव कैलाश पर्वत के रजत भवन में इस समय नृत्य करते हैं और देवता उनके गुणों का स्तवन करते हैं। जो भी लोग अपना कल्याण चाहते हों यह व्रत रख सकते हैं। प्रदोष व्रत को करने से हर प्रकार का दोष मिट जाता है।इस व्रत के महात्म्य को गंगा के तट पर किसी समय वेदों के ज्ञाता और भगवान केभक्त सूतजी ने शौनकादि ऋषियों को सुनाया था। सूतजी ने कहा है कि कलियुग में जब मनुष्य धर्म के आचरण से हटकर अधर्म की राह पर जा रहा होगाहर तरफ अन्याय और अनाचार का बोलबाला होगा। मानव अपने कर्तव्य से विमुख होकर नीच कर्म में संलग्न होगा उस समय प्रदोष व्रत ऐसा व्रत होगा जो मानव को शिव की कृपा का पात्र बनाएगा और नीच गति से मुक्त होकर मनुष्य उत्तम लोकको प्राप्त होगा।सूत जी ने शौनकादि ऋषियों को यह भी कहा कि प्रदोष व्रत से पुण्य से कलियुग में मनुष्य के सभी प्रकार के कष्ट और पाप नष्ट हो जाएंगे। यह व्रत अति कल्याणकारी है इस व्रत के प्रभाव से मनुष्यको अभीष्ट की प्राप्ति होगी। इस व्रत में अलग अलग दिन के प्रदोष व्रत सेक्या लाभ मिलता है यह भी सूत जी ने बताया। सूत जी ने शौनकादि ऋषियों कोबताया कि इस व्रत के महात्मय को सर्वप्रथम भगवान शंकर ने माता सती कोसुनाया था। मुझे यही कथा और महात्मय महर्षि वेदव्यास जी ने सुनाया और यह उत्तम व्रत महात्म्य मैने आपको सुनाया है। प्रदोष व्रत विधानसूत जी ने कहा है प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी के व्रत को प्रदोष व्रत कहते हैं। सूर्यास्त के पश्चात रात्रि के आने से पूर्व का समय प्रदोष काल कहलाता है। इस व्रत में महादेव भोले शंकरकी पूजा की जाती है। इस व्रत में व्रती को निर्जल रहकर व्रत रखना होता है। प्रात: काल स्नान करके भगवान शिव की बेल पत्र, गंगाजल अक्षत धूप दीप सहित पूजा करें। संध्या काल में पुन: स्नान करके इसी प्रकार से शिव जी की पूजा करना चाहिए। इस प्रकार प्रदोष व्रत करने से व्रती को पुण्य मिलता है।जब मंगलवार के दिन प्रदोष तिथि का योग बनता है, तब भौम प्रदोष व्रत रखा जाता है, दिनांक 04.12.2018 को यह शुभ योग पड़ रहा है। मंगल ग्रह का ही एक अन्य नाम भौम है। यह व्रत हर तरह के कर्ज से छुटकारा दिलाता है। हमें अपने दैनिक और व्यावहारिक जीवन में कई बार अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए धन रुपयों-पैसों का कर्ज लेना आवश्यक हो जाता है। तब आदमी कर्ज/ऋण तो ले लेता है, लेकिन उसे चुकाने में उसे काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। ऐसे समय में कर्ज संबंधी परेशानी दूर करने के लिए भौम प्रदोष व्रत लाभदायी सिद्ध होता है। भौम प्रदोष व्रत की कथा इस प्रकार है की एक वृद्ध महिला भगवान हनुमानजी की भक्ता थी। एक दिन हनुमानजी ने उसकी श्रद्धा की परीक्षा लेने की सोची. हनुमानजी ने साधु का वेश बनाया और वृद्धा के घर गए। हनुमान जी ने कहा- ‘कोई हमारी इच्छा पूरी करे’। वृद्धा घर से बाहर आई और बोली- क्याक बात है महाराज। हनुमान बोले- मैं भूखा हूं, मुझे भोजन खिला दे। ऐसा कर सबसे पहले थोड़ी जमीन को लीप दे। वृद्धा परेशान हो गई और बोली-लीपने के बजाए आप कुछ और कहिए, मैं आपकी इच्छास को जरूर पूरा करूंगी. साधु ने वृद्धा से तीन बार प्रतिज्ञा ली और कहा- अपने बेटे को बुलाओं। मैं उसकी पीठ पर आग जलाकर और भोजन बनाऊंगा। अब वृद्धा बहुत घबरा गई। अपने पुत्र को साधु को सौंप दिया। साधु ने वृद्धा से उसके बेटे की पीठ पर आग जलवाई। आग जलाकर वृद्धा अपने घर वापिस चली गई। साधु ने भोजन बनाया और वृद्धा को बुलाया – अपने बेटे को बुलाओ, ताकि वो भी खाना खा सके। वृद्धा ने बेटे को आवाज लगाई- पुत्र को जीवित देख वृद्धा को बहुत हैरानी हुई और वह साधु के पैरों में गिरकर रोने लगी। इसके बाद हनुमानजी ने उसे दर्शनऔर आशीर्वाद दिया।भौम (मंगल) प्रदोष व्रत के दिन व्रती को प्रात:काल उठकर नित्य क्रम से निवृत हो स्नान कर शिव जी का पूजन करना चाहिये। पूरे दिन मन ही मन “ऊँ नम: शिवाय ” का जप करें। पूरे दिन निराहार रहें। त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में यानी सुर्यास्त से तीन घड़ी पूर्व, शिव जी का पूजन करना चाहिये। भौम प्रदोष व्रत की पूजा शाम 4:30 बजे से लेकर शाम 7:00 बजे के बीच की जाती है।व्रती को चाहिये की शाम को दुबारा स्नान कर स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण कर लें। पूजा स्थल अथवा पूजा गृह को शुद्ध कर लें। यदि व्रती चाहे तो शिव मंदिर में भी जा कर पूजा कर सकते हैं। पांच रंगों से रंगोली बनाकर मंडप तैयार करें। पूजन की सभी सामग्री एकत्रित कर लें। कलश अथवा लोटे में शुद्ध जल भर लें। कुश के आसन पर बैठ कर शिव जी की पूजा विधि-विधान से करें। “ऊँ नम: शिवाय ” कहते हुए शिव जी को जल अर्पित करें। इसके बाद दोनों हाथ जो‌ड़कर शिव जी का ध्यान करें।द्वारा:पंडित प्रखर गोस्वामी, एस्ट्रो गुरुकुल क्लासेज संपर्क करे व्हाट्सएप्प द्वारा +91 7881106274