‘जन गण मन’ की रचना से राष्ट्रगान बनने तक का विवादित ​इतिहास, जानें पूरा सच

राष्ट्रगान यानी ‘जन गण मन’ की ध्वनि कानों तक पहुंचते ही हम 52 सेंकेण्ड के लिए थम जाते हैं। यह 52 सेकेंड उस ध्वनि के सम्मान के लिए होते हैं, जो हमारे देश की संप्र​भुता और एकता के सम्मान का प्रतीक है। हमारी नई पीड़ी अपने राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत की पहचान करने में कनफ्यूज हो जाती है। जिसकी वजह है राष्ट्रगान और उसके इतिहास से हमारी दूरी, क्योंकि हम नहीं जानते कि भारत एक मात्र ऐसा देश है जहां राष्ट्रगान है जबकि दुनिया के तमाम देश राष्ट्रीय गीत गाते हैं। चलिए हम आज आपको बताते हैं हमारे राष्ट्रगान का इतिहास और उससे जुड़े कुछ सुने-अनसुने विवादों के बारे में।

राष्ट्रकवि रविन्द्र नाथ टैगोर द्वारा रचित ‘जन गण मन’ गीत को राष्ट्रगीत के रूप में पहचान 1950 में यानी भारत के आजाद होने के करीब तीन साल बाद संविधान लागू होने के साथ ठीक दो दिन बाद मिली। इस दौरान ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार करने के लिए हमारी संविधान सभा के सदस्यों में आम राय नहीं बन सकी थी क्योंकि कुछ लोग ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगीत का दर्ज देने के पक्ष में थे। जिसकी वजह थी ‘जन गण मन’ की रचना के पीछे का विवादित इतिहास। जबकि ‘वंदे मातरम्’ को भारत की आजादी के लिए हुई क्रांति को कोने कोने तक ले जाने का श्रेय दिया जा रहा था, जिस वजह से वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत बनाए जाने की मांग उठी।

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जन गण मन का क्यों था विरोध 

ऐसा कई इतिहासकार मानते हैं कि जन गण मन गीत की रचना ब्रिटिश शासक जार्ज पंचम की प्रशंसा करने के लिए की गई थी। इस गीत को रविन्द्र नाथ टैगोर ने बांग्लाभाषा में लिखा था। जिसे 27 दिसंबर 1911 को पहली बार कलकत्ता में हुए कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन की उस सभा में गाया गया था जिसे जार्ज पंचम और क्वीन मैरी की स्वागत सभा करार दिया गया।

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इस गीत में जार्ज पंचम को अधिनायक यानी भारत और भारतवासियों के देवता और हीरो की संज्ञा दी गई। जार्ज पंचम इस रचना के माध्यम से की गई अपनी प्रशंसा से बेहद खुश हुए और उन्होंने इस गीत को तैयार करने वाले रविन्द्र नाथ टैगोर से ​मिलने की ईच्छा जताई थी। कहा तो यह तक जाता है कि 1913 में रविन्द्र नाथ टैगोर को साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार दिए जाने की पीछे भी इस गीत को आधार माना गया था, जिस वजह से टैगोर ने पुरस्कार समारोह का हिस्सा बनने से इंकार कर दिया था। हालांकि नोबल विवाद को लेकर भी कई तरह के तथ्य सामने आ चुके हैं।

टैगोर ने स्पष्ट किया जार्ज पंचम के लिए नहीं थी उनकी रचना 

जन गण मन की रचना को लेकर रविन्द्र नाथ टैगोर की आलोचना हमेशा होती रही। उन्होंंने भी कभी सार्वजनिक रूप से अपनी आलोचना पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। एक साहित्यकार होते हुए वह राजनीति में भी सक्रिय रहे, लेकिन अपने जीवन के अंतिम समय में उन्होंने 1939 में लिखे अपने एक पत्र में उन्होंने इस बात का जिक्र किया था कि उन्होने जार्ज पंचम को कभी अधिनायक और भारत का भाग्यविधाता नहीं बताया था। इस स्पष्टीकरण को टैगोर द्वारा उनकी देशभक्ति पर उठने वाले सवालों को दिए गए जवाब के रूप में माना जाता है।

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कैसे बना राष्ट्र गान 

इतिहास के कुछ पन्नों में दर्ज है कि संविधान का निर्माण करने के लिए बनाई गई समिति ने सदस्यों के बीच जन गण मन और वन्दे मातरम् के बीच राष्ट्रगीत को लेकर कोई एक राय नहीं बना पाई तो समिति के अध्यक्ष रहे पं0 राजेन्द्र प्रसाद ने 24 जनवरी 1950 को एक प्रस्ताव पेशा किया। जिसके तहत ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान और ‘वन्दे मातरम्’ को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया जाना सुनिश्चित हुआ। जिसमें राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत को बराबरी का दर्ज दिए जाने की बात भी कही गई।

‘जन गण मन’ गीत को गान की संज्ञा क्यों मिली 

जन गण मन बांग्ला भाषा में लिखी गई रचना थी। बंगाली भाषा में गीत को गान कहा जाता है इसीलिए ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान की संज्ञा दिये जाने पर विवाद नहीं था। अगर भविष्य में आपको कभी राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के बीच में कनफ्यूजन हो तो इस बात को ध्यान में रखिएगा। आप भविष्य में कभी दुविधा में नहीं पड़ेंगे।

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क्यों जरूरी था ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान बनाया जाना 

यह स्वतंत्र भारत के इतिहास का एक विवादित पहलू है। कुछ इतिहासकारों ने इस विषय को भारत की आजादी के लिए ब्रिटिश सरकार के साथ हुए समझौते के बिन्दुओं से जोड़ा है। कहा जाता है कि भारत की आजादी के लिए ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस के बीच हुए समझौते में रखी गई शर्तों में एक शर्त यह भी थी कि आजाद भारत का राष्ट्रीय गीत यानी नेशनल एंथम ‘जन गण मन’ ही रहेगा। इसी शर्त को पूरा करने के लिए संविधान स​मिति ने ‘जन गण मन’ को शामिल करने पर विचार किया नहीं तो ‘वंदे मातरम्’ आजाद भारत का राष्ट्रगीत होता।

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