नई दिल्ली। कर्नाटक में अपनी सरकार को बचाने में जुटी कांग्रेस धीरे धीरे अपनी संगठन की राजनीति को साधने में लग गई है। जैसा कि सभी जानते हैं कि कर्नाटक में कांग्रेस सिद्धरमैया के भरोसे है और वहां पार्टी के शीर्ष नेतृत्व यानी राहुल गांधी के पास करने के लिए बहुत कुछ है भी नहीं। ऐसे में उन्होंने भविष्य की तैयारियों पर ध्यान देना शुरू कर दिया है। कर्नाटक के बाद राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ ऐसे राज्य होंगे जिनके विधानसभा चुनाव होने हैं। इन राज्यों में राजस्थान में कांग्रेस खुद को मजबूत होता देख रही है। पार्टी हाईकमान तक इस बात की जानकारी पहले से है कि राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच गुटबाजी का माहौल बना हुआ है। दोनों ही नेता राहुल गांधी के विश्वासपात्र है और करीबी हैं। इस गुटबाजी को खत्म करने के लिए ही राहुल गांधी ने संगठन में राष्ट्रीय अध्यक्ष के बाद सबसे बड़ी कुर्सी यानी संगठन के राष्ट्रीय महासचिव के पद की जिम्मेदारी अशोक गहलोत को सौंप दी है।

सूत्रों की माने तो अशोक गहलोत को जब राहुल गांधी के इस फैसले की जानकारी मिली तो वह आश्चर्यचकित रह गए। शायद उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि इसे वह प्रमोशन के रूप में देखें या फिर डिमोशन माने। उनके लिए स्थिति ही ऐसी बन गई है, क्योंकि वह दोबारा मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे थे। जिसके लिए वह गुजरात चुनाव में अपने प्रदर्शन के बल पर अपने नंबर भी बढ़ाते नजर आए।

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सचिन पायलट से मात खा गए गहलोत —

अशोक गहलोत ने जिन परिस्थितियों में अपनी सत्ता खोई थी, उसमें बहुत बड़ी भूमिका उनके सहयोगियों के कारनामों की थी। जिनकी वजह से उनकी सरकार को राष्ट्रीय स्तर पर बदनामी झेलनी पड़ी थी। हालांकि उनकी व्यक्तिगत छवि पर उसका कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा था, लेकिन इसके बावजूद वह अपनी सत्ता बचाने में नाकाम रहे थे।

2013 के चुनावों में वसुंधरा राजे से मिली हार ने और 2014 के आम चुनावों में मोदी लहर के आगे फीके नजर आए गहलोत को बैकफुट पर धकेल दिया था। जिस वजह से पार्टी हाईकमान के करीबी रहे युवा नेता सचिन पायलट के लिए सूबे की राजनीति में एक जगह बन गई। अपने पिता से मिली सियासी विरासत के दम पर सचिन पायलट ने दो सालों तक पार्टी के संगठन को मजबूत करने का काम किया। जो कांग्रेस सत्ता में रह कर सड़क पर उतरना भूल गई थी, उसे वसुंधरा राजे सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ वह एक बार फिर सड़क पर ले आए।

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सचिन पायलट की कार्यशैली और युवा जोश ने एक कांग्रेस में एक नई जान फूंक दी। ​हाल ही में हुए उप चुनावों में जिस तरह से कांग्रेस ने जीत दर्ज करवाई, उसने सचिन पायलट के कद को और बढ़ा दिया। अब वह मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार के रूप में देखे जा रहे हैं। कांग्रेस के युवा कार्यकर्ताओं में उनकी स्वीकरोक्ति है, तो वहीं सीनियर नेताओं को भी उनमें पार्टी का ​भविष्य नजर आ रहा है।

वहीं अशोक गहलोत की बात की जाए तो मुख्यमंत्री के रूप में उनकी दावेदारी को भी किसी स्तर नजरंदाज नहीं किया जा सकता। वह भी पार्टी हाईकमान के करीबी हैं और दिग्विजय सिंह के मध्यप्रदेश लौटने के बाद से राहुल गांधी के मुख्य रणनीतिकार के रूप में देखे जा रहे हैं। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि हाईकमान उनके अनुभव को तवज्जो देगा।

एकाएक संगठन में बड़ी जिम्मेदारी देकर राहुल गांधी ने गहलोत की उम्मीदों को तगड़ा झटका भले ही दिया हो, लेकिन इसे सचिन पायलट की जीत के रूप में नहीं देखना चाहिए। राहुल गांधी भले ही सोच रहे हों कि उनके इस फैसले से राजस्थान में कांग्रेस की अंदरूनी गुजबाजी खत्म हो जाएगी, लेकिन ऐसा सोचना जल्दबाजी होगा। शायद वह भूल रहे हैं कि उनकी पार्टी जितनी पुरानी है, राजनीति के उतने ही बड़े दिग्गज नेताओं की भीड़ उसमें मौजूद है। अशोक गहलोत के समर्थक ऐसे ही कांग्रेसी नेता राजस्थान में मौजूद हैं, जो आसानी से सचिन पायलट जैसे युवा के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होंगे। जिनके विरोध को चुनावी माहौल में पार्टी हाईकमान आसानी से नजरंदाज नहीं कर पाएगा।

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