फूलपुर उपचुनाव: बाहुबली अतीक की एंट्री से सपा की बढ़ी मुशकिलें, बीजेपी को फायदा

फूलपुर उपचुनाव : बाहुबली अतीक की एंट्री से सपा की बढ़ी मुशकिलें, बीजेपी को फायदा
फूलपुर उपचुनाव : बाहुबली अतीक की एंट्री से सपा की बढ़ी मुशकिलें, बीजेपी को फायदा

Mafia Atiq Ahmed To Contest Phulpur Lok Sabha By Election

लखनऊ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या के इस्तीफे से खाली हुई गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों पर रणक्षेत्र सज गया है।

लोकसभा फूलपुर से पेश है ग्राउंड रिपोर्ट

फूलपुर का साल 1952,1957 और 1962 में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने प्रतिनिधत्व किया ।साल 1962 में पं. नेहरू को टक्कर देने के लिए डॉ राम मनोहर लोहिया उतरे, लेकिन करीब 55 हजार वोटों से हार गए।साल 1967 में जनेश्वर मिश्र को हराकर पं. नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित ने इस सीट का नेतृत्व किया,साल 1969 में उपचुनाव हुए और जनेश्वर मिश्र को ये सीट हासिल हुई ।साल 1971 में पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को यहां से जीत मिली।

आपातकाल के दौर के बाद 1977 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस ने यहां से रामपूजन पटेल को उतारा लेकिन जनता पार्टी की उम्मीदवार कमला बहुगुणा ने यहां से जीत हासिल की। हालांकि बाद में कमला बहुगुणा ख़ुद कांग्रेस में शामिल हो गईं। आपातकाल के बाद मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी जनता पार्टी की सरकार पांच साल नहीं चली और 1980 में मध्यावधि चुनाव हुए तो इस सीट से लोकदल के उम्मीदवार प्रफेसर बी.डी.सिंह ने जीत दर्ज की। 1984 में हुए चुनाव कांग्रेस के रामपूजन पटेल ने इस सीट को जीतकर एक बार फिर इस सीट को कांग्रेस के हवाले किया। लेकिन कांग्रेस से जीतने के बाद रामपूजन पटेल जनता दल में शामिल हो गए। 1989 और 1991 का चुनाव रामपूजन पटेल ने जनता दल के टिकट पर ही जीता।

पंडित नेहरू के बाद इस सीट पर लगातार तीन बार यानी हैट्रिक लगाने का रिकॉर्ड रामपूजन पटेल ने ही बनाया। हम ये कह सकते हैं कि इस सीट ने भारतीय लोकतंत्र के कई बड़े नेताओं को जीत दिलाई, तो कइयों को हार का स्वाद भी चखाया। ये वही सीट है, जहां से साल 1996 के लोकसभा चुनावों में बीएसपी के संस्थापक कांशीराम हार चुके हैं। कांशीराम को समाजवादी पार्टी उम्मीदवार जंग बहादुर पटेल ने 16 हजार वोटों से हराया था। 1996 से 2004 के बीच हुए चार लोकसभा चुनावों में यहां से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार जीतते रहे।2004 में बाहुबली अतीक अहमद सपा के टिकट पर विजयी हुए थे ।बीएसपी ने इस सीट पर अपना खाता 2009 के चुनाव में खोला, जब कपिल मुनि करवरिया ने 30 फीसदी वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी ।

आंकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बीजेपी के लिए ये सीट क्यों अहमियत रखती है, जहां साल 2009 में बीजेपी का वोट शेयर महज 8 फीसदी था, वो 2014 में बढ़कर 52 फीसदी हो गया,वहीं कांग्रेस, बीएसपी, एसपी के कुल वोटों की संख्या महज 43 % ही रह गई। इसका इनाम भी फूलपुर में पहली बार कमल खिलाने वाले ‘विजेता’ केशव प्रसाद मौर्य को मिला। वो पहले बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष फिर प्रदेश के डिप्टी सीएम बने। मौजूदा उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य के इस्तीफे से रिक्त हुई इस सीट पर उपचुनाव के लिए नामांकन हो चुके हैं ।सभी दलों नें अपने प्रत्याशी उतार दिये हैं।

