जानिए असम में क्या है मौलाना बदरुद्दीन अजमल की राजनीतिक हैसियत

मौलाना बदरुद्दीन अजमल की राजनीतिक हैसियत
जानिए असम में क्या है मौलाना बदरुद्दीन अजमल की राजनीतिक हैसियत

आर्मी चीफ विपिन रावत के बयान के बाद एकाएक सुर्खियों में आई असम की राजनीतिक पार्टी एआईयूडीएफ और उसके संस्थापक मौलाना बदरुद्दीन अजमल कौन हैं और क्या करते हैं ये सब जानने की ईच्छा जरूर ही आपके भीतर भी जागी होगी। च​लिए हम आपको बताते हैं कि मौलाना बदरुद्दीन अजमल कौन है?

Know More About Badruddin Ajmal :

असम की राजनीति में सबसे ताकतवर मुस्लिम चेहरे के रूप में पहचान रखने वाले बदरुद्दीन अजमल धुबरी से सांसद हैं। उन्होंने असम की नेतृत्व विहीन मुस्लिम आबादी को ध्यान में रखते हुए 2005 में असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एयूडीएफ) की स्थापना की थी जोकि अब आॅल इंडिया डेमोक्रेटिड फ्रंट (एआईयूडीएफ) के नाम से जाना जाता है। 2006 में पहला विधानसभा चुनाव लड़ते हुए बदरुद्दीन एक साथ दो विधानसभा सीटों से विजयी हुए, जबकि उनकी पार्टी उस चुनाव में 10 सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब रही। एआईयूडीएफ ने 2014 के लोकसभा चुनावों में तीन संसदीय सीटों पर जीत हासिल की। असम की वर्तमान विधानसभा में भी एआईयूडीएफ के पास 12 सीटें हैं।

पूर्वोत्तर के सबसे बड़े सूबे यानी असम में बदरुद्दीन की राजनीतिक हैसियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में तमाम सेक्युलर राजनीतिक दलों ने बदरुद्दीन के साथ गठबंधन करने की कोशिश की। जब बदरुद्दीन ने अकेले अपनी दम पर लोकसभा चुनाव लड़े तो इसका सीधा लाभ भाजपा को मिलने पर विरोधी दलों ने उन्हें बीजेपी समर्थक तक करार दे डाला।

एक सफल कारोबारी से सांसद बनने तक का सफर

67 वर्षीय बदरुद्दीन को असम में एक सफल कारोबारी के रूप में देखा जाता है। वर्तमान में वह असम के ​बड़े रियल इस्टेट कारोबारी होने के साथ ही चमड़ा उद्योग, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे हैं।

बदरुद्दीन ने अपने पुश्तैनी इत्र कारोबार से अपने करियर की शुरूआत की थी। असम से मुंबई पहुंच कर अजमल ब्रांड इत्र को दुबई और फिर अन्य अरब देशों तक स्थापित कर उन्होंने अपनी कारोबारी क्षमताएं साबित कीं। इत्र कारोबार को जमाने के बाद उन्होंने असम में अपनी कारोबारी सक्रियता को बढ़ाया।

कारोबार के साथ—साथ समाज सेवा में भी सक्रीय है बदरुद्दीन

बदरुद्दीन मानते हैं कि असम की सेवा करना उनकी जिम्मेदारी है, जो उनके पिता की दी हुई सीख है। बदरुद्दीन अपनी आय का 25 फीसदी हिस्सा जरूरतमंदों पर खर्च करते हैं। वह अनाथ आश्रम चलाने के साथ ही तमाम धार्मिक और सामाजिक कार्यों से जुड़े हुए हैं।

वह बतौर धर्मगुरु भी इस्लामिक मान्यताओं के अनुरूप दुआएं फूंककर अपने अनुयायियों को राहत पहुंचाने का काम करते है। इसे अंधविश्वास कहने वालों को जवाब देते हुए बदरुद्दीन ने कहा था कि अगर किसी गरीब को उनकी दुआ से आराम मिलता है या ​उसे फायदा मिलता है तो ऐसा करना वह अपनी खुशनसीबी समझते हैं। बदरुद्दीन अपनी धर्मगुरु वाली छवि के कारण ही हुजूर नाम से भी जाने जाते है।

बदरुद्दीन पर जिहादी विचारधारा समर्थक राजनीति करने के आरोप

असम में एक विचारधारा के लोगों का मानना है कि बदरुद्दीन अजमल जिहादी विचारधारा के समर्थक हैं। जो असम में कट्टरवादी इस्लामिक राजनीति को पोषित कर रहे हैं। हालांकि बदरुद्दीन पर लगने वाले ऐसे आरोप उस स्थिति में कहीं नहीं टिकते जब उनके भाषणों का जिक्र होता है।

