जानिए कौन हैं ‘तानाजी मालुसरे’, जिन्होंने मुगलों को हराकर सिंहगढ़ किले पर फहराया था भगवा

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जानिए कौन हैं 'तानाजी मालुसरे', जिन्होंने मुगलों को हराकर सिंहगढ़ किले पर फहराया था भगवा

नई दिल्ली। बॉलीवुड में बायोपिक और हिस्टोरिकल मूवी का दौर चल रहा हैं। अर्जुन कपूर और कृति सेनन की फिल्म पानीपत के बाद अब अजय देवगन, सैफ अली खान और काजोल की फिल्म ‘तानाजी: द अनसंग वॉरियर’ बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचा रही हैं। इस फिल्म में अजय देवगन छत्रपति शिवाजी महाराज के सेनापति सूबेदार और घनिष्ठ मित्र तानाजी मालुसरे (Subedar Tanaji Malusare) के किरदार में नजर आ रहे हैं।  

Know Who Is Tanaji Malusare Who Defeated The Mughals And Hoisted Saffron At Sinhagad Fort :

आखिर तानाजी मालुसरे कौन थे?

तानाजी मालुसरे बहादुर और प्रसिद्ध मराठा योद्धाओं में से एक हैं और एक ऐसा नाम है जो वीरता का पर्याय है। वे महान शिवाजी के दोस्त थे। उनको 1670 में सिंहगढ़ की लड़ाई के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है, जहां उन्होंने मुगल किला रक्षक उदयभान राठौर के खिलाफ अपनी आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी थी, जिसने मराठाओं के जीत का मार्ग को प्रशस्त किया था।

उनकी वीरता और बल के कारण शिवाजी उन्हें ‘सिंह’ कहा करते थे। तानाजी मालुसरे का जन्म 1600 ईस्वी में गोडोली, जवाली तालुका, सतारा जिला, महाराष्ट्र में हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार कोलाजी और माता का नाम पार्वतीबाई था। उनके भाई का नाम सरदार सूर्याजी था।

जानिए क्या थी सिंहगढ़ की लड़ाई और तानाजी मालुसरे को क्यों याद किया जाता है?

शिवाजी की बढ़ती हुई शक्ति से चिंतित होकर मुगल बादशाह औरंगजेब ने दक्षिण में नियुक्त अपने सूबेदार को उन पर चढ़ाई करने का आदेश दिया। शिवाजी के पास बड़ी संख्या में किले थे जिनकी मरम्मत पर वे बड़ी रकम खर्च करते थे। लेकिन धीरे धीरे मुगलों ने करीब 23 किले अपने अधीन कर लिए। पुरंदर के किले को बचा पाने में अपने को असमर्थ जानकर शिवाजी ने महाराजा जयसिंह से 22 जून 1665 ई. में पुरंदर की संधि की। जिस कारण शिवाजी महाराज को कोंधाना किला मुगलों को देना पड़ा। यह किला 1665 में राजपूत कमांडर जय सिंह प्रथम के नेतृत्व में मुगलों के अधीन आ गया। शिवाजी अपने इस किले को वापस पाना चाहते थे।

1665 की संधि के बाद जब शिवाजी औरंगजेब से मिलने आगरा गए तो वहां धोखे से उन्हें बंदी बना लिया गया जैसे तैसे शिवाजी आगरा से निकलकर महाराष्ट्र पहुंचे और उन्होंने पुंरदर संधि को अस्वीकार कर दिया। इसके बाद शुरू हुआ मुगलों के अधीन हुए किलों को फतह करने का सिलसिला। क्योंकि किला मराठाओं के लिए सम्मान की बात थी। खास तौर पर ये किला इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि कहा जाता था कि ये किला जिस किसी के पास भी होगा उसका ‘पूना’ पर अधिकार होगा।

ऐसे में शिवाजी महाराज ने अपने घनिष्ठ मित्र और सेनापति तानाजी मालुसरे को इसे फतह करने के लिए भेजा। 70,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस किले का एक द्वार पुणे और दूसरा द्वार कल्याण की ओर खुलता है। तानाजी अपने भाई सूर्या जी को साथ लेकर करीब 300 सेना के साथ इस किले को फतह करने चल दिए। किले की दीवार इतनी सीधी सपाट थी कि उसपर आसानी से चढ़ना संभव नहीं था। इतना ही नहीं इस किले की रक्षा करने के लिए किले में करीब 5000 मुगल सेना तैनात की गई थी।

किले के नीचे पहुंचने के बाद तानाजी योजना के तहत रस्सी की मदद से इस किले में दाखिल होने में सफल हुए। बारी-बारी से तानाजी की पूरी सेना इस किले में दाखिल हो गई और युद्ध छिड़ गया। इस बीच उदयभान राठौड़ (किले की रखवाली करने वाले राजपूत सेनापति) को जब इसका पता चला तो उन्होंने तानाजी पर हमला किया। इस हमले में तानाजी की ढाल टूट गई। लड़ाई में तानाजी, उदयभान द्वारा मारे गए और वीरगति को प्राप्त हुए। लेकिन अंत में मराठाओं ने इस किले पर फतह हासिल की और मराठा ध्वज फहरा दिया गया।

