मध्यप्रदेश: दो नेताओं के पुत्रमोह की भेंट चढ़ गई सरकार, जानें ज्योतिरादित्य को क्यों किया गया मजबूर

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मध्यप्रदेश: दो नेताओं के पुत्रमोह की भेंट चढ़ गई सरकार, जानें ज्योतिरादित्य को क्यों किया गया मजबूर

नई दिल्ली। मध्यप्रदेश में 15 साल के वनवास के बाद कांग्रेस सत्ता में लौटी थी। वरिष्ठ कांग्रेस नेेता कमलनाथ 17 दिसंबर, 2018 को मुख्यमंत्री बने। सत्ता संभालने के महज 460 दिन के बाद 20 मार्च, 2020 को कमलनाथ को सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा। एमपी के सियासी हल्के में चर्चा है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने पुत्रमोह में कांग्रेस सरकार की बलि चढ़ा दी।

Madhya Pradesh Government Lost The Son Of Two Leaders Know Why Jyotiraditya Was Forced :

मुख्यमंत्री कमलनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह चाहते, तो सरकार नहीं गिरती। यदि सरकार पर कोई संकट था भी, तो उसे दूर किया जा सकता था। अगर पहली वरीयता वाली राज्यसभा सीट ज्योतिरादित्य सिंधिया को मिल जाती, तो वह बागी न होते लेकिन दिग्विजय सिंह की राज्यसभा जाने की चाहत ने ऐसा नहीं होने दिया। कहा तो यह भी जा रहा है कि इसी दिन के लिए दिग्विजय ने सिंधिया को प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनने दिया।

मध्यप्रदेश में कांग्रेस के प्रमुख नेता कमलनाथ और दिग्विजय सिंह दोनों अब सियासत के अंतिम दौर में हैं। दोनों नेताओं ने अपने-अपने बेटों को प्रदेश की राजनीति में थोड़ा बहुत स्थापित कर दिया है। कमलनाथ ने बेटे नकुलनाथ को अपनी परंपरागत छिंदवाड़ा सीट से सांसद बनाकर तो दिग्विजय सिंह ने बेटे जयवर्धन सिंह को कमलनाथ सरकार में मंत्री बनाकर राजनैतिक वारिस बना दिया है।

कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बाद सिंधिया का रास्ता मध्यप्रदेश में हमेशा के लिए खुल जाता। इसका असर दोनों नेताओं के बेटों की आगे की महत्वाकांक्षाओं पर पड़ सकता था। इसलिए, आने वाले दिनों को देखते हुए दिग्विजय और कमलनाथ ने सिंधिया की विदाई की पटकथा रच दी।

दरअसल, मध्यप्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तो कांग्रेस को बड़ी जीत नहीं मिली। लेकिन दिग्विजय सिंह और कमलनाथ ने निर्दलीय, सपा और बसपा को साथ लेकर मजबूत सरकार बना ली। एमपी में कांग्रेस सरकार बनने का बड़ा महत्व था। दरअसल, नरेंद्र मोदी और अमित शाह की करिश्माई जोड़ी व तीन बार के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मजबूत जमीनी पकड़ के बाद भी बीजेपी हारी थी।

हालांकि, मुख्‍यमंत्री बनने के बाद भी कमलनाथ ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद नहीं छोड़ा। चर्चा है कि अगर ग्वालियर के महराज ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया को अध्यक्ष बना दिया जाता, तो वह पार्टी से अलग नहीं होते। फिर न तो पार्टी के विधायक टूटते, न कमलनाथ की सरकार जाती।

कमलनाथ की सरकार बनने से पहले कांग्रेस के तत्‍कालीन अध्‍यक्ष राहुल गांधी ने आपसी संबंधों के चलते ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया को मना लिया था। लेकिन जब कमलनाथ मुख्यमंत्री बन गए तो उन्‍होंने ज्‍योतिरादित्‍य और उनके करीबियों को दरकिनार करना शुरू कर दिया। मध्यप्रदेश की राजनीति के जानकारों का कहना है कि सिंधिया समर्थक विधायकों की सरकार में सुनवाई होना बंद हो गयी। जिला और प्रदेश स्तर के अधिकारी भी उन विधायकों की बात नहीं सुन रहे थे। सिंधिया को कमलनाथ की यह बात सबसे ज्यादा बुरी लगी।

