एससी एसटी एक्ट संशोधन : सुप्रीम कोर्ट सही या फिर दलित प्रदर्शनकारी

sc st act supreme court
एससी एसटी एक्ट संशोधन : सुप्रीम कोर्ट सही या फिर दलित प्रदर्शनकारी

नई दिल्ली। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) कानून 1989 यानी ‘एससी एसटी एक्ट’, को भारतीय संसद ने 19 सितंबर 1989 को पारित किया था। जिसे 30 जनवरी 1990 को पूरे देश में प्रत्येक उस भारतवासी पर लागू किया गया था, जोकि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाती का सदस्य नहीं है। इस कानून को लाने का एक मात्र उद्देश्य अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों के उत्पीड़न और उनके खिलाफ होने वाले अपराधों को रोकना था।

Know Why Supreme Court Ordered Change In Sc St Act 1989 :

इस कानून के प्रावधानों के तहत यदि कोई दलित किसी गैर दलित व्यक्ति के खिलाफ पुलिस के समक्ष अपने उत्पीड़न की शिकायत लेकर पहुंचता है, तो पुलिस के लिए दलित की शिकायत दर्ज कर पहली कार्रवाई के रूप में आरोपी की गिरफ्तारी करना अनिवार्य होता है।

सुप्रीम कोर्ट 20 मार्च को एक याचिका पर सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया था कि अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति( अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज मुकदमों में बिना जांच के किसी भी लोक सेवक को गिरफ्तार न किया जाए और सामान्य नागरिकों को भी कानून के तहत पूछताछ के बाद ही गिरफ्तार किया जाए। सीधे शब्दों में कहा जाए तो प्रथम दृष्टया आरोप साबित होने पर ही गिरफ्तारी की कार्रवाई करने का फैसला सुनाया था।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की पीछे की वजह इस एक्ट के कारण होने वाला सामान्य नागरिकों का उत्पीड़न था। अदालतों में एससी एसटी एक्ट के हजारों ऐसे मामले विचाराधीन हैं, जिन्हें सियासी कारणों या फिर अन्य कारणों के चलते दर्ज करवाया गया। गांवों में तो इस कानून को रसूखदार अपना हथियार बनाकर रखते हैं। जो दलितों का उत्पीड़न भी करते है और फिर उन्हीं दलितों के सहारे अपने विरोधियों के खिलाफ एससी एसटी एक्ट का मामला दर्ज करवा देते हैं।

27 जुलाई 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने बदला दहेज एक्ट —

जैसा कि हम सभी जानते हैं, कि कानून अपने उद्देश्य को पूरा करें या न करें लेकिन उसके प्रावधानों का गलत प्रयोग कई बार उत्पीड़न का कारण बन जाता है। हमारे आस पास कई ऐसे मामले मिल जाएंगे जिनमें कई परिवार झूठे कानूनी मामलों में फंसकर उत्पीड़न का शिकार हुए। ऐसे ही मामले दहेज एक्ट में देखने को मिलते थे, लेकिन अदालत में अधिकांश मामलों में कानून के गलत नियत के साथ प्रयोग किया जाना सामने आया। मानो एक परंपरा बन गई थी, शादी के बाद दंपत्ति के बीच कोई छोटा मोटा झगड़ा हुआ और मामला दहेज एक्ट की धारा 498 ए के तहत दर्ज हो जाता था।

अदालत ने जब इस कानून के दुष्प्रभाव को बढ़ता देखा तो उसमें बदलाव कर दिया और दहेज एक्ट की धारा 498 ए के तहत होने वाली आरोपी पक्ष के लोगों की तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी। देश भर में अदालत के इस फैसले को सराहा गया। वास्तविकता में दहेज एक्ट के 50 फीसदी से अधिक मामले पारिवारिक कलह से जुड़े होते थे, जिन्हें दहेज उत्पीड़न का रंग दिया जाता था। हर गांव और मोहल्ले में ऐसे परिवार मिल जाएंगे जिन्हें दहेज एक्ट के झूठे मामलों में फंसकर जेल की हवा खानी पड़ी। बुढ़े मां बाप से लेकर जवान बेटियों तक को दहेज एक्ट का आरोपी बनाया गया।

ऐसा ही मामला एससी एसटी एक्ट को लेकर भी है। जहां राजनीतिक कारणों और पारिवारिक रंजिशों में बदला लेने के लिए जरूरतमंद गरीब दलितों को चंद हजार रुपए खिलाकर या उनके कर्जे माफ कर विरोधियों के खिलाफ इसी एक्ट के तहत झूठे मामले दर्ज करवाए जाते हैं। चूंकि यह कानून में प्रावधान है इसलिए पुलिस के सामने भी आरोपी को शीघ्र गिरफ्तार कर जेल भेजने की मजबूरी होती है।