किले पर फतह हासिल करने के बावजूद शिवाजी महाराज को अपने प्रिय सेनापति को खोने का दुख उम्रभर रहा। तानाजी की मृत्यु की खबर सुन शिवाजी ने कहा था-  ‘गढ़ आला, पन सिंह गेला’ यानी किला तो जीत लिया लेकिन अपना शेर खो दिया। शिवाजी तानाजी को शेर कहा करते थे।

नई दिल्ली। बॉलीवुड में बायोपिक और हिस्टोरिकल मूवी का दौर चल रहा हैं। अर्जुन कपूर और कृति सेनन की फिल्म पानीपत के बाद अब अजय देवगन, सैफ अली खान और काजोल की फिल्म 'तानाजी: द अनसंग वॉरियर' बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचा रही हैं। इस फिल्म में अजय देवगन छत्रपति शिवाजी महाराज के सेनापति सूबेदार और घनिष्ठ मित्र तानाजी मालुसरे (Subedar Tanaji Malusare) के किरदार में नजर आ रहे हैं।   आखिर तानाजी मालुसरे कौन थे? तानाजी मालुसरे बहादुर और प्रसिद्ध मराठा योद्धाओं में से एक हैं और एक ऐसा नाम है जो वीरता का पर्याय है। वे महान शिवाजी के दोस्त थे। उनको 1670 में सिंहगढ़ की लड़ाई के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है, जहां उन्होंने मुगल किला रक्षक उदयभान राठौर के खिलाफ अपनी आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी थी, जिसने मराठाओं के जीत का मार्ग को प्रशस्त किया था। उनकी वीरता और बल के कारण शिवाजी उन्हें 'सिंह' कहा करते थे। तानाजी मालुसरे का जन्म 1600 ईस्वी में गोडोली, जवाली तालुका, सतारा जिला, महाराष्ट्र में हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार कोलाजी और माता का नाम पार्वतीबाई था। उनके भाई का नाम सरदार सूर्याजी था। जानिए क्या थी सिंहगढ़ की लड़ाई और तानाजी मालुसरे को क्यों याद किया जाता है? शिवाजी की बढ़ती हुई शक्ति से चिंतित होकर मुगल बादशाह औरंगजेब ने दक्षिण में नियुक्त अपने सूबेदार को उन पर चढ़ाई करने का आदेश दिया। शिवाजी के पास बड़ी संख्या में किले थे जिनकी मरम्मत पर वे बड़ी रकम खर्च करते थे। लेकिन धीरे धीरे मुगलों ने करीब 23 किले अपने अधीन कर लिए। पुरंदर के किले को बचा पाने में अपने को असमर्थ जानकर शिवाजी ने महाराजा जयसिंह से 22 जून 1665 ई. में पुरंदर की संधि की। जिस कारण शिवाजी महाराज को कोंधाना किला मुगलों को देना पड़ा। यह किला 1665 में राजपूत कमांडर जय सिंह प्रथम के नेतृत्व में मुगलों के अधीन आ गया। शिवाजी अपने इस किले को वापस पाना चाहते थे। 1665 की संधि के बाद जब शिवाजी औरंगजेब से मिलने आगरा गए तो वहां धोखे से उन्हें बंदी बना लिया गया जैसे तैसे शिवाजी आगरा से निकलकर महाराष्ट्र पहुंचे और उन्होंने पुंरदर संधि को अस्वीकार कर दिया। इसके बाद शुरू हुआ मुगलों के अधीन हुए किलों को फतह करने का सिलसिला। क्योंकि किला मराठाओं के लिए सम्मान की बात थी। खास तौर पर ये किला इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि कहा जाता था कि ये किला जिस किसी के पास भी होगा उसका 'पूना' पर अधिकार होगा। ऐसे में शिवाजी महाराज ने अपने घनिष्ठ मित्र और सेनापति तानाजी मालुसरे को इसे फतह करने के लिए भेजा। 70,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस किले का एक द्वार पुणे और दूसरा द्वार कल्याण की ओर खुलता है। तानाजी अपने भाई सूर्या जी को साथ लेकर करीब 300 सेना के साथ इस किले को फतह करने चल दिए। किले की दीवार इतनी सीधी सपाट थी कि उसपर आसानी से चढ़ना संभव नहीं था। इतना ही नहीं इस किले की रक्षा करने के लिए किले में करीब 5000 मुगल सेना तैनात की गई थी। किले के नीचे पहुंचने के बाद तानाजी योजना के तहत रस्सी की मदद से इस किले में दाखिल होने में सफल हुए। बारी-बारी से तानाजी की पूरी सेना इस किले में दाखिल हो गई और युद्ध छिड़ गया। इस बीच उदयभान राठौड़ (किले की रखवाली करने वाले राजपूत सेनापति) को जब इसका पता चला तो उन्होंने तानाजी पर हमला किया। इस हमले में तानाजी की ढाल टूट गई। लड़ाई में तानाजी, उदयभान द्वारा मारे गए और वीरगति को प्राप्त हुए। लेकिन अंत में मराठाओं ने इस किले पर फतह हासिल की और मराठा ध्वज फहरा दिया गया। किले पर फतह हासिल करने के बावजूद शिवाजी महाराज को अपने प्रिय सेनापति को खोने का दुख उम्रभर रहा। तानाजी की मृत्यु की खबर सुन शिवाजी ने कहा था-  'गढ़ आला, पन सिंह गेला' यानी किला तो जीत लिया लेकिन अपना शेर खो दिया। शिवाजी तानाजी को शेर कहा करते थे।