सीएम बनते ही महाराष्ट्र से हटाया गया राष्ट्रपति शासन, जाने कब और क्यों लगाई जाती है यह धारा

सीएम बनते ही महाराष्ट्र से हटाया गया राष्ट्रपति शासन, जाने कब और क्यों लगाई जाती है यह धारा
सीएम बनते ही महाराष्ट्र से हटाया गया राष्ट्रपति शासन, जाने कब और क्यों लगाई जाती है यह धारा

मुंबई। महाराष्ट्र में सत्ता का संघर्ष अब समाप्त हो चुका है और देवेन्द्र फडणवीस एक बार फिर महाराष्ट्र के सीएम बन चुके हैं। महाराष्ट्र का सत्ता संघर्ष आखिरकार राष्ट्रपति शासन पर जाकर रुक गया था जोकि सीएम शपथ ग्रहण के बाद अब महाराष्ट्र से राष्ट्रपति शासन हटा दिया गया है। आइए जानते हैं कब और क्यों लगाया जाता है राष्ट्रपति शासन और इससे जुड़ी कुछ खास बातों के बारे में….

Know All About President Rule :

राष्ट्रपति शासन की संवैधानिक व्यवस्था

  • संविधान के अनुच्छेद 356 में राष्ट्रपति शासन से जुड़े प्रावधान दिए गए हैं।
  • आर्टिकल 356 के मुताबिक राष्ट्रपति किसी भी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा सकते हैं यदि वे इस बात से संतुष्ट हों कि राज्य सरकार संविधान के विभिन्न प्रावधानों के मुताबिक काम नहीं कर रही है।
  • यह जरूरी नहीं है कि राष्ट्रपति उस राज्य के राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर ही यह फैसला लें।
  • यह अनुच्छेद एक साधन है जो केंद्र सरकार को किसी नागरिक अशांति जैसे कि दंगे जिनसे निपटने में राज्य सरकार विफल रही हो की दशा में किसी राज्य सरकार पर अपना अधिकार स्थापित करने में सक्षम बनाता है।
  • संविधान में इस बात का भी उल्लेख है कि राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के दो महीनों के अंदर संसद के दोनों सदनों द्वारा इसका अनुमोदन किया जाना जरूरी है।
  • अगर इस बीच लोकसभा भंग हो जाती है तो इसका राज्यसभा द्वारा अनुमोदन किए जाने के बाद नई लोकसभा द्वारा अपने गठन के एक महीने के भीतर अनुमोदन किया जाना जरूरी है।

राष्ट्रपति शासन की अवधि

यदि संसद के दोनों सदनों द्वारा राष्ट्रपति शासन का अनुमोदन कर दिया जाता है तो राष्ट्रपति शासन 6 माह तक चलता रहेगा. इस प्रकार 6-6 माह कर इसे 3 वर्ष तक आगे बढ़ाया जा सकता है.

इस धारा को क्यों कहते हैं राष्ट्रपति शासन

इस धारा को राष्ट्रपति शासन इसलिए कहा जाता है क्योंकि, इसके द्वारा राज्य का नियंत्रण एक निर्वाचित मुख्यमंत्री की जगह सीधे भारत के राष्ट्रपति के अधीन आ जाता है। हालांकि प्रशासनिक दृष्टि से राज्य के राज्यपाल को केंद्रीय सरकार द्वारा कार्यकारी अधिकार प्रदान किए जाते हैं। प्रशासन में मदद करने के लिए राज्यपाल सलाहकारों की नियुक्ति करता है, जो आम तौर पर सेवानिवृत्त सिविल सेवक होते हैं।