आइए इनकी कमजोरी और मजबूती पर गौर करते हैं

1- मनीष मिश्रा – कांग्रेस मजबूती- मनीष मिश्रा स्थानीय क्षेत्र में जाने माने नेताओं में से एक हैं । कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में अच्छी पकड़ है और युवाओं का साथ उन्हें मिल रहा है। पिता जेएन मिश्रा क़ी विरासत का भी लाभ मनीष मिश्रा को मिल रहा है साथ में मनीष मिश्रा के चुनाव मैदान में आने से भाजपा के माथे पर पसीना देखा जा सकता है। कमजोरी – कांग्रेस का कैडर वोट छोड़ दीजिए तो बेस वोट का अभाव है दूसरी तरफ सपा का भी प्रत्याशी मैदान में है तो मुश्किलें कम नहीं हैं।

2- नागेंद्र सिंह पटेल- सपा- मजबूती- नागेंद्र सिंह पटेल सपा के पुराने नेता हैं, संगठन में काम किये हैं। सपा में और समाज में अच्छी पकड़ है। रेलवे ठेकेदार के रूप में जाने जाते हैं।नागेंद्र सिंह पटेल के साथ बसपा प्रत्याशी ना उतरने पर समीकरण बहुत मजबूत है और बसपा के सहयोग से सांसद बनना आसान भी दिख रहा है। जातीय समीकरण भी पक्ष में है। कमजोऱी- सपा के ही नेता पूर्व सांसद द्वारा नामांकन करना थोड़ा परेशान कर सकता है, एमवाई समीकरण के साथ में अपने समाज के वोट को लाना भी एक चुनौती है।

3- कौशलेंद्र सिंह पटेल – भाजपा मजबूती- भाजपा कैडर बेस पार्टी के साथ साथ वोट बेस पार्टी है, कौशलेंद्र भले ही वाराणसी के हैं लेकिन स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं में उत्साह है। केन्द्र व राज्य सरकार के कार्यों को भुना सकते है। कमजोरी- कौशलेंद्र सिंह के पैराशूट प्रत्याशी होने का आरोप कुछ लोग लगा रहे हैं सबसे पहले उन्हें अपने समाज का वोट बचाने के लिए और सबके साथ घुलने मिलने में ही समय देना पड़ेगा, फ्लोटिंग वोट को रोकना, बसपा वोट की रणनीति के साथ साथ पूर्व पत्नी का उत्पीङन आरोप भाजपा प्रत्याशी को परेशान कर सकते हैं।

बसपा ने उपचुनाव में अपने प्रत्याशी न उतारने की परम्परा को कायम रखा है। जबकि सपा में लगातार उपे हो रहे पूर्व सांसद एवं बाहुबली नेता अतीक अहमद ने जेल से निर्दलीय नामांकन किया है। अतीक अहमद फूलपुर से सांसद रह चुके हैं और समुदाय विशेष के मतदाताओं पर अच्छी पकङ रखते हैं। फूलपुर सीट न सिर्फ़ बड़े नेताओं को जिताने के लिए बल्कि कई दिग्गजों को धूल चटाने के लिए भी मशहूर है। चाहे वो लोहिया हों, छोटे लोहिया (जनेश्वर मिश्र) हों या फिर कांशीराम। ऐसे में यहां बङे उलटफेर की संभावना से इंकार नही किया जा सकता है। इस उपचुनाव को योगी सरकार के सालभर के कामकाज का फीडबैक भी माना जा रहा है। फूलपुर उपचुनाव न केवल प्रदेश के लिए, बल्कि 2019 के आम चुनावों के लिए भी खास बन सकता है।

लखनऊ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या के इस्तीफे से खाली हुई गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों पर रणक्षेत्र सज गया है। लोकसभा फूलपुर से पेश है ग्राउंड रिपोर्ट फूलपुर का साल 1952,1957 और 1962 में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने प्रतिनिधत्व किया ।साल 1962 में पं. नेहरू को टक्कर देने के लिए डॉ राम मनोहर लोहिया उतरे, लेकिन करीब 55 हजार वोटों से हार गए।साल 1967 में जनेश्वर मिश्र को हराकर पं. नेहरू की बहन…