लोकतंत्र में सत्ता की चाबी जनता के पास…पढ़ें ये रिपोर्ट

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लोकतंत्र में सत्ता की चाबी जनता के पास...पढ़ें ये रिपोर्ट

लोकतंत्र में सत्ता की चाबी जनता के पास होती है। जब राजतंत्र होता था तब आम जनता को तमाम प्रकार की निरंकुश बंदिशों का सामना करना पड़ता था, चापलूस सामंतवादी ताकतें निर्बलों पर सत्ता कायम रखतीं थीं। यह कुरीति न केवल हिंदुस्तान में बल्कि पूरे विश्व में प्रचलित थी।फ्रांस के राजा लुई 16 की कहानियां वैसे भी इसकी सम्पूर्ण गाथा बयान करती हैं। राजतंत्र की सबसे बड़ी समस्या अपने पसंद के न्यायप्रिय, करुणामई, दूरदर्शी शासक चुनने की भी होती है। यदि कोई राजा बुद्धिहीन, दूरदर्शिता से कोसों दूर, न्याय को परे रखकर चापलूसों से घिरा हुआ और उसमें निर्णय लेने की क्षमता नहीं है, जो जनता के सुख दुख से दूर दूर तक परिचित नहीं है, ऐसी स्थिति में प्रजा बहुत संकट में आ जाती है। वह चाहकर भी अपने शासक को अपदस्थ नहीं कर सकती क्योंकि वहां लोकतंत्र विलुप्त है।

Loktantra Me Satta Ki Chabhi Janta Ke Pas :

लोकतंत्र में शक्ति जनता के हांथों में होती है क्योंकि यहां मतदान प्रणाली है, ऐसी प्रणाली जिसमें जनता सर्वोपरि होती है, जनता जिसे चाहती है वही गद्दी पर बैठता है। हिंदुस्तान ने भी सैकड़ों वर्षों गुलामी देखा है इसके पहले भी राजशक्ति हावी होती थी। तब राजा को अपदस्थ करने एकमात्र तरीका ‘विद्रोह’ होता था। आज हमारे इस राष्ट्र को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का गौरव प्राप्त है और यह सम्मान हमें बहुत संघर्षों के बाद मिला है।

स्वतंत्रता के बाद जनता ने अपने मत की ताकत को पहचानना शुरू किया और आज अपने विवेक से सत्ता में विश्वास रखती है, परन्तु क्या बस मतदान ही असली जीत है? क्या सिर्फ मतदान का प्रयोग कर लेने से हमारा लोकतंत्र जिंदा रह सकता है? क्या मतदान यही अर्थ है की मतदाता को पोलिंग बूथ तक ले जाना व मत का प्रयोग करवाना है? नहीं, प्रश्न गंभीर है और विचारणीय भी।
हमें याद रखना होगा कि हमें मतदान करने की आजादी मिली है ताकि हम ऐसे कार्यपालक दे सकें जो हमारे समावेशी विकाश के लिए प्रतिबद्ध हो, जो हमारे राजनैतिक मूल्यों को जिंदा रख सके।

लेकिन आज आम मतदाता जातिवाद, क्षेत्रवाद, साम्प्रदायिकता रूपी महामारी से इस प्रकार ग्रसित हो चुका है कि उसे इस बात का ध्यान ही नहीं है कि उसके मत का कितना दुरुपयोग हो रहा है।क्या आज भी हम वास्तविक रूप से गुलामी से मुक्त हो पाए हैं? सामाजिक एकता राजनैतिक एकता से पहले होनी चाहिए। हमारे देश के संवैधानिक ढांचा के अन्तर्गत राष्ट्रीय हित में चाहे वह केंद्र हो या राज्य कानून बनाने की शक्ति इन जीते हुए प्रत्याशियों के पास होती है अतः हमें अपने मत का प्रयोग सूझ बूझ के साथ करना चाहिए ताकि कोई ऐसा व्यक्ति सदन में न जाए जो हमारे पतन का कारण बने।

हमें अपने मत का प्रयोग जरूर करना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में एक एक मत का महत्व है।सशक्त भारत का निर्माण जागरूक मतदाता द्वारा संभव है। मतदान मतदाता की ऐसी शक्ति है जिसके द्वारा उसे खुली हवा में अपनी मर्ज़ी के पंछी उड़ाने की इजाजत है।