होते हैं ये बदलाव

  • राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रीपरिषद् को भंग कर देते हैं।
  • राष्ट्रपति, राज्य सरकार के कार्य अपने हाथ में ले लेते हैं और उसे राज्यपाल और अन्य कार्यकारी अधिकारियों की शक्तियां प्राप्त हो जाती हैं।
  • राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति के नाम पर राज्य सचिव की सहायता से अथवा राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किसी सलाहकार की सहायता से राज्य का शासन चलाता है। यही कारण है कि अनुच्छेद 356 के अंतर्गत की गई घोषणा को राष्ट्रपति शासन कहा जाता है।
  • राष्ट्रपति, घोषणा कर सकता है कि राज्य विधायिका की शक्तियों का प्रयोग संसद करेगी।
  • संसद ही राज्य के विधेयक और बजट प्रस्ताव को पारित करती है।
  • संसद को यह अधिकार है कि वह राज्य के लिए कानून बनाने की शक्ति राष्ट्रपति अथवा उसके किसी नामित अधिकारी को दे सकती है।
मुंबई। महाराष्ट्र में सत्ता का संघर्ष अब समाप्त हो चुका है और देवेन्द्र फडणवीस एक बार फिर महाराष्ट्र के सीएम बन चुके हैं। महाराष्ट्र का सत्ता संघर्ष आखिरकार राष्ट्रपति शासन पर जाकर रुक गया था जोकि सीएम शपथ ग्रहण के बाद अब महाराष्ट्र से राष्ट्रपति शासन हटा दिया गया है। आइए जानते हैं कब और क्यों लगाया जाता है राष्ट्रपति शासन और इससे जुड़ी कुछ खास बातों के बारे में.... राष्ट्रपति शासन की संवैधानिक व्यवस्था
  • संविधान के अनुच्छेद 356 में राष्ट्रपति शासन से जुड़े प्रावधान दिए गए हैं।
  • आर्टिकल 356 के मुताबिक राष्ट्रपति किसी भी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा सकते हैं यदि वे इस बात से संतुष्ट हों कि राज्य सरकार संविधान के विभिन्न प्रावधानों के मुताबिक काम नहीं कर रही है।
  • यह जरूरी नहीं है कि राष्ट्रपति उस राज्य के राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर ही यह फैसला लें।
  • यह अनुच्छेद एक साधन है जो केंद्र सरकार को किसी नागरिक अशांति जैसे कि दंगे जिनसे निपटने में राज्य सरकार विफल रही हो की दशा में किसी राज्य सरकार पर अपना अधिकार स्थापित करने में सक्षम बनाता है।
  • संविधान में इस बात का भी उल्लेख है कि राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के दो महीनों के अंदर संसद के दोनों सदनों द्वारा इसका अनुमोदन किया जाना जरूरी है।
  • अगर इस बीच लोकसभा भंग हो जाती है तो इसका राज्यसभा द्वारा अनुमोदन किए जाने के बाद नई लोकसभा द्वारा अपने गठन के एक महीने के भीतर अनुमोदन किया जाना जरूरी है।
राष्ट्रपति शासन की अवधि यदि संसद के दोनों सदनों द्वारा राष्ट्रपति शासन का अनुमोदन कर दिया जाता है तो राष्ट्रपति शासन 6 माह तक चलता रहेगा. इस प्रकार 6-6 माह कर इसे 3 वर्ष तक आगे बढ़ाया जा सकता है. इस धारा को क्यों कहते हैं राष्ट्रपति शासन इस धारा को राष्ट्रपति शासन इसलिए कहा जाता है क्योंकि, इसके द्वारा राज्य का नियंत्रण एक निर्वाचित मुख्यमंत्री की जगह सीधे भारत के राष्ट्रपति के अधीन आ जाता है। हालांकि प्रशासनिक दृष्टि से राज्य के राज्यपाल को केंद्रीय सरकार द्वारा कार्यकारी अधिकार प्रदान किए जाते हैं। प्रशासन में मदद करने के लिए राज्यपाल सलाहकारों की नियुक्ति करता है, जो आम तौर पर सेवानिवृत्त सिविल सेवक होते हैं। होते हैं ये बदलाव
  • राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रीपरिषद् को भंग कर देते हैं।
  • राष्ट्रपति, राज्य सरकार के कार्य अपने हाथ में ले लेते हैं और उसे राज्यपाल और अन्य कार्यकारी अधिकारियों की शक्तियां प्राप्त हो जाती हैं।
  • राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति के नाम पर राज्य सचिव की सहायता से अथवा राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किसी सलाहकार की सहायता से राज्य का शासन चलाता है। यही कारण है कि अनुच्छेद 356 के अंतर्गत की गई घोषणा को राष्ट्रपति शासन कहा जाता है।
  • राष्ट्रपति, घोषणा कर सकता है कि राज्य विधायिका की शक्तियों का प्रयोग संसद करेगी।
  • संसद ही राज्य के विधेयक और बजट प्रस्ताव को पारित करती है।
  • संसद को यह अधिकार है कि वह राज्य के लिए कानून बनाने की शक्ति राष्ट्रपति अथवा उसके किसी नामित अधिकारी को दे सकती है।