गरीबों को ऐसे ठगती हैं सरकारें, मकान दिया लेकिन शौचालय नहीं दिया

शौचालय, लखनऊ, कांशीराम आवास योजना
गरीबों को ऐसे ठगती हैं सरकारें, मकान दिया लेकिन शौचालय नहीं दिया

लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से सात साल पहले राजधानी लखनऊ के फैजुल्लागंज वार्ड के रहीमनगर डुडौली में डूडा आवास योजना के तहत बनी कांशीराम आवास योजना में गजब की धांधली की गई। करोड़ों की लागत से बन कर तैयार हुए आवासों के लाभार्थी ऐसे जरूरतमंद थे, जिनके लिए लखनऊ जैसे शहर में अपनी छत होना किसी सपने जैसा था, जिसे सरकार ने पूरा कर दिया। इस योजना के लाभार्थियों में कोई दिहाड़ी मजदूर है तो कोई रिक्शा चलाकर अपने परिवार का पेट पालता है। मकान मिलने की खुशी में ये लोग आधे अधूरे मकान में ही कब्जा लेकर रहने लग गए। ठेकेदारों ने भी अपना फायदा देखा और आवास के साथ बनने वाले शौचालयों के काम को आधा अधूरा छोड़कर निकल गए।

Know How Government Ditch :

कहते हैं कि कोई भी जीव परिवेश के हिसाब से खुद को ढ़ाल ही लेता है। सात साल पहले डुडौली में आबादी के नाम पर गिने चुने मकान थे और भारी तादात में जमीनें खाली थीं। जिसने कांशीराम आवास योजना के लाभार्थियों को कुछ सालों तक शौचालय की कमी का अहसास नहीं होने दिया। कुछ लाभार्थी ने आवास के साथ शौचालय न मिलने का मुद्दा भी उठाया जिम्मेदार अधिकारियों तक शिकायत पहुंचाई लेकिन किसी भी कान पर जूं नहीं रेंगा।

आज इस कालोनी में शौचालयों का न होना एक समस्या बनकर उभरा है। सात साल पहले जो बच्चे खुले में शौच करने जाना खेल समझते थे, अब उन्हें शौच के मैदानों में बने मकानों के बीच जाना शर्मिंदा करता है और लोग भी उन्हें टोकते हैं। जो लोग सक्षम हैं उन्होंने अपनी हैसि​यत के हिसाब से शौचालय बना लिए हैं। जिनकी हैसियत नहीं है वे सुबह की रोशनी फैलने से पहले और शाम को अंधेरा होने के बाद का इंतजार करते हैं।

कांशीराम आवास योजना के लाभार्थियों का आरोप है कि टीवी और अखबार में सरकार रोज खुले में शौच के खिलाफ दावे करती है। गांवों में शौचालय बनवाए जा रहे हैं, लेकिन शहरों में जिनके साथ शौचालय के नाम पर छलावा हुआ है, उनकी सुध कौन लेगा?

लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से सात साल पहले राजधानी लखनऊ के फैजुल्लागंज वार्ड के रहीमनगर डुडौली में डूडा आवास योजना के तहत बनी कांशीराम आवास योजना में गजब की धांधली की गई। करोड़ों की लागत से बन कर तैयार हुए आवासों के लाभार्थी ऐसे जरूरतमंद थे, जिनके लिए लखनऊ जैसे शहर में अपनी छत होना किसी सपने जैसा था, जिसे सरकार ने पूरा कर दिया। इस योजना के लाभार्थियों में कोई दिहाड़ी मजदूर है तो कोई रिक्शा चलाकर अपने परिवार का पेट पालता है। मकान मिलने की खुशी में ये लोग आधे अधूरे मकान में ही कब्जा लेकर रहने लग गए। ठेकेदारों ने भी अपना फायदा देखा और आवास के साथ बनने वाले शौचालयों के काम को आधा अधूरा छोड़कर निकल गए।कहते हैं कि कोई भी जीव परिवेश के हिसाब से खुद को ढ़ाल ही लेता है। सात साल पहले डुडौली में आबादी के नाम पर गिने चुने मकान थे और भारी तादात में जमीनें खाली थीं। जिसने कांशीराम आवास योजना के लाभार्थियों को कुछ सालों तक शौचालय की कमी का अहसास नहीं होने दिया। कुछ लाभार्थी ने आवास के साथ शौचालय न मिलने का मुद्दा भी उठाया जिम्मेदार अधिकारियों तक शिकायत पहुंचाई लेकिन किसी भी कान पर जूं नहीं रेंगा।आज इस कालोनी में शौचालयों का न होना एक समस्या बनकर उभरा है। सात साल पहले जो बच्चे खुले में शौच करने जाना खेल समझते थे, अब उन्हें शौच के मैदानों में बने मकानों के बीच जाना शर्मिंदा करता है और लोग भी उन्हें टोकते हैं। जो लोग सक्षम हैं उन्होंने अपनी हैसि​यत के हिसाब से शौचालय बना लिए हैं। जिनकी हैसियत नहीं है वे सुबह की रोशनी फैलने से पहले और शाम को अंधेरा होने के बाद का इंतजार करते हैं।कांशीराम आवास योजना के लाभार्थियों का आरोप है कि टीवी और अखबार में सरकार रोज खुले में शौच के खिलाफ दावे करती है। गांवों में शौचालय बनवाए जा रहे हैं, लेकिन शहरों में जिनके साथ शौचालय के नाम पर छलावा हुआ है, उनकी सुध कौन लेगा?