रिपोर्ट- रोशन मिश्रा

लोकतंत्र में सत्ता की चाबी जनता के पास होती है। जब राजतंत्र होता था तब आम जनता को तमाम प्रकार की निरंकुश बंदिशों का सामना करना पड़ता था, चापलूस सामंतवादी ताकतें निर्बलों पर सत्ता कायम रखतीं थीं। यह कुरीति न केवल हिंदुस्तान में बल्कि पूरे विश्व में प्रचलित थी।फ्रांस के राजा लुई 16 की कहानियां वैसे भी इसकी सम्पूर्ण गाथा बयान करती हैं। राजतंत्र की सबसे बड़ी समस्या अपने पसंद के न्यायप्रिय, करुणामई, दूरदर्शी शासक चुनने की भी होती है। यदि कोई राजा बुद्धिहीन, दूरदर्शिता से कोसों दूर, न्याय को परे रखकर चापलूसों से घिरा हुआ और उसमें निर्णय लेने की क्षमता नहीं है, जो जनता के सुख दुख से दूर दूर तक परिचित नहीं है, ऐसी स्थिति में प्रजा बहुत संकट में आ जाती है। वह चाहकर भी अपने शासक को अपदस्थ नहीं कर सकती क्योंकि वहां लोकतंत्र विलुप्त है।

लोकतंत्र में शक्ति जनता के हांथों में होती है क्योंकि यहां मतदान प्रणाली है, ऐसी प्रणाली जिसमें जनता सर्वोपरि होती है, जनता जिसे चाहती है वही गद्दी पर बैठता है। हिंदुस्तान ने भी सैकड़ों वर्षों गुलामी देखा है इसके पहले भी राजशक्ति हावी होती थी। तब राजा को अपदस्थ करने एकमात्र तरीका 'विद्रोह' होता था। आज हमारे इस राष्ट्र को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का गौरव प्राप्त है और यह सम्मान हमें बहुत संघर्षों के बाद मिला है।

स्वतंत्रता के बाद जनता ने अपने मत की ताकत को पहचानना शुरू किया और आज अपने विवेक से सत्ता में विश्वास रखती है, परन्तु क्या बस मतदान ही असली जीत है? क्या सिर्फ मतदान का प्रयोग कर लेने से हमारा लोकतंत्र जिंदा रह सकता है? क्या मतदान यही अर्थ है की मतदाता को पोलिंग बूथ तक ले जाना व मत का प्रयोग करवाना है? नहीं, प्रश्न गंभीर है और विचारणीय भी।
हमें याद रखना होगा कि हमें मतदान करने की आजादी मिली है ताकि हम ऐसे कार्यपालक दे सकें जो हमारे समावेशी विकाश के लिए प्रतिबद्ध हो, जो हमारे राजनैतिक मूल्यों को जिंदा रख सके।

लेकिन आज आम मतदाता जातिवाद, क्षेत्रवाद, साम्प्रदायिकता रूपी महामारी से इस प्रकार ग्रसित हो चुका है कि उसे इस बात का ध्यान ही नहीं है कि उसके मत का कितना दुरुपयोग हो रहा है।क्या आज भी हम वास्तविक रूप से गुलामी से मुक्त हो पाए हैं? सामाजिक एकता राजनैतिक एकता से पहले होनी चाहिए। हमारे देश के संवैधानिक ढांचा के अन्तर्गत राष्ट्रीय हित में चाहे वह केंद्र हो या राज्य कानून बनाने की शक्ति इन जीते हुए प्रत्याशियों के पास होती है अतः हमें अपने मत का प्रयोग सूझ बूझ के साथ करना चाहिए ताकि कोई ऐसा व्यक्ति सदन में न जाए जो हमारे पतन का कारण बने।

हमें अपने मत का प्रयोग जरूर करना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में एक एक मत का महत्व है।सशक्त भारत का निर्माण जागरूक मतदाता द्वारा संभव है। मतदान मतदाता की ऐसी शक्ति है जिसके द्वारा उसे खुली हवा में अपनी मर्ज़ी के पंछी उड़ाने की इजाजत है।

रिपोर्ट- रोशन मिश्रा