इसके बाद आए लोकसभा चुनाव से पहले तत्‍कालीन कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी ने प्रियंका वाड्रा को पूर्वी उत्तर प्रदेश और सिंधिया को पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रभारी महासचिव बनाया। कांग्रेस को इसका कोई फायदा नहीं मिला।माना जा रहा था कि कमलनाथ के कहने पर ही सिंधिया को मध्‍यप्रदेश से बाहर करने के लिए उन्‍हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश भेजा गया था। इसलिए सिंधिया को फेल करने के लिए ही उत्तर प्रदेश भेजा गया। माना यह भी जा रहा था कि कमलनाथ सरकार और मध्यप्रदेश कांग्रेस की बेरुखी के चलते ही ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी परम्परागत गुना सीट से हार गए।

उत्तर प्रदेश से लौटने के बाद सिंधिया मध्‍यप्रदेश में छोटी-मोटी सभाएं करने लगे। इस दौरान एक सभा में सिंधिया ने किसानों के लिए सड़क पर उतरने की बात कही, तो कमलनाथ ने कहा, ‘उन्‍हें सड़क पर उतरना है, तो उतर जायें। यह बात सिंधिया को चुभ गयी और उसके बाद से वह सरकार गिराने की रणनीति पर काम करने लगे।

बताया जा रहा है कि इसके लिए सिंधिया को बड़ोदरा की महारानी और भाजपा प्रवक्ता जफर इस्‍लाम का साथ मिला। उनकी बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह तक पहुंची। पीएम नरेंद्र मोदी से मिलने के बाद ज्‍योतिरादित्‍य ने सोनिया गांधी को अपना इस्‍तीफा भेजा। इससे पहले खबर आयी थी कि ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया को सोनिया गांधी और राहुल गांधी समय नहीं दे रहे थे। इसलिए सिंधिया ने कांग्रेस को बाय-बाय बोल दिया। कहा जाता है कि एक गेमप्लान के तहत सिंधिया को बगावत के लिए मजबूर किया गया।