बदरुद्दीन पर ऐसे आरोपों के लगने की बहुत बड़ी वजह उनके द्वारा स्थानीय गरीब मुसलमानों को मदद करना माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि उनके संसदीय क्षेत्र धुबरी में उनकी जीत का कारण बांग्लादेश से आने गैरकानूनी शरणा​र्थी हैं, जिन्हें वह असम में आश्रय प्रदान करते हैं।

अगर धुबरी की भौगोलिक स्थिति की बात की जाए तो असम का यह हिस्सा बांग्लादेश की सीमा से सटा हुआ है। जहां की बहुत बड़ी आबादी को लेकर ऐसा माना जाता है कि वे बांग्लादेशी हैं और गैरकानूनी तरीके से भारत में प्रवास कर रहे हैं। जिन्हें एक योजनाबद्ध तरीके से भारत का नागरिक बनाने का काम भी हो रहा है।

भारतीय सेना के आर्मी चीफ के बयान से भी ऐसा ही नजर आता है कि वे बदरुद्दीन की पार्टी को गैरकानूनी बांग्लादेशी प्रवासियों को भारत में घुसपैठ करने में मदद मिल रही है। जिसे पाकिस्तान से प्रभावित और चीन से आर्थिक मदद से पोषित षड्यंत्र के रूप में देखना वह गलत नहीं समझते।

असम में वंशवादी राजनीति के अगुआकार भी है बदरुद्दीन —

बदरुद्दीन पर उनके विरोधी वंशवादी राजनीति को बढ़ाने का आरोप भी लगाते हैं। ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि उनके दो बेटे असम विधानसभा में विधायक हैं, तो खुद और उनके छोटे भाई लोकसभा के सदस्य हैं।

लेकिन इस बीच आपको एक बात बताना जरूरी है। बदरुद्दीन पर कट्टर इस्लामिक राजनीति करने के आरोप भले ही लगते हों, लेकिन उनकी पार्टी के तीसरे सांसद एक हिंदू हैं। जिससे एक हद तक कहा जा सकता कि एआईयूडीएफ पर भले ही इस्लामिक राजनीति की उपज माना जाता हो लेकिन असम के कुछ हिन्दू भी इस पार्टी की विचारधारा का समर्थन करते हैं।

