महिलाओं के अधिकार का मामला है तीन तलाक, इसे कोर्ट तय करेगा या समुदाय: केंद्र सरकार

नई दिल्ली तीन तलाक सामाजिक तौर पर देखा जाए तो बेहद ही गंभीर मसाला है जिसके निदान को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है और दोनों ही पक्षों की तरफ से तरह-तरह की दलीलें भी दी जा रही है। आज इस विषय पर सुनवाई के दौरान अदालत में केंद्र सरकार ने अपनी दलीलें रखी। केंद्र सरकार के अनुसार तीन तलाक इस्लाम का मौलिक हिस्सा नहीं है। यह मुस्लिम समुदाय में पुरुष और महिला के बीच का मसला है, यह महिलाओं के अधिकार का मामला है। केंद्र ने कोर्ट में कहा कि तीन तलाक को गैरकानूनी घोषित करने से मुस्लिम धर्म या इस्लाम पर कोई असर नहीं होगा। सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि एक समय सती प्रथा, देवदासी जैसी कुप्रथा हिंदू धर्म में थीं। इसपर मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि कोर्ट ने इनमें से किसे खत्म किया? इन सबको कानून बनाकर खत्म किया गया।



केंद्र की तरफ से दलील पेश करते हुए अटॉर्नी जनरल रोहतगी कहा कि तीन तलाक को बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदाय के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक समुदाय के अंदर का मामला है और महिलाओं के अधिकार से संबंधित है। सुनवाई के दौरान रोहतगी ने कहा कि अगर सऊदी अरब, ईरान, इराक जैसे देशों में ट्रिपल तलाक खत्म हो सकता है तो भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में 11 मई से ही तीन तलाक पर बहस चल रही है। रोहतगी ने दलील दी जब AIMPLB कहता है कि तीन तलाक ऑप्शनल, पाप है तो यह इस्लाम का मौलिक हिस्सा कैसे हो सकता है। एक धर्मनिरपेक्ष संविधान इन सब चीजों से ऊपर उठना होगा। तीन तलाक मूलभूत अधिकारों का हनन है यह कोर्ट तय करेगा या फिर समुदाय।



इससे पहले तीन तलाक के मुद्दे पर कोर्ट ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) से पूछा कि क्या निकाह के समय ‘निकाहनामा’ में महिला को तीन तलाक के लिए ‘ना’ कहने का विकल्प दिया जा सकता है? बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने सुनवाई के दौरान कहा कि तीन तलाक की प्रथा खत्म होने के कगार पर है और इसमें दखल की कोशिश का नकरात्मक असर हो सकता है। बोर्ड ने कोर्ट को 14 अप्रैल 2014 में पास किया गया एक रेजॉलूशन भी दिखाया जिसमें कहा गया है कि तीन तलाक एक गुनाह है और मुस्लिम समुदाय के लोगों को उस व्यक्ति का बहिष्कार करना चाहिए जो इसे अपनाता है।

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