नई दिल्ली। मध्यप्रदेश में 15 साल के वनवास के बाद कांग्रेस सत्ता में लौटी थी। वरिष्ठ कांग्रेस नेेता कमलनाथ 17 दिसंबर, 2018 को मुख्यमंत्री बने। सत्ता संभालने के महज 460 दिन के बाद 20 मार्च, 2020 को कमलनाथ को सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा। एमपी के सियासी हल्के में चर्चा है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने पुत्रमोह में कांग्रेस सरकार की बलि चढ़ा दी। मुख्यमंत्री कमलनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह चाहते, तो सरकार नहीं गिरती। यदि सरकार पर कोई संकट था भी, तो उसे दूर किया जा सकता था। अगर पहली वरीयता वाली राज्यसभा सीट ज्योतिरादित्य सिंधिया को मिल जाती, तो वह बागी न होते लेकिन दिग्विजय सिंह की राज्यसभा जाने की चाहत ने ऐसा नहीं होने दिया। कहा तो यह भी जा रहा है कि इसी दिन के लिए दिग्विजय ने सिंधिया को प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनने दिया। मध्यप्रदेश में कांग्रेस के प्रमुख नेता कमलनाथ और दिग्विजय सिंह दोनों अब सियासत के अंतिम दौर में हैं। दोनों नेताओं ने अपने-अपने बेटों को प्रदेश की राजनीति में थोड़ा बहुत स्थापित कर दिया है। कमलनाथ ने बेटे नकुलनाथ को अपनी परंपरागत छिंदवाड़ा सीट से सांसद बनाकर तो दिग्विजय सिंह ने बेटे जयवर्धन सिंह को कमलनाथ सरकार में मंत्री बनाकर राजनैतिक वारिस बना दिया है। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बाद सिंधिया का रास्ता मध्यप्रदेश में हमेशा के लिए खुल जाता। इसका असर दोनों नेताओं के बेटों की आगे की महत्वाकांक्षाओं पर पड़ सकता था। इसलिए, आने वाले दिनों को देखते हुए दिग्विजय और कमलनाथ ने सिंधिया की विदाई की पटकथा रच दी। दरअसल, मध्यप्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तो कांग्रेस को बड़ी जीत नहीं मिली। लेकिन दिग्विजय सिंह और कमलनाथ ने निर्दलीय, सपा और बसपा को साथ लेकर मजबूत सरकार बना ली। एमपी में कांग्रेस सरकार बनने का बड़ा महत्व था। दरअसल, नरेंद्र मोदी और अमित शाह की करिश्माई जोड़ी व तीन बार के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मजबूत जमीनी पकड़ के बाद भी बीजेपी हारी थी। हालांकि, मुख्‍यमंत्री बनने के बाद भी कमलनाथ ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद नहीं छोड़ा। चर्चा है कि अगर ग्वालियर के महराज ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया को अध्यक्ष बना दिया जाता, तो वह पार्टी से अलग नहीं होते। फिर न तो पार्टी के विधायक टूटते, न कमलनाथ की सरकार जाती। कमलनाथ की सरकार बनने से पहले कांग्रेस के तत्‍कालीन अध्‍यक्ष राहुल गांधी ने आपसी संबंधों के चलते ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया को मना लिया था। लेकिन जब कमलनाथ मुख्यमंत्री बन गए तो उन्‍होंने ज्‍योतिरादित्‍य और उनके करीबियों को दरकिनार करना शुरू कर दिया। मध्यप्रदेश की राजनीति के जानकारों का कहना है कि सिंधिया समर्थक विधायकों की सरकार में सुनवाई होना बंद हो गयी। जिला और प्रदेश स्तर के अधिकारी भी उन विधायकों की बात नहीं सुन रहे थे। सिंधिया को कमलनाथ की यह बात सबसे ज्यादा बुरी लगी। इसके बाद आए लोकसभा चुनाव से पहले तत्‍कालीन कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी ने प्रियंका वाड्रा को पूर्वी उत्तर प्रदेश और सिंधिया को पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रभारी महासचिव बनाया। कांग्रेस को इसका कोई फायदा नहीं मिला।माना जा रहा था कि कमलनाथ के कहने पर ही सिंधिया को मध्‍यप्रदेश से बाहर करने के लिए उन्‍हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश भेजा गया था। इसलिए सिंधिया को फेल करने के लिए ही उत्तर प्रदेश भेजा गया। माना यह भी जा रहा था कि कमलनाथ सरकार और मध्यप्रदेश कांग्रेस की बेरुखी के चलते ही ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी परम्परागत गुना सीट से हार गए। उत्तर प्रदेश से लौटने के बाद सिंधिया मध्‍यप्रदेश में छोटी-मोटी सभाएं करने लगे। इस दौरान एक सभा में सिंधिया ने किसानों के लिए सड़क पर उतरने की बात कही, तो कमलनाथ ने कहा, ‘उन्‍हें सड़क पर उतरना है, तो उतर जायें। यह बात सिंधिया को चुभ गयी और उसके बाद से वह सरकार गिराने की रणनीति पर काम करने लगे। बताया जा रहा है कि इसके लिए सिंधिया को बड़ोदरा की महारानी और भाजपा प्रवक्ता जफर इस्‍लाम का साथ मिला। उनकी बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह तक पहुंची। पीएम नरेंद्र मोदी से मिलने के बाद ज्‍योतिरादित्‍य ने सोनिया गांधी को अपना इस्‍तीफा भेजा। इससे पहले खबर आयी थी कि ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया को सोनिया गांधी और राहुल गांधी समय नहीं दे रहे थे। इसलिए सिंधिया ने कांग्रेस को बाय-बाय बोल दिया। कहा जाता है कि एक गेमप्लान के तहत सिंधिया को बगावत के लिए मजबूर किया गया।