नई दिल्ली। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) कानून 1989 यानी 'एससी एसटी एक्ट', को भारतीय संसद ने 19 सितंबर 1989 को पारित किया था। जिसे 30 जनवरी 1990 को पूरे देश में प्रत्येक उस भारतवासी पर लागू किया गया था, जोकि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाती का सदस्य नहीं है। इस कानून को लाने का एक मात्र उद्देश्य अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों के उत्पीड़न और उनके खिलाफ होने वाले अपराधों को रोकना था।इस कानून के प्रावधानों के तहत यदि कोई दलित किसी गैर दलित व्यक्ति के खिलाफ पुलिस के समक्ष अपने उत्पीड़न की शिकायत लेकर पहुंचता है, तो पुलिस के लिए दलित की शिकायत दर्ज कर पहली कार्रवाई के रूप में आरोपी की गिरफ्तारी करना अनिवार्य होता है।सुप्रीम कोर्ट 20 मार्च को एक याचिका पर सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया था कि अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति( अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज मुकदमों में बिना जांच के किसी भी लोक सेवक को गिरफ्तार न किया जाए और सामान्य नागरिकों को भी कानून के तहत पूछताछ के बाद ही गिरफ्तार किया जाए। सीधे शब्दों में कहा जाए तो प्रथम दृष्टया आरोप साबित होने पर ही गिरफ्तारी की कार्रवाई करने का फैसला सुनाया था।सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की पीछे की वजह इस एक्ट के कारण होने वाला सामान्य नागरिकों का उत्पीड़न था। अदालतों में एससी एसटी एक्ट के हजारों ऐसे मामले विचाराधीन हैं, जिन्हें सियासी कारणों या फिर अन्य कारणों के चलते दर्ज करवाया गया। गांवों में तो इस कानून को रसूखदार अपना हथियार बनाकर रखते हैं। जो दलितों का उत्पीड़न भी करते है और फिर उन्हीं दलितों के सहारे अपने विरोधियों के खिलाफ एससी एसटी एक्ट का मामला दर्ज करवा देते हैं।

27 जुलाई 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने बदला दहेज एक्ट —

जैसा कि हम सभी जानते हैं, कि कानून अपने उद्देश्य को पूरा करें या न करें लेकिन उसके प्रावधानों का गलत प्रयोग कई बार उत्पीड़न का कारण बन जाता है। हमारे आस पास कई ऐसे मामले मिल जाएंगे जिनमें कई परिवार झूठे कानूनी मामलों में फंसकर उत्पीड़न का शिकार हुए। ऐसे ही मामले दहेज एक्ट में देखने को मिलते थे, लेकिन अदालत में अधिकांश मामलों में कानून के गलत नियत के साथ प्रयोग किया जाना सामने आया। मानो एक परंपरा बन गई थी, शादी के बाद दंपत्ति के बीच कोई छोटा मोटा झगड़ा हुआ और मामला दहेज एक्ट की धारा 498 ए के तहत दर्ज हो जाता था।अदालत ने जब इस कानून के दुष्प्रभाव को बढ़ता देखा तो उसमें बदलाव कर दिया और दहेज एक्ट की धारा 498 ए के तहत होने वाली आरोपी पक्ष के लोगों की तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी। देश भर में अदालत के इस फैसले को सराहा गया। वास्तविकता में दहेज एक्ट के 50 फीसदी से अधिक मामले पारिवारिक कलह से जुड़े होते थे, जिन्हें दहेज उत्पीड़न का रंग दिया जाता था। हर गांव और मोहल्ले में ऐसे परिवार मिल जाएंगे जिन्हें दहेज एक्ट के झूठे मामलों में फंसकर जेल की हवा खानी पड़ी। बुढ़े मां बाप से लेकर जवान बेटियों तक को दहेज एक्ट का आरोपी बनाया गया।ऐसा ही मामला एससी एसटी एक्ट को लेकर भी है। जहां राजनीतिक कारणों और पारिवारिक रंजिशों में बदला लेने के लिए जरूरतमंद गरीब दलितों को चंद हजार रुपए खिलाकर या उनके कर्जे माफ कर विरोधियों के खिलाफ इसी एक्ट के तहत झूठे मामले दर्ज करवाए जाते हैं। चूंकि यह कानून में प्रावधान है इसलिए पुलिस के सामने भी आरोपी को शीघ्र गिरफ्तार कर जेल भेजने की मजबूरी होती है।