#Bipin Rawat, #AIUDF #Badruddin Ajmal

आर्मी चीफ विपिन रावत के बयान के बाद एकाएक सुर्खियों में आई असम की राजनीतिक पार्टी एआईयूडीएफ और उसके संस्थापक मौलाना बदरुद्दीन अजमल कौन हैं और क्या करते हैं ये सब जानने की ईच्छा जरूर ही आपके भीतर भी जागी होगी। च​लिए हम आपको बताते हैं कि मौलाना बदरुद्दीन अजमल कौन है?असम की राजनीति में सबसे ताकतवर मुस्लिम चेहरे के रूप में पहचान रखने वाले बदरुद्दीन अजमल धुबरी से सांसद हैं। उन्होंने असम की नेतृत्व विहीन मुस्लिम आबादी को ध्यान में रखते हुए 2005 में असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एयूडीएफ) की स्थापना की थी जोकि अब आॅल इंडिया डेमोक्रेटिड फ्रंट (एआईयूडीएफ) के नाम से जाना जाता है। 2006 में पहला विधानसभा चुनाव लड़ते हुए बदरुद्दीन एक साथ दो विधानसभा सीटों से विजयी हुए, जबकि उनकी पार्टी उस चुनाव में 10 सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब रही। एआईयूडीएफ ने 2014 के लोकसभा चुनावों में तीन संसदीय सीटों पर जीत हासिल की। असम की वर्तमान विधानसभा में भी एआईयूडीएफ के पास 12 सीटें हैं।पूर्वोत्तर के सबसे बड़े सूबे यानी असम में बदरुद्दीन की राजनीतिक हैसियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में तमाम सेक्युलर राजनीतिक दलों ने बदरुद्दीन के साथ गठबंधन करने की कोशिश की। जब बदरुद्दीन ने अकेले अपनी दम पर लोकसभा चुनाव लड़े तो इसका सीधा लाभ भाजपा को मिलने पर विरोधी दलों ने उन्हें बीजेपी समर्थक तक करार दे डाला।एक सफल कारोबारी से सांसद बनने तक का सफर-67 वर्षीय बदरुद्दीन को असम में एक सफल कारोबारी के रूप में देखा जाता है। वर्तमान में वह असम के ​बड़े रियल इस्टेट कारोबारी होने के साथ ही चमड़ा उद्योग, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे हैं।बदरुद्दीन ने अपने पुश्तैनी इत्र कारोबार से अपने करियर की शुरूआत की थी। असम से मुंबई पहुंच कर अजमल ब्रांड इत्र को दुबई और फिर अन्य अरब देशों तक स्थापित कर उन्होंने अपनी कारोबारी क्षमताएं साबित कीं। इत्र कारोबार को जमाने के बाद उन्होंने असम में अपनी कारोबारी सक्रियता को बढ़ाया।कारोबार के साथ—साथ समाज सेवा में भी सक्रीय है बदरुद्दीन-बदरुद्दीन मानते हैं कि असम की सेवा करना उनकी जिम्मेदारी है, जो उनके पिता की दी हुई सीख है। बदरुद्दीन अपनी आय का 25 फीसदी हिस्सा जरूरतमंदों पर खर्च करते हैं। वह अनाथ आश्रम चलाने के साथ ही तमाम धार्मिक और सामाजिक कार्यों से जुड़े हुए हैं।वह बतौर धर्मगुरु भी इस्लामिक मान्यताओं के अनुरूप दुआएं फूंककर अपने अनुयायियों को राहत पहुंचाने का काम करते है। इसे अंधविश्वास कहने वालों को जवाब देते हुए बदरुद्दीन ने कहा था कि अगर किसी गरीब को उनकी दुआ से आराम मिलता है या ​उसे फायदा मिलता है तो ऐसा करना वह अपनी खुशनसीबी समझते हैं। बदरुद्दीन अपनी धर्मगुरु वाली छवि के कारण ही हुजूर नाम से भी जाने जाते है।बदरुद्दीन पर जिहादी विचारधारा समर्थक राजनीति करने के आरोप —असम में एक विचारधारा के लोगों का मानना है कि बदरुद्दीन अजमल जिहादी विचारधारा के समर्थक हैं। जो असम में कट्टरवादी इस्लामिक राजनीति को पोषित कर रहे हैं। हालांकि बदरुद्दीन पर लगने वाले ऐसे आरोप उस स्थिति में कहीं नहीं टिकते जब उनके भाषणों का जिक्र होता है।बदरुद्दीन पर ऐसे आरोपों के लगने की बहुत बड़ी वजह उनके द्वारा स्थानीय गरीब मुसलमानों को मदद करना माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि उनके संसदीय क्षेत्र धुबरी में उनकी जीत का कारण बांग्लादेश से आने गैरकानूनी शरणा​र्थी हैं, जिन्हें वह असम में आश्रय प्रदान करते हैं।अगर धुबरी की भौगोलिक स्थिति की बात की जाए तो असम का यह हिस्सा बांग्लादेश की सीमा से सटा हुआ है। जहां की बहुत बड़ी आबादी को लेकर ऐसा माना जाता है कि वे बांग्लादेशी हैं और गैरकानूनी तरीके से भारत में प्रवास कर रहे हैं। जिन्हें एक योजनाबद्ध तरीके से भारत का नागरिक बनाने का काम भी हो रहा है।भारतीय सेना के आर्मी चीफ के बयान से भी ऐसा ही नजर आता है कि वे बदरुद्दीन की पार्टी को गैरकानूनी बांग्लादेशी प्रवासियों को भारत में घुसपैठ करने में मदद मिल रही है। जिसे पाकिस्तान से प्रभावित और चीन से आर्थिक मदद से पोषित षड्यंत्र के रूप में देखना वह गलत नहीं समझते।असम में वंशवादी राजनीति के अगुआकार भी है बदरुद्दीन —बदरुद्दीन पर उनके विरोधी वंशवादी राजनीति को बढ़ाने का आरोप भी लगाते हैं। ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि उनके दो बेटे असम विधानसभा में विधायक हैं, तो खुद और उनके छोटे भाई लोकसभा के सदस्य हैं।लेकिन इस बीच आपको एक बात बताना जरूरी है। बदरुद्दीन पर कट्टर इस्लामिक राजनीति करने के आरोप भले ही लगते हों, लेकिन उनकी पार्टी के तीसरे सांसद एक हिंदू हैं। जिससे एक हद तक कहा जा सकता कि एआईयूडीएफ पर भले ही इस्लामिक राजनीति की उपज माना जाता हो लेकिन असम के कुछ हिन्दू भी इस पार्टी की विचारधारा का समर्थन करते हैं।#Bipin Rawat, #AIUDF #Badruddin